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    सम्मेलन हॉल

    conference roomसम्मेलन कक्ष माननीय राज्यपाल की अध्यक्षता में संगठनों की विभिन्न बैठकें पेशेवर सार्वजनिक संबोधन प्रणाली के साथ आयोजित की जाती हैं। इसमें करीब 80 लोगों के बैठने की क्षमता है।

    conference roomसम्मेलन कक्ष माननीय राज्यपाल की अध्यक्षता में संगठनों की विभिन्न बैठकें पेशेवर सार्वजनिक संबोधन प्रणाली के साथ आयोजित की जाती हैं। इसमें करीब 80 लोगों के बैठने की क्षमता है।

    इस हॉल का उपयोग छोटे समारोहों, औपचारिक भोजों के लिए किया जाता है। इसका निर्माण वर्ष 1980 में किया गया था।

    multi purpose hallबहुउद्देश्यीय हॉल वर्ष 2011 में निर्मित हुआ था। यह हॉल राजभवन का गौरव है। लगभग 500 व्यक्तियों की बैठने की क्षमता के साथ, हॉल का उपयोग विभिन्न औपचारिक अवसरों के लिए किया जाता है जिसमें शपथ ग्रहण, पुरस्कार समारोह आदि शामिल हैं।

    Governor Hry lounge hallमाननीय राज्यपाल लाउंज हॉल में विभिन्न प्रतिनिधिमंडलों से मिले। लाउंज हॉल उपयुक्त रूप से प्रकाशमान, सुसज्जित और 50-60 व्यक्तियों के बैठने की क्षमता वाला है।

    वर्ष 2011 में पूरा हुआ, द प्रेसिडेंट सुइट राज्यों के प्रमुख के लिए आरक्षित है। उत्तम फर्नीचर से सजे इस सुइट में श्रीमती प्रतिभा पाटिल, भारत की पूर्व राष्ट्रपति सहित कई गणमान्य व्यक्ति ठहरे हैं।

    राज्यपाल के विशेष कार्य अधिकारी की सूची
    क्रमांक नाम से सेवा में
    1 श्री एस.एम. बत्रा 02.04.1990 03.02.1993
    2 डॉ0 अवतार सिंह, भा0प्र0से0 20.04.1994 14.06.1995
    3 श्री एम0के0 झा 14.06.1995 18.06.2000
    4 श्री इंद्रजीत सुखिजा 06.03.2006 04.01.2008
    5 श्री बखविंदर सिंह 04.09.2017 17.05.2021
    6 श्री अमरजीत सिंह, ह0सि0से 27.05.2021 05.11.2021
    7 श्री बखविंदर सिंह 15.11.2021 अब तक
    हरियाणा के राज्यपाल को सहायता शिविर (सैन्य)
    क्रमांक नाम से सेवा में
    1 प्रमुख, जसदीप सिंह, एस0एम0 10.08.2020 अब तक
    2 दस्ते का नेता, सौरभ यादव 25.12.2017 09.08.2020
    3 प्रमुख, कृष्ण सिंह 29.06.2015 25.12.2017
    4 प्रमुख, आनंद ए शिराली 09.01.2013 29.06.2015
    5 प्रमुख, भास्कर झा 20.11.2010 09.01.2013
    6 प्रमुख, अभिषेक शर्मा 08.09.2006 23.04.2010
    7 प्रमुख, शशांक कुशवाहा 16.12.2004 08.09.2006
    8 कप्तान, शशांक कुशवाहा 01.09.2003 16.12.2004
    9 कप्तान, श्रीजीत क0एस0एम0 15.03.2001 01.09.2003
    10 कप्तान, स्ी0पी0 राजीव 13.01.1999 15.03.2001
    11 कप्तान, नितीन सावंत 22.12.1995 12.10.1999
    12 कप्तान,एस0 बेंजामिन 11.03.1993 22.12.1995
    13 कप्तान, अशोकन के0 05.10.1990 11.03.1993
    14 कप्तान, आर0 के0 भाटिया 14.07.1988 31.10.1990
    15 कप्तान, जी एम विश्वनाथन 05.04.1986 31.05.1988
    16 कप्तान, वी0के0 वर्मा 01.08.1984 21.02.1986
    17 कप्तान, अश्विनी कुमार 01.02.1983 25.07.1984
    18 कप्तान, जे0एस0 यादव 01.03.1982 28.02.1983
    19 कप्तान,एच0एस0 चहल 01.03.1980 28.02.1982
    20 कप्तान, जसवंत सिंह सिरोही 1974 1977
    21 कप्तान, प्रेमवीर सिंह 1971 1974
    22 कप्तान, एस0एस0 रहेजा 1968 1970
    राज्यपाल को सहायता शिविर (पुलिस)
    क्रमांक नाम से सेवा में
    1 श्री सुमेर प्रताप सिंह, भा0पु0से 21.06.2021 अब तक
    2 श्री राजेंद्र कुमार मीणा, भा0पु0से 24.09.2020 21.06.2021
    3 श्री सुमेर प्रताप सिंह, भा0पु0से 20.02.2019 24.09.2020
    4 श्री मोहित हांडा, भा0पु0से 26.04.2018 20.02.2019
    5 श्री गंगा राम पुनिया, भा0पु0से 20.11.2017 25.04.2018
    6 श्री वसीम अकरम, भा0पु0से 02.01.2017 20.11.2017
    7 श्री बी0 सतीश बालन, भा0पु0से 21.03.2016 02.01.2017
    8 श्री जगप्रवेश दहिया, ह0पु0से 09.12.2006 29.02.2016
    9 श्री अत्तर सिंह अहलावत, भा0पु0से 30.09.2005 06.12.2006
    10 श्री वाई पूरन कुमार, भा0पु0से 18.03.2005 30.09.2005
    11 श्री सुभाष यादव, भा0पु0से 08.05.2003 18.03.2005
    12 श्री संदीप खिरवार, भा0पु0से 10.02.2003 29.04.2003
    13 श्री ए0एस0 ढिल्लों, भा0पु0से 19.06.2001 10.02.2003
    14 श्री के0 सेल्वराज, भा0पु0से 04.11.2000 15.06.2001
    15 डॉ0 जी0एस0 राव, भा0पु0से 14.01.1999 03.11.2000
    16 श्री संजय कुंडू, भा0पु0से 17.05.1995 07.06.1996
    17 श्री सुधीर मोहन, भा0पु0से 07.06.1996 10.12.1996
    18 श्री श्रीकांत जाधव, भा0पु0से 08.01.1997 14.01.1999
    19 श्री के0 सेल्वराज, भा0पु0से 01.05.1992 12.05.1995
    20 श्री आर0एस0 यादव, भा0पु0से 01.01.1992 30.04.1992
    21 श्री पी0आर0 देव, भा0पु0से 05.07.1991 03.12.1991
    22 श्री के0 सेल्वराज, भा0पु0से 05.11.1990 03.07.1991
    23 श्री आर0के0 वाछेर, भा0पु0से 19.02.1988 31.07.1990
    24 श्री के0एस0 तोमर, भा0पु0से 25.09.1987 08.02.1988
    25 श्री लाइक राम, भा0पु0से 16.04.1987 14.08.1987
    26 श्री वी0एन0 राय, भा0पु0से 01.03.1987 15.04.1987
    27 श्री हरीश कुमार, भा0पु0से 14.02.1987 28.02.1987
    28 श्री श्री निवास, भा0पु0से 12.03.1986 13.02.1987
    29 श्री पी0के0 मेहता, भा0पु0से 17.04.1985 11.03.1986
    30 श्री रेशम सिंह, भा0पु0से 24.09.1982 16.04.1985
    31 श्री राकेश मलिक, भा0पु0से 04.02.1982 23.09.1982
    32 श्री आलोक जोशी, भा0पु0से 14.03.1981 02.02.1982
    33 श्री पी0सी0 सबरवाल, भा0पु0से 28.03.1980 16.02.1981
    34 श्री वी0के0 कपूर, भा0पु0से 14.02.1978 02.03.1980
    35 श्री विकास, भा0पु0से 07.08.1976 13.02.1978
    Profile Picture Name Duration Designation
    Sh. Atul Dwivedi श्री अतुल द्विवेदी2021भा.प्र.से.
    Dr. G. Anupama डॉ. जी अनुपमा01/01/2020 to 08/02/2021
    भा.प्र.से.
    Shri Vijay Singh Dahiya श्री विजय सिंह दहिया29/10/2018 to 31/12/2019
    भा.प्र.से.
    Dr. Amit Kumar Agrawal डॉ. अमित कुमार अग्रवाल01/03/2016 to 29/10/2018
    भा.प्र.से.
    Smt. Neelam P. Kasni श्रीमती नीलम पी. कासनी05/09/2013 to 29/02/2016
    भा.प्र.से.
    Shri Mohinder Kumar श्री मोहिंदर कुमार21/04/2010 to 31/08/2013
    भा.प्र.से.
    Shri A K Singh श्री ए. के. सिंह28/07/2009 to 21/04/2010
    भा.प्र.से.
    Shri Alok Nigam श्री आलोक निगम23/08/2005 to 27/07/2009
    भा.प्र.से.
    Shri Vijai Vardhan श्री विजयवर्धन16/08/2001 to 22/08/2005
    भा.प्र.से.
    No Image श्री एस.पी. शर्मा03/01/2001 to 16/08/2001
    भा.प्र.से.
    No Image श्री माणिक सोनवणे14/07/1997 to 02/01/2001
    भा.प्र.से.
    No Image श्रीमती केशनी आनंद अरोड़ा14/01/1993 to 21/04/1993
    भा.प्र.से.
    Smt. Urvashi Gulati श्रीमती उर्वशी गुलाटी14/01/1990 to 21/04/1993
    23/04/1993 to 13/07/1997
    भा.प्र.से.
    No Image श्रीमती कोमल आनंद07/01/1986 to 09/03/1990
    भा.प्र.से.
    No Image डॉ. तरसेम लाल03/09/1984 to 06/01/1986
    भा.प्र.से.
    No Image श्री एच.सी. डिसोदिया05/03/1984 to 02/09/1984
    भा.प्र.से.
    No Image श्रीमती प्रोमिला इस्सर07/01/1981 to 04/03/1984
    भा.प्र.से.
    No Image त्रिलोचन सिंह29/06/1978 to 06/01/1981
    भा.प्र.से.
    No Image जी माधवन09/10/1975 to 28/06/1978
    भा.प्र.से.
    No Image एल एम गोयल07/02/1972 to 08/10/1975
    भा.प्र.से.

    विश्वविद्यालयोंकेपदेनकुलपतिः-हरियाणाकेराज्यपालराज्यमेंनिम्नलिखितविश्वविद्यालयोंकेकुलाधिपतिहैंः –

    कुलाधिपतिकीशक्तियांविश्वविद्यालयोंकेसंबंधितअधिनियमोंध्विधियोंमेंनिर्धारितहैं।

    इसकेअलावा, माननीयराज्यपालराज्यमेंनिम्नलिखितनिजीविश्वविद्यालयोंकेपदेनआगंतुकहैंः

    अन्यकार्यालयः:

    निम्नलिखितसंगठनभीराज्यपालकेनेतृत्वमेंहैंः-

    • मेवातविकासबोर्ड
    • ईएसएम-सह-राज्यसैनिकबोर्डकेकल्याणकेलिएहरियाणासमामेलितनिधि
    • राज्यपर्यावरणसंरक्षणपरिषद, हरियाणा.
    • मोतीलालनेहरूस्पोर्ट्सस्कूल, रायकाविशेषबोर्ड
    • इंडियनरेडक्रॉससोसाइटी, हरियाणाराज्यशाखा
    • सेंटजॉनएम्बुलेंसएसोसिएशन, हरियाणाराज्यशाख
    • हरियाणाराज्यबालकल्याणपरिषद
    • हरियाणासाकेतपरिषद
    • वेलफेयरसोसाइटीफॉरपर्सन्सविदस्पीचएंडहियरिंगइम्पेयरमेंट
    • हरियाणाराज्यभारतस्काउट्सएंडगाइड्स
    • भारतीयग्रामीणमहिलासंघ (हरियाणाराज्यशाखा)
    • हिंदकुश्तनिवारणसंघ, हरियाणाराज्यशाखा
    • पानीपतमेमोरियलसोसाइटीकीलड़ाई

    राज्यपालकोउनकेकार्योंकेनिर्वहनकेलिएउनकेसचिवालयद्वारासहायताप्रदानकीजातीहै।राज्यपालकेसचिवविभागकेप्रमुखहोनेकेसाथ-साथहरियाणाराजभवनमामलोंकेप्रशासनिकसचिवभीहोतेहैं।वहराजभवनऔरराज्यपालकेघरकीस्थापनाऔरव्ययकेसंबंधमेंआहरणऔरसंवितरणअधिकारीऔरनियंत्रणअधिकारीभीहैं।डीडीओकीशक्तियोंकोआगेसंयुक्तसचिव, राजभवनकोप्रत्यायोजितकियागयाहै।

    अनुच्छेद 151(2). संपरीक्षा प्रतिवेदनः-

    1. भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के किसी राज्य के लेखाओं संबंधी प्रतिवेदनों को उस राज्य के राज्यपाल के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा, जो उनको राज्य के विधान मण्डल के समक्ष रखवाएगा।

    अनुच्छेद 153. राज्यों के राज्यपालः-

    प्रत्येक राज्य के लिए एक राज्यपाल होगा। परन्तु इस अनुच्छेद की कोई बात एक ही व्यक्ति को दो या अधिक राज्यों के लिए राज्यपाल नियुक्त किये जाने से निवारित नहीं करेगी।

    अनुच्छेद 154. राज्य की कार्यपालिका शक्तिः-

    1. (1) राज्य की कार्यपालिका शक्ति राज्यपाल में निहित होगी और वह इसका प्रयोग इस संविधान के अनुसार स्वयं या अपने अधीनस्थ अधिकारियों के द्वारा करेगा।
    2. (2) इस अनुच्छेद की कोई बात-
    1. (क) किसी विद्यमान विधि द्वारा किसी अन्य प्राधिकारी को प्रदान किये गये कृत्य राज्यपाल को अंतरित करने वाली नहीं समझी जाएगी, या
    2. (ख) राज्यपाल के अधीनस्थ किसी प्राधिकारी को विधि द्वारा कृत्य प्रदान करने से संसद या राज्य के विधान-मण्डल को निवारित नहीं करेगी।

    अनुच्छेद 155. राज्यपाल की नियुक्तिः-

    • राज्य के राज्यपाल को राष्ट्रपति अपने हस्ताक्षर और मुद्रा सहित अधिपत्र द्वारा नियुक्त करेगा।

    अनुच्छेद 156. राज्यपाल की पदावधिः-

    1. (1) राज्यपाल, राष्ट्रपति के प्रसाद पर्यन्त पद धारण करेगा ।
    2. (2) राज्यपाल, राष्ट्रपति को सम्बोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्याग सकेगा।
    3. (3) इस अनुच्छेद के पूर्वगामी उपबंधों के अधीन रहते हुए, राज्यपाल अपने पदग्रहण की तारीख से पांच वर्ष की अवधि तक पद धारण करेगा। परन्तु राज्यपाल, अपने पद की अवधि समाप्त हो जाने पर भी, तब तक पद धारण करता रहेगा जब तक उसका उत्तराधिकारी अपना पद ग्रहण नहीं कर लेता है।

    अनुच्छेद 157. राज्यपाल नियुक्त होने के लिए अर्हताएंः-

    कोई व्यक्ति राज्यपाल नियुक्त होने का पात्र तभी होगा जब वह भारत का नागरिक है और पैंतीस वर्ष की आयु पूरी कर चुका है।

    अनुच्छेद 158. राज्यपाल पद के लिए शर्तेंः-

    1. (1) राज्यपाल संसद के किसी सदन का या पहली अनुसूची में विनिर्दिष्ट किसी राज्य के विधान-मण्डल के किसी सदन का सदस्य नहीं होगा और यदि संसद के किसी सदन का या ऐसे किसी राज्य के विधान-मण्डल के किसी सदन का कोई सदस्य राज्यपाल नियुक्त हो जाता है तो यह समझा जाएगा कि उसने उस सदन में अपना स्थान राज्यपाल के रूप में अपने पद ग्रहण की तारीख से रिक्त कर दिया है।
    2. (2) राज्यपाल अन्य कोई लाभ का पद धारण नहीं करेगा ।
    3. (3) राज्यपाल, बिना किराया दिए, अपने शासकीय निवासों के उपयोग का हकदार होगा और ऐसी उपलब्धियों, भत्तों और विशेषाधिकारों का भी, जो संसद, विधि द्वारा, अवधारित करे और जब तक इस निमित्त इस प्रकार उपबन्ध नहीं किया जाता है तब तक ऐसी उपलब्धियों, भत्तों और विशेषाधिकारों का, जो दूसरी अनुसूची में विनिर्दिष्ट हैं, हकदार होगा ।
      1. (3क) जहां एक ही व्यक्ति को दो या अधिक राज्यों का राज्यपाल नियुक्त किया जाता है वहॉ उस राज्यपाल को संदेय उपलब्धियॉं और भत्ते उन राज्यों के बीच ऐसे अनुपात में आवण्टित किये जायेंगे जो राष्ट्रपति आदेश द्वारा अवधारित करे ।
    4. (4) राज्यपाल की उपलब्धियॉं और भत्ते उसकी पदावधि के दौरान कम नहीं किए जायेंगे ।

    अनुच्छेद 159. राज्यपाल द्वारा शपथ या प्रतिज्ञानः-

    • प्रत्येक राज्यपाल और प्रत्येक व्यक्ति, जो राज्यपाल के कृत्यों का निर्वहन कर रहा है, अपना पद ग्रहण करने से पहले उस राज्य के सम्बन्ध में अधिकारिता का प्रयोग करने वाले उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति या उसकी अनुपस्थिति में उस न्यायालय के उपलब्ध ज्येष्ठतम न्यायाधीश के समक्ष निम्नलिखित प्ररूप में शपथ लेगा या प्रतिज्ञान करेगा और उस पर अपने हस्ताक्षर करेगा, अर्थातः
    • ‘‘मैं अमुक………. , ईश्वर की शपथ लेता हॅूं ध्सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञान करता हॅंू कि मैं श्रद्धापूर्वक ……………. (राज्य का नाम) के राज्यपाल के पद का कार्यपालन (अथवा राज्यपाल के कृत्यों का निर्वहन) करूॅंगा तथा अपनी पूरी योग्यता से संविधान और विधि का परिरक्षण, संरक्षण और प्रतिरक्षण करूॅंगा और मैं …………… (राज्य का नाम) की जनता की सेवा और कल्याण में निरत रहॅंूगा ।‘‘

    अनुच्छेद 160. कुछ आकस्मिकताओं में राज्यपाल के कृत्यों का निर्वहनः-

    राष्ट्रपति ऐसे किसी आकस्मिकता में, जो इस अध्याय में उपबन्धित नहीं है, राज्य के राज्यपाल के कृत्यों के निर्वहन के लिए ऐसा उपबंध कर सकेगा जो वह ठीक समझता है ।

    अनुच्छेद 161. क्षमा आदि की और कुछ मामलों में दंडादेश के निलम्बन, परिहार या लघुकरण की राज्यपाल की शक्तिः-

    किसी राज्य के राज्यपाल को उस विषय संबंधी, जिस विषय पर उस राज्य की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार है, किसी विधि के विरुद्ध किसी अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराये गये किसी व्यक्ति के दंड को क्षमा, उसका प्रविलम्बन, विराम या परिहार करने की अथवा दंडादेश के निलम्बन, परिहार या लघुकरण की शक्ति होगी ।

    अनुच्छेद 163. राज्यपाल को सहायता और सलाह देने के लिए मंत्रि-परिषद्ः-

    1. (1) जिन बातों में इस संविधान द्वारा या इसके अधीन राज्यपाल से यह अपेक्षित है कि वह अपने कृत्यों या उनमें से किसी को अपने विवेकानुसार करे, उन बातों को छोड़कर राज्यपाल को अपने कृत्यों का प्रयोग करने में सहायता और सलाह देने के लिए एक मंत्रि-परिषद् होगी जिसका प्रधान, मुख्यमंत्री होगा ।
    2. (2) यदि कोई र्प्रश्न उठता है कि कोई विषय ऐसा है या नहीं, जिसके सम्बन्ध में इस संविधान द्वारा या इसके अधीन राज्यपाल से यह अपेक्षित है कि वह अपने विवेकानुसार कार्य करे तो राज्यपाल का अपने विवेकानुसार किया गया विनिश्चय अंन्तिम होगा और राज्यपाल द्वारा की गयी किसी बात की विधिमान्यता इस आधार पर र्प्रश्नगत नहीं की जाएगी कि उसे अपने विवेकानुसार कार्य करना चाहिए था या नहीं ।
    3. (3) इस प्रश्न की किसी न्यायालय में जॉंच नहीं की जाएगी कि क्या मंत्रियों ने राज्यपाल को कोई सलाह दी, और यदि दी तो क्या दी।

    अनुच्छेद 164. मंत्रियों के बारे में अन्य उपबन्धः-

    1. (1) मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल करेगा और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राज्यपाल, मुख्यमंत्री की सलाह पर करेगा तथा मंत्री, राज्यपाल के प्रसादपर्यन्त अपने पद धारण करेंगे । परन्तु (छत्तीसगढ़, झारखण्ड), मध्य प्रदेश और (उड़ीसा) राज्यों में जनजातियों के कल्याण का भारसाधक एक मंत्री होगा जो साथ ही अनुसूचित जातियों और पिछड़े वर्गों के कल्याण का या किसी अन्य कार्य का भी भारसाधक हो सकेगा ।
      1. (1क) किसी राज्य की मंत्रि-परिषद में, मुख्यमंत्री सहित मंत्रियों की कुल संख्या उस राज्य की विधान सभा के सदस्यों की कुल संख्या के पन्द्रह प्रतिशत से अधिक नहीं होगी । परन्तु किसी राज्य में मुख्यमंत्री सहित मंत्रियों की संख्या बारह से कम नहीं होगी । परन्तु यह और कि जहां संविधान (इक्यानबेवां संशोधन) अधिनियम, 2003 के प्रारम्भ पर किसी राज्य की मंत्रि-परिषद में मुख्यमंत्री सहित की कुल संख्या, यथास्थिति, उक्त पन्द्रह प्रतिशत या पहले परन्तुक में विनिर्दिष्ट संख्या से अधिक है वहां उस राज्य मंत्रियों की कुल संख्या ऐसी तारीख से जो राष्ट्रपति लोक अधिसूचना द्वारा नियत करे, छह मास के भीतर इस खण्ड के उपबन्धों के अनुरूप लाई जाएगी ।
      2. (1ख) किसी राजनीतिक दल का किसी राज्य की विधान सभा या किसी राज्य के विधान-मण्डल के किसी सदन का जिसमें विधान परिषद् हैं, कोई सदस्य जो दसवीं अनुसूची के पैरा 2 के अधीन उस सदन का सदस्य होने के लिए निरर्हित है, अपनी निरर्हता की तारीख से प्रारम्भ होने वाली और उस तारीख तक जिसको ऐसे सदस्य के रूप में उसकी पदावधि समाप्त होगी या जहां वह, ऐसी अवधि की समाप्ति के पूर्व यथास्थिति, किसी राज्य की विधान सभा के लिए या विधान परिषद् वाले किसी राज्य के विधान-मण्डल के किसी सदन के लिए कोई निर्वाचन लड़ता है, उस तारीख तक जिसको वह निर्वाचित घोषित किया जाता है, इनमें से जो भी पूर्वतर हो, की अवधि के दौरान, खण्ड (1) के अधीन मंत्री के रूप में नियुक्त किये जाने के लिए भी निरर्हित होगा ।
      3. (2) मंत्रि-परिषद राज्य की विधान सभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होगी ।
      4. (3) किसी मंत्री द्वारा अपना पद ग्रहण करने से पहले, राज्यपाल तीसरी अनुसूची में इस प्रयोजन के लिए दिये गये प्ररूपों के अनुसार उसको पद की और गोपनीयता की शपथ दिलाएगा ।
      5. (4) कोई मंत्री, जो निरन्तर छह मास की किसी अवधि तक राज्य के विधान मण्डल का सदस्य नहीं है, उस अवधि की समाप्ति पर मंत्री नहीं रहेगा ।
      6. (5) मंत्रियों के वेतन और भत्ते ऐसे होंगे जो उस राज्य का विधान-मण्डल, विधि द्वारा, समय-समय पर अवधारित करे और जब तक उस राज्य का विधान-मण्डल इस प्रकार अवधारित नहीं करता है तब तक ऐसे होंगे जो दूसरी अनुसूची में विर्निदिष्ट हैं ।

      अनुच्छेद 165. राज्य का महाधिवक्ताः-

      1. (1) प्रत्येक राज्य का राज्यपाल, उच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त होने के लिए अर्हित किसी व्यक्ति को राज्य का महाधिवक्ता नियुक्त करेगा ।
      2. (2) महाधिवक्ता का यह कर्त्तव्य होगा कि वह उस राज्य की सरकार को विधि संबंधी ऐसे विषयों पर सलाह दे और विधिक स्वरूप के ऐसे अन्य कर्त्तव्यों का पालन करे जो राज्यपाल उसको समय-समय पर निर्देशित करे या सौंपे और उन कृत्यों का निर्वहन करे जो उसको इस संविधान अथवा तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि द्वारा या उसके अधीन प्रदान किये गये हों ।
      3. (3) महाधिवक्ता, राज्यपाल के प्रसादपर्यन्त पद धारण करेगा और ऐसा पारिश्रमिक प्राप्त करेगा जो राज्यपाल अवधारित करे।

      अनुच्छेद 166. राज्य की सरकार के कार्य का संचालनः-

      1. (1) किसी राज्य की सरकार की समस्त कार्यपालिका कार्रवाई राज्यपाल के नाम से की हुई कहीं जाएगी ।
      2. (2) राज्यपाल के नाम से किये गये और निष्पादित आदेशों और अन्य लिखतों को ऐसी रीति से अधिप्रमाणित किया जाएगा जो राज्यपाल द्वारा बनाये जाने वाले नियमों में विनिर्दिष्ट की जाए और इस प्रकार अधिप्रमाणित आदेश या लिखत की विधिमान्यता इस आधार पर र्प्रश्नगत नहीं की जाएगी कि वह राज्यपाल द्वारा किया गया या निष्पादित आदेश या लिखत नहीं है ।
      3. (3) राज्यपाल, राज्य की सरकार का कार्य अधिक सुविधापूर्वक किये जाने के लिए और जहॉं तक वह कार्य ऐसा कार्य नहीं है जिसके विषय में इस संविधान द्वारा या इसके अधीन राज्यपाल से यह अपेक्षित है कि वह अपने विवेकानुसार कार्य करे वहॉं तक मंत्रियों में उक्त कार्य के आबंटन के लिए नियम बनाएगा ।

      अनुच्छेद 167. राज्यपाल को जानकारी देने आदि के सम्बन्ध में मुख्यमंत्री के कर्त्तव्यः-

      प्रत्येक राज्य के मुख्यमंत्री का यह कर्त्तव्य होगा कि वहः

      1. (क) राज्य के कार्यों के प्रशासन सम्बन्धी और विधान विषयक प्रस्थापनाओं सम्बन्धी मंत्रि-परिषद् के सभी विनिश्चय राज्यपाल को संसूचित करे ।
      2. (ख) राज्य के कार्यों के प्रशासन सम्बन्धी और विधान विषयक प्रस्थापनाओं सम्बन्धी जो जानकारी राज्यपाल मांगे, वह दे और
      3. (ग) किसी विषय को जिस पर किसी मंत्री ने विनिश्चय कर दिया है किन्तु मंत्रिपरिषद ने विचार नहीं किया है, राज्यपाल द्वारा अपेक्षा किये जाने पर परिषद के समक्ष विचार के लिए रखे ।

      अनुच्छेद 168. राज्यों के विधान-मण्डलों का गठनः-

      1. (1) प्रत्येक राज्य के लिए एक विधान मण्डल होगा जो राज्यपाल औरः
        1. (क) बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश राज्यों में दो सदनों से
        2. (ख) अन्य राज्यों में एक सदन से, मिलकर बनेगा
      2. (2) जहॉं किसी राज्य के विधान-मण्डल के दो सदन हैं वहॉं एक का नाम विधान परिषद और दूसरे का नाम विधान सभा होगा और जहॉं केवल एक सदन है वहॉं उसका नाम विधान सभा होगा ।

      अनुच्छेद 171. विधान परिषदों की संरचनाः-

      (1) ..,(2) ..,(3) किसी राज्य की विधान परिषद के सदस्यों की कुल संख्या काः ………

      1. (ड.) शेष सदस्य राज्यपाल द्वारा खण्ड (5) के उपबन्धों के अनुसार नाम निर्देशित किये जाएंगे ।
      2. (5) राज्यपाल द्वारा खण्ड (3) के उपखण्ड (ड.) के अधीन नाम निर्देशित किये जाने वाले सदस्य ऐसे व्यक्ति होंगे जिन्हें निम्नलिखित विषयों के सम्बन्ध में विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव है, अर्थातः साहित्य, विज्ञान, कला, सहकारी आंदोलन और समाज सेवा ।
      3. as nearly as may be, one-twelfth shall be elected by electorates consisting of persons who have been for at least three years engaged in teaching in such educational institutions within the State, not lower in standard than that of a secondary school, as may
        be prescribed by or under any law made by Parliament;
      4. as nearly as may be, one-third shall be elected by the members of the Legislative Assembly of the State from amongst persons who are not members of the Assembly;
      5. the remainder shall be nominated by the Governor in accordance with the provisions of clause (5).

      The members to be nominated by the Governor under sub-clause (e) of clause (3) shall consist of persons having special knowledge or practical experience in respect of such matters as the following, namely ; Literature, science, art, co-operative movement and social service.

      अनुच्छेद 174. राज्य के विधान-मण्डल के सत्र, सत्रावसान और विघटनः-

      1. (1) राज्यपाल, समय-समय पर, राज्य के विधान मंडल के सदन या प्रत्येक सदन को ऐसे समय और स्थान पर, जो वह ठीक समझे, अधिवेशन के लिए आहूत करेगा किन्तु उसके एक सत्र की अन्तिम बैठक और आगामी सत्र की प्रथम बैठक के लिए नियत तारीख के बीच छह मास का अन्तर नहीं होगा ।
      2. (2) राज्यपाल, समय-समय पर-
        1. (क) सदन का या किसी सदन का सत्रावसान कर सकेगा ।
        2. (ख) विधान सभा का विघटन कर सकेगा ।

      अनुच्छेद 175. सदन या सदनों में अभिभाषण का और उनको संदेश भेजने का राज्यपाल का अधिकारः-

      1. (1) राज्यपाल, विधान सभा में या विधान परिषद् वाले राज्य की दशा में उस राज्य के विधान-मंडल के किसी एक सदन में या एक साथ समवेत दोनों सदनों में, अभिभाषण कर सकेगा और इस प्रयोजन के लिए सदस्यों की उपस्थिति की अपेक्षा कर सकेगा ।
      2. (2) राज्यपाल, राज्य के विधान-मण्डल में उस समय लम्बित किसी विधेयक के सम्बन्ध में संदेश या कोई अन्य संदेश, उस राज्य के विधान-मण्डल के सदन या सदनों को भेज सकेगा और जिस सदन को कोई संदेश इस प्रकार भेजा गया है वह सदन उस संदेश द्वारा विचार करने के लिए अपेक्षित विषय पर सुविधानुसार शीघ्रता से विचार करेगा ।

      अनुच्छेद 176. राज्यपाल का विशेष अभिभाषणः-

      1. (1) राज्यपाल, विधान सभा के लिए प्रत्येक साधारण निर्वाचन के पश्चात् प्रथम सत्र के आरम्भ में और प्रत्येक वर्ष के प्रथम सत्र के आरम्भ में विधान सभा में या विधान परिषद वाले राज्य की दशा में एक साथ समवेत दोनों सदनों में अभिभाषण करेगा और विधान-मण्डल को उसके आह््वान के कारण बताएगा ।
      2. (2) सदन या प्रत्येक सदन की प्रक्रिया का विनियमन करने वाले नियमों द्वारा ऐसे अभिभाषण में निर्दिष्ट विषयों की चर्चा के लिए समय नियत करने के लिए उपबन्ध किया जाएगा ।

      अनुच्छेद 180. अध्यक्ष के पद के कर्तव्यों का पालन करने या अध्यक्ष के रूप में कार्य करने की उपाध्यक्ष या अन्य व्यक्ति की शक्तिः-

      1. (1) जब अध्यक्ष का पद रिक्त है तब उपाध्यक्ष, या यदि उपाध्यक्ष का पद भी रिक्त है तो विधान सभा का ऐसा सदस्य, जिसको राज्यपाल इस प्रयोजन के लिए नियुक्त करें, उस पद के कर्त्तव्यों का पालन करेगा ।
      2. (2) विधान सभा की किसी बैठक से अध्यक्ष की अनुपस्थिति में उपाध्यक्ष या यदि वह भी अनुपस्थित है तो ऐसा व्यक्ति, जो विधान सभा की प्रक्रिया के नियमों द्वारा अवधारित किया जाए, या यदि ऐसा कोई व्यक्ति उपस्थित नहीं है तो ऐसा अन्य व्यक्ति, जो विधान सभा द्वारा अवधारित किया जाए, अध्यक्ष के रूप में कार्य करेगा ।

      अनुच्छेद 184. सभापति के पद के कर्त्तव्यों का पालन करने या सभापति के रूप में कार्य करने की उप-सभापति या अन्य व्यक्ति की शक्तिः-

      1. जब सभापति का पद रिक्त है तब उपसभापति, या यदि उप सभापति का पद भी रिक्त है तो विधान परिषद का ऐसा सदस्य, जिसको राज्यपाल इस प्रयोजन के लिए नियुक्त करे, उस पद के कर्त्तव्यों का पालन करेगा ।

      अनुच्छेद 187. राज्य के विधान-मण्डल का सचिवालयः-

      1. राज्य के विधान-मण्डल के सदन का या प्रत्येक सदन का पृथक सचिवीय कर्मचारिवृृन्द होगा । परन्तु विधान परिषद वाले राज्य के विधान मण्डल की दशा में, इस खण्ड की किसी बात का यह अर्थ नहीं लगाया जाएगा कि वह ऐसे विधान मण्डल के दोनों सदनों के लिए सम्मिलित पदों के सृजन को निवारित करती है ।
      2. (2) राज्य का विधान-मण्डल, विधि द्वारा, राज्य के विधान-मण्डल के सदन या सदनों के सचिवीय कर्मचारिवृन्द में भर्ती का और नियुक्त व्यक्तियों की सेवा की शर्तों का विनियमन कर सकेगा ।
      3. (3) जब तक राज्य का विधान-मण्डल खण्ड (2) के अधीन उपबंध नहीं करता है तब तक राज्यपाल, यथास्थिति, विधान सभा के अध्यक्ष या विधान परिषद के सभापति से परामर्श करने के पश्चात् विधान सभा के या विधान परिषद के सचिवीय कर्मचारिवृन्द में भर्ती के और नियुक्त व्यक्तियों की सेवा की शर्तों के विनियमन के लिए नियम बना सकेगा और इस प्रकार बनाए गए नियम उक्त खंड के अधीन बनाई गई किसी विधि के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, प्रभावी होेंगे ।

      अनुच्छेद 188. सदस्यों द्वारा शपथ या प्रतिज्ञानः-

      राज्य की विधान सभा या विधान परिषद का प्रत्येक सदस्य अपना स्थान ग्रहण करने से पहले, राज्यपाल या उसके द्वारा इस निमित्त नियुक्त व्यक्ति के समक्ष, तीसरी अनुसूची में इस प्रयोजन के लिए दिये गये प्ररूप के अनुसार, शपथ लेगा या प्रतिज्ञान करेगा और उस पर अपने हस्ताक्षर करेगा ।

      अनुच्छेद 192. सदस्यों की निरर्हताओं से सम्बन्धित प्रश्नों पर विनिश्चयः-

      (1) यदि यह प्रश्न उठता है कि किसी राज्य के विधान-मण्डल के किसी सदन का कोई सदस्य अनुच्छेद 191 के खण्ड (1) में वर्णित किसी निरर्हता से ग्रस्त हो गया है या नहीं तो वह प्रश्न राज्यपाल को विनिश्चय के लिए निर्देशित किया जाएगा और उसका विनिश्चिय अन्तिम होगा ।

      1. (2) ऐसी किसी प्रश्न पर विनिश्चय करने से पहले राज्यपाल निर्वाचन आयोग की राय लेगा और ऐसी राय के अनुसार कार्य करेगा ।
      2. अनुच्छेद 199. धन विधेयक की परिभाषाः-

        1. इस अध्याय के प्रयोजनों के लिए, कोई विधेयक धन विधेयक समझा जाएगा यदि उसमें केवल निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों से सम्बन्धित उपबन्ध हैं, अर्थात्ः

          1. (क) किसी कर का अधिरोपण, उत्सादन, परिहार, परिवर्तन या विनियमन
          2. (ख) राज्य द्वारा धन उधार लेने का या कोई प्रत्याभूति देने का विनियमन अथवा राज्य द्वारा अपने ऊपर ली गयी या ली जाने वाली किन्हीं वित्तीय बाध्यताओं से सम्बन्धित विधि का संशोधन
          3. (ग) राज्य की संचित निधि या आकस्मिकता निधि की अभिरक्षा, ऐसी किसी निधि में धन जमा करना या उसमें से धन निकालना
          4. (घ) राज्य की संचित निधि में से धन का विनियोग
          5. (ड.) किसी व्यय को राज्य की संचित निधि पर भारित व्यय घोषित करना या ऐसे किसी व्यय की रकम को बढ़ाना
          6. (च) राज्य की संचित निधि या राज्य के लोक लेखे मद्धे धन प्राप्त करना अथवा ऐसे धन की अभिरक्षा या उसका निर्गमन, या
          7. (छ) उपखण्ड (क) से उपखंड (च) में विनिर्दिष्ट किसी विषय का आनुषंगिक कोई विषय
          8. (2) कोई विधेयक केवल इस कारण धन विधेयक नहीं समझा जाएगा, कि वह जुर्मानों या अन्य धनीय शास्तियों के अधिरोपण का अथवा अनुज्ञप्तियों के लिए फीसों की या की गयी सेवाओं के लिए फीसों की मांग का या उनके संदाय का उपबन्ध करता है अथवा इस कारण धन विधेयक नहीं समझा जाएगा कि वह किसी स्थानीय प्राधिकारी या निकाय द्वारा स्थानीय प्रयोजनों के लिए किसी कर के अधिरोपण, उत्सादन, परिहार, परिवर्तन या विनियमन का उपबन्ध करता है ।

          9. (3) यदि यह प्रश्न उठता है कि विधान परिषद् वाले किसी राज्य के विधान-मण्डल में पुरःस्थापित कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं तो उस पर उस राज्य की विधान सभा के अध्यक्ष का विनिश्चय अन्तिम होगा ।
          10. (4) जब धन विधेयक अनुच्छेद 198 के अधीन विधान परिषद् को पारेषित किया जाता है और जब वह अनुच्छेद 200 के अधीन अनुमति के लिए राज्यपाल के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है तब प्रत्येक धन विधेयक पर विधान सभा के अध्यक्ष के हस्ताक्षर सहित यह प्रमाण पृष्ठांकित किया जाएगा कि वह धन विधेयक है ।

        अनुच्छेद 200. विधेयकों पर अनुमतिः-

        जब कोई विधेयक राज्य की विधान सभा द्वारा या विधान परिषद वाले राज्य में विधान-मण्डल के दोनों सदनों द्वारा पारित कर दिया गया है तब वह राज्यपाल के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा और राज्यपाल घोषित करेगा कि वह विधेयक पर अनुमति देता है या अनुमति रोक लेता है अथवा वह विधेयक को राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रखता है। परन्तु राज्यपाल अनुमति के लिए अपने समक्ष विधेयक प्रस्तुत किये जाने के पश्चात यथाशीघ्र उस विधेयक को, यदि वह धन विधेयक नहीं है तो सदन या सदनों को इस संदेश के साथ लौटा सकेगा कि सदन या दोनों सदन विधेयक पर या उसके किन्हीं विनिर्दिष्ट उपबंधों पर पुनर्विचार करें और विशिष्टतया किन्हीं ऐसे संशोधनों के पुरःस्थापन की वांछनीयता पर विचार करें जिनकी उसने अपने संदेश में सिफारिश की है और जब विधेयक इस प्रकार लौटा दिया जाता है तब सदन या दोनों सदन विधेयक पर तदनुसार पुनर्विचार करेंगे और यदि विधेयक सदन या सदनों द्वारा संशोधन सहित या उसके बिना फिर से पारित कर दिया जाता है और राज्यपाल के समक्ष अनुमति के लिए प्रस्तुत किया जाता है तो राज्यपाल उस पर अनुमति नहीं रोकेगा। परन्तु यह और कि जिस विधेयक से, उसके विधि बन जाने पर, राज्यपाल की राय में उच्च न्यायालय की शक्तियों का ऐसा अल्पीकरण होगा कि वह स्थान, जिसकी पूर्ति के लिए वह न्यायालय इस संविधान द्वारा परिकल्पित है संकटापन्न हो जाएगा, उस विधेयक पर राज्यपाल अनुमति नहीं देगा, किन्तु उसे राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रखेगा।

        अनुच्छेद 201. विचार के लिए आरक्षित विधेयकः-

        जब कोई विधेयक राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रख लिया जाता है तब राष्ट्रपति घोषित करेगा कि वह विधेयक पर अनुमति देता है या अनुमति रोक लेता है। परन्तु जहां विधेयक धन विधेयक नहीं है वहॉं राष्ट्रपति राज्यपाल को यह निदेश दे सकेगा कि वह विधेयक को, यथास्थिति, राज्य के विधान-मण्डल के सदन या सदनों को ऐसे सन्देश के साथ, जो अनुच्छेद 200 के पहले परन्तुक में वर्णित हैं, लौटा दे और जब कोई विधेयक इस प्रकार लौटा दिया जाता है तब ऐसा संदेश मिलने की तारीख से छह मास की अवधि के भीतर सदन या सदनों द्वारा उस पर तदनुसार पुनर्विचार किया जाएगा और यदि वह सदन या सदनों द्वारा संशोधन सहित या उसके बिना फिर से पारित कर दिया जाता है तो उसे राष्ट्रपति के समक्ष उसके विचार के लिए फिर से प्रस्तुत किया जाएगा ।

        अनुच्छेद 202. वार्षिक वित्तीय विवरणः-

        1. (1) राज्यपाल प्रत्येक वित्तीय वर्ष के सम्बन्ध में राज्य के विधान-मण्डल के सदन या सदनों के समक्ष उस राज्य की उस वर्ष के लिए प्राक्कलित प्राप्तियों और व्यय का विवरण रखवाएगा जिसे इस भाग में ‘‘वार्षिक वित्तीय विवरण‘‘ कहा गया है ।
        2. (2) वार्षिक वित्तीय विवरण में दिये हुए व्यय के प्राक्कलनों मेंः
          1. (क) इस संविधान में राज्य की संचित निधि पर भारित व्यय के रूप में वर्णित व्यय की पूर्ति के लिए अपेक्षित राशियॉं, और
          2. (ख) राज्य की संचित निधि में से किये जाने के लिए प्रस्थापित अन्य व्यय की पूर्ति के लिए अपेक्षित राशियॉं,
            पृथक-पृथक दिखाई जाएंगी और राजस्व लेखे होने वाले व्यय का अन्य व्यय से भेद किया जाएगाः
        3. (3) निम्नलिखित व्यय प्रत्येक राज्य की संचित निधि पर भारित व्यय होगा , अर्थात
          1. (क) राज्यपाल की उपलब्धियॉं और भत्ते तथा उसके पद से सम्बन्धित अन्य व्यय,
          2. (ख) विधान सभा के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के तथा विधान परिषद वाले राज्य की दशा में विधान परिषद के सभापति और उपसभापति के भी वेतन और भत्ते
          3. (ग) ऐसे ऋण भार जिनका दायित्व राज्य पर है, जिनके अंतर्गत ब्याज, निक्षेप निधि भार और मोचन भार तथा उधार लेने और ऋण सेवा और ऋण मोचन से सम्बन्धित अन्य व्यय हैं
          4. (घ) किसी उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतनों और भत्तों के सम्बन्ध में व्यय
          5. (ड.) किसी न्यायालय या माध्यमस्थम् अधिकरण के निर्णय, डिक्री या पंचाट की तुष्टि के लिए अपेक्षित राशियॉं
          6. (च) कोई अन्य व्यय जो इस संविधान द्वारा या राज्य के विधान-मण्डल द्वारा, विधि द्वारा, इस प्रकार भारित घोषित किया जाता है।

        अनुच्छेद 203. विधान मण्डल में प्राक्कलनों के सम्बन्ध में प्रक्रियाः-

        1. (1) प्राक्कलनों में से जितने प्राक्कलन राज्य की संचित निधि पर भारित व्यय से संबंधित हैं वे विधान सभा में मतदान के लिए नहीं रखे जाएंगे, किन्तु इस खण्ड की किसी बात का यह अर्थ नहीं लगाया जाएगा कि वह विधान-मण्डल में उन प्राक्कलनों में से किसी प्राक्कलन पर चर्चा को निवारित करती है ।
        2. (2) उक्त प्राक्कलनों में से जितने प्राक्कलन अन्य व्यय से सम्बन्घित हैं वे विधान सभा के समक्ष अनुदानों की मांगों के रूप में रखे जाएंगे और विधान सभा को शक्ति होगी कि वह किसी मांग को अनुमति दे या अनुमति देने से इंकार कर दे अथवा किसी मांग को, उसमें विनिर्दिष्ट रकम को कम करके, अनुमति दे ।
        3. (3) किसी अनुदान की मांग राज्यपाल की सिफारिश पर ही की जाएगी, अन्यथा नहीं ।

        अनुच्छेद 205. अनुपूरक, अतिरिक्त या अधिक अनुदानः-

        1. (1) यदिः
          1. (क) अनुच्छेद 204 के उपबन्धों के अनुसार बनाई गयी किसी विधि द्वारा किसी विशिष्ट सेवा पर चालू वित्तीय वर्ष के लिए व्यय किये जाने के लिए प्राधिकृत कोई रकम उस वर्ष के प्रयोजनों के लिए अपर्याप्त पाई जाती है या उस वर्ष के वार्षिक वित्तीय विवरण में अनुध्यात न की गयी किसी नई सेवा पर अनुपूरक या अतिरिक्त व्यय की चालू वित्तीय वर्ष के दौरान आवश्यकता पैदा हो गयी है, या
          2. ख) किसी वित्तीय वर्ष के दौरान किसी सेवा पर उस वर्ष और उस सेवा के लिए अनुदान की गयी रकम से अधिक कोई धन व्यय हो गया है, तो राज्यपाल, यथास्थिति, राज्य के विधान मण्डल के सदन या सदनों के समक्ष उस व्यय की प्राक्कलित रकम को दर्शित करने वाला दूसरा विवरण रखवाएगा या राज्य की विधान सभा में ऐसे आधिक्य के लिए मांग प्रस्तुत करवाएगा ।
        2. (2) ऐसे किसी विवरण और व्यय या मांग के संबंध में तथा राज्य की संचित निधि में से ऐसे व्यय या ऐसी मांग से सम्बन्धित अनुदान की पूर्ति के लिए धन का विनियोग प्राधिकृत करने के लिए बनाई जाने वाली किसी विधि के सम्बन्ध में भी, अनुच्छेद 202, अनुच्छेद 203, और अनुच्छेद 204 के उपबन्ध वैसे ही प्रभावी होंगे जैसे वे वार्षिक वित्तीय विवरण और उसमें वर्णित व्यय के संबंध में या किसी अनुदान की किसी मांग के सम्बन्ध में और राज्य की संचित निधि में से ऐसे व्यय या अनुदान की पूर्ति के लिए धन का विनियोग प्राधिकृत करने के लिए बनाई जाने वाली विधि के सम्बन्ध में प्रभावी हैं ।

        अनुच्छेद 207. वित्त विधेयकों के बारे में विशेष उपबन्धः-

        1. (1) अनुच्छेद 199 के खण्ड (1) के उपखण्ड (क) से उपखण्ड (च) में विनिर्दिष्ट किसी विषय के लिए उपबन्ध करने वाला विधेयक या संशोधन राज्यपाल की सिफारिश से ही पुरःस्थापित या प्रस्तावित किया जाएगा, अन्यथा नहीं और ऐसा उपबन्ध करने वाला विधेयक विधान परिषद में पुरःस्थापित नहीं किया जाएगा । परन्तु किसी कर के घटाने या उत्सादन के लिए उपबन्ध करने वाले किसी संशोधन के प्रस्ताव के लिए इस खण्ड के अधीन सिफारिश की अपेक्षा नहीं होगी।
        2. (2) कोई विधेयक या संशोधन उक्त विषयों में से किसी विषय के लिए उपबन्ध करने वाला केवल इस कारण नहीं समझा जाएगा कि वह जुर्मानों या अन्य धनीय शास्तियों के अधिरोपण का अथवा अनुज्ञप्तियों के लिए फीसों की या की गयी सेवाओं के लिए फीसों की मांग का या उनके संदाय का उपबन्ध करता है अथवा इस कारण नहीं समझा जाएगा कि वह किसी स्थानीय प्राधिकारी या निकाय द्वारा स्थानीय प्रयोजनों के लिए किसी कर के अधिरोपण, उत्सादन, परिहार, परिवर्तन या विनियमन का उपबन्ध करता है ।
        3. (3) जिस विधेयक को अधिनियमित और प्रवर्तित किये जाने पर राज्य की संचित निधि में से व्यय करना पड़ेगा वह विधेयक राज्य के विधान-मण्डल के किसी सदन द्वारा तब तक पारित नहीं किया जाएगा जब तक ऐसे विधेयक पर विचार करने के लिए उस सदन से राज्यपाल ने सिफारिश नहीं की है ।

        अनुच्छेद 208. प्रक्रिया के नियमः-

        (3) राज्यपाल, विधान परिषद वाले राज्य में विधान सभा के अध्यक्ष और विधान परिषद के सभापति से परामर्श करने के पश्चात् दोनों सदनों में परस्पर संचार से सम्बन्धित प्रक्रिया के नियम बना सकेगा ।

        अनुच्छेद 213. विधान मण्डल के विश्रांतिकाल में अध्यादेश प्रख्यापित करने की राज्यपाल की शक्तिः-

        1. (1) उस समय को छोड़कर जब किसी राज्य की विधान सभा सत्र में है या विधान परिषद वाले राज्य में विधान-मण्डल के दोनों सदन सत्र में हैं, यदि किसी समय राज्यपाल का यह समाधान हो जाता है कि ऐसी परिस्थितियॉं विद्यमान हैं जिनके कारण तुरन्त कार्यवाही करना उसके लिए आवश्यक हो गया है तो वह ऐसे अध्यादेश प्रख्यापित कर सकेगा जो उसे उन परिस्थितियों में अपेक्षित प्रतीत हों, परन्तु राज्यपाल, राष्ट्रपति के अनुदेशों के बिना, कोई ऐसा अध्यादेश प्रख्यापित नहीं करेगा, यदि

          1. (क) वैसे ही उपबन्ध अंतर्विष्ट करने वाले विधेयक को विधान-मण्डल में पुरःस्थापित किये जाने के लिए राष्ट्रपति की पूर्व मंजूरी की अपेक्षा इस संविधान के अधीन होती, या
          2. (ख) वह वैसे ही उपबन्ध अन्तर्विष्ट करने वाले विधेयक को राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रखना आवश्यक समझता, या
        2. (ग) वैसे ही उपबन्ध अंन्तर्विष्ट करने वाले राज्य के विधान मण्डल का अधिनियम इस संविधान के अधीन तब तक अविधिमान्य होता जब तक राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रखे जाने पर उसे राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त नहीं हो गयी होती ।
          1. (2) इस अनुच्छेद के अधीन प्रख्यापित अध्यादेश का वहीं बल और प्रभाव होगा जो राज्य के विधान मण्डल के ऐसे अधिनियम का होता है जिसे राज्यपाल ने अनुमति दे दी है, किन्तु प्रत्येक ऐसा अध्यादेश-
          2. (क) राज्य की विधान सभा के समक्ष और विधान परिषद वाले राज्य में दोनों सदनों के समक्ष रखा जाएगा तथा विधान मण्डल के पुनः समवेत होने से छह सप्ताह की समाप्ति पर या यदि उस अवधि की समाप्ति से पहले विधान सभा उसके अननुमोदन का संकल्प पारित कर देती है और यदि विधान परिषद है तो वह उससे सहमत हो जाती है तो, यथास्थिति, संकल्प के पारित होने पर या विधान परिषद द्वारा संकल्प से सहमत होने पर प्रवर्तन में नहीं रहेगा, और.
        3. (ख) राज्यपाल द्वारा किसी भी समय वापस लिया जा सकेगा ।
          स्पष्टीकरणः जहां विधान परिषद वाले राज्य के विधान मण्डल के सदन, भिन्न-भिन्न तारीखों को पुनः समवेत होने के लिए, आहूत किये जाते हैं वहां इस खंड के प्रयोजनों के लिए, छह सप्ताह की अवधि की गणना उन तारीखों में से पश्चातवर्ती तारीख से की जाएगी ।
        4. (3) यदि और जहां तक इस अनुच्छेद के अधीन अध्यादेश कोई ऐसा उपबन्ध करता है जो राज्य के विधान मण्डल के ऐसे अधिनियम में, जिसे राज्यपाल ने अनुमति दे दी है, अधिनियमित किये जाने पर विधिमान्य नहीं होता तो और वहॉं तक वह अध्यादेश शून्य होगा ।
          परन्तु राज्य के विधान मण्डल के ऐसे अधिनियम के, जो समवर्ती सूची में प्रगणित किसी विषय के बारे में संसद के किसी अधिनियम या किसी विद्यमान विधि के विरुद्ध हैं, प्रभाव से सम्बन्धित इस संविधान के उपबन्धों के प्रयोजनों के लिए यह है कि कोई अध्यादेश, जो राष्ट्रपति के अनुदेशों के अनुसरण में इस अनुच्छेद के अधीन प्रख्यापित किया जाता है, राज्य के विधान मण्डल का ऐसा अधिनियम समझा जाएगा जो राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रखा गया था और जिसे उसने अनुमति दे दी है ।

        अनुच्छेद 217. उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की नियुक्ति और उसके पद की शर्तेंः-

        1. (1) (अनुच्छेद 124-क में निर्दिष्ट राष्ट्रीय न्यायिक आयोग की सिफारिश पर) राष्ट्रपति अपने हस्ताक्षर और मुद्रा सहित अधिपत्र द्वारा उच्च न्यायालय के प्रत्येक न्यायाधीश को नियुक्त करेगा और वह न्यायाधीश अपर या कार्यकारी न्यायाधीश की दशा में अनुच्छेद 224 में उपबन्धित रूप में पद धारण करेगा और किसी अन्य दशा में तब तक पद धारण करेगा जब तक वह बासठ वर्ष की आयु प्राप्त नहीं कर लेता हैः
          परन्तु –

          1. (क) कोई न्यायाधीश, राष्ट्रपति को सम्बोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्याग सकेगा
          2. (ख) किसी न्यायाधीश को उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने के लिए अनुच्छेद 124 के खण्ड (4) में उपबन्धित रीति से उसके पद से राष्ट्रपति द्वारा हटाया जा सकेगा ।
        2. (ग) किसी न्यायाधीश का पद, राष्ट्रपति द्वारा उसे उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त किये जाने पर या राष्ट्रपति द्वारा उसे भारत के राज्य क्षेत्र में किसी अन्य उच्च न्यायालय को अंतरित किये जाने पर रिक्त हो जाएगा ।

        (2) कोई व्यक्ति, किसी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति के लिए तभी अर्हित होगा जब वह भारत का नागरिक है और-

        1. (क) भारत के राज्य क्षेत्र में कम से कम दस वर्ष तक न्यायिक पद धारण कर चुका है, या
        2. (ख) किसी उच्च न्यायालय का या ऐसे दो या अधिक न्यायालयों का लगातार कम से कम दस वर्ष तक अधिवक्ता रहा हैः
        3. स्पष्टीकरणः इस खण्ड के प्रयोजनों के लिए –

        4. (क) भारत के राज्य क्षेत्र में न्यायिक पद धारण करने की अवधि की संगणना करने में वह अवधि भी सम्मिलित की जाएगी जिसके दौरान कोई व्यक्ति न्यायिक पद धारण करने के पश्चात किसी उच्च न्यायालय का अधिवक्ता रहा है या उसने किसी अधिकरण के सदस्य का पद धारण किया है अथवा संघ या राज्य के अधीन कोई ऐसा पद धारण किया है जिसके लिए विधि का विशेष ज्ञान अपेक्षित है
        5. (कक) किसी उच्च न्यायालय का अधिवक्ता रहने की अवधि की संगणना करने में वह अवधि भी सम्मिलित की जाएगी जिसके दौरान किसी व्यक्ति ने अधिवक्ता होने के पश्चात न्यायिक पद धारण किया है या किसी अधिकरण के सदस्य का पद धारण किया है अथवा संघ या राज्य के अधीन कोई ऐसा पद धारण किया है जिसके लिए विधि का विशेष ज्ञान अपेक्षित हैः
        6. (ख) भारत के राज्य क्षेत्र में न्यायिक पद धारण करने या किसी उच्च न्यायालय का अधिवक्ता रहने की अवधि की संगणना करने में इस संविधान के प्रारम्भ से पहले की वह अवधि भी सम्मिलित की जाएगी जिसके दौरान किसी व्यक्ति ने, यथास्थिति, ऐसे क्षेत्र में जो 15 अगस्त, 1947 से पहले भारत शासन अधिनियम, 1935 में परिभाषित भारत में समाविष्ट था, न्यायिक पद धारण किया है या वह ऐसे किसी क्षेत्र में किसी उच्च न्यायालय का अधिवक्ता रहा है ।
        7. (3) यदि उच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश की आयु के बारे में कोई र्प्रश्न उठता है तो उस प्रश्न का विनिश्चय भारत के मुख्य न्यायमूर्ति से परामर्श करने के पश्चात्, राष्ट्रपति द्वारा दिया जायेगा और राष्ट्रपति का विनिश्चय अंतिम होगा ।

      अनुच्छेद 219. उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों द्वारा शपथ या प्रतिज्ञानः-

      उच्च न्यायालय का न्यायाधीश होने के लिए नियुक्त प्रत्येक व्यक्ति, अपना पद ग्रहण करने से पहले, उस राज्य के राज्यपाल या उसके द्वारा इस निमित्त नियुक्त व्यक्ति के समक्ष, तीसरी अनुसूची में इस प्रयोजन के लिए दिये गये प्ररूप के अनुसार, शपथ लेगा या प्रतिज्ञान करेगा और उस पर अपने हस्ताक्षर करेगा ।

      अनुच्छेद 227. सभी न्यायालयों के अधीक्षण की उच्च न्यायालय की शक्तिः-

      1. (1) प्रत्येक उच्च न्यायालय उन राज्यक्षेत्रों में सर्वत्र, जिनके सम्बन्ध में वह अपनी अधिकारिता का प्रयोग करता है, सभी न्यायालयों और अधिकरणों का अधीक्षण करेगा ।
      2. (2) पूर्वगामी उपबन्ध की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, उच्च न्यायालयः
        1. क) ऐसे न्यायालयों से विवरणी मंगा सकेगा
        2. (ख) ऐसे न्यायालयों की पद्धति और कार्यवाहियों के विनियमन के लिए साधारण नियम और प्ररूप बना सकेगा, और निकाल सकेगा तथा विहित कर सकेगा, और
        3. (ग) किन्हीं ऐसे न्यायालयों के अधिकारियों द्वारा रखी जाने वाली पुस्तकों,
          प्रविष्टियों और लेखाओं के प्ररूप विहित कर सकेगा ।
      3. (3) उच्च न्यायालय उन फीसों की सारणियॉं भी स्थिर कर सकेगा जो ऐसे न्यायालयों के शैरिफ को तथा सभी लिपिकों और अधिकारियों को तथा उनमें विधि-व्यवसाय करने वाले अटार्नियों, अधिवक्ताओं और प्लीडरों को अनुज्ञेय होगी । परन्तु खण्ड (2) या खण्ड (3) के अधीन बनाये गये कोई नियम, विहित किये गये कोई प्ररूप या स्थिर की गयी कोई सारणी तत्समय प्रवृत किसी विधि के उपबन्ध से असंगत नहीं होगी और इनके लिए राज्यपाल के पूर्व अनुमोदन की अपेक्षा होगी ।

      अनुच्छेद 229. उच्च न्यायालय के अधिकारी और सेवक तथा व्ययः-

      (1) किसी उच्च न्यायालय के अधिकारियों और सेवकों की नियुक्तियॉं उस न्यायालय का मुख्य न्यायमूर्ति करेगा या उस न्यायालय का ऐसा अन्य न्यायाधीश या अधिकारी करेगा जिसे वह निर्दिष्ट करे । परन्तु उस राज्य का राज्यपाल नियम द्वारा यह अपेक्षा कर सकेगा कि ऐसी किन्हीं दशाओं में जो नियम में विनिर्दिष्ट की जाएं, किसी ऐसे व्यक्ति को, जो पहले से ही न्यायालय से संलग्न नहीं हैं, न्यायालय से सम्बन्धित किसी पद पर राज्य लोक सेवा आयोग से परामर्श करके ही नियुक्त किया जाएगा, अन्यथा नहीं ।
      (2) राज्य के विधान मण्डल द्वारा बनाई गयी विधि के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, उच्च न्यायालय के अधिकारियों और सेवकों की सेवा की शर्तें ऐसी होंगी जो उस न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति या उस न्यायालय के ऐसे अन्य न्यायाधीश या अधिकारी द्वारा, जिसे मुख्य न्यायमूर्ति ने इस प्रयोजन के लिए नियम बनाने के लिए प्राधिकृत किया है, बनाए गए नियमों द्वारा विहित की जाएं । परन्तु इस खण्ड के अधीन बनाए गये नियमों के लिए, जहां तक वे वेतनों, भत्तों, छुट्टी या पेंशनों से सम्बन्धित हैं, उस राज्य के राज्यपाल के अनुमोदन की अपेक्षा होगी ।

      अनुच्छेद 230. उच्च न्यायालयों की अधिकारिता पर संघ का राज्यक्षेत्रों पर विस्तारः-

      1. 2(ख) उस राज्यक्षेत्र में अधीनस्थ न्यायालयों के लिए किन्हीं नियमों, प्ररूपों या सारणियों के संबंध में, अनुच्छेद 227 में राज्यपाल के प्रति निर्देश का, यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह राष्ट्रपति के प्रति निर्देश है ।
      2. अनुच्छेद 231. दो या अधिक राज्यों के लिए एक ही उच्च न्यायालय की स्थापनाः-

        1. (2) किसी ऐसे उच्च न्यायालय के सम्बन्ध मेंः
        2. (ख) अधीनस्थ न्यायालयों के लिए किन्हीं नियमों, प्ररूपों या सारणियों के सम्बन्ध में, अनुच्छेद 227 में राज्यपाल के प्रति निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह उस राज्य के राज्यपाल के प्रति निर्देश हैं जिसमें वे अधीनस्थ न्यायालय स्थित है, और
        3. (ग) अनुच्छेद 219 और अनुच्छेद 229 में राज्य के प्रति निर्देशों का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वे उस राज्य के प्रति निर्देश हैं, जिसमें उस उच्च न्यायालय का मुख्य स्थान है। परन्तु यदि ऐसा मुख्य स्थान किसी संघ राज्यक्षेत्र में है तो अनुच्छेद 219 और अनुच्छेद 229 में राज्य के, राज्यपाल, लोक सेवा आयोग, विधान मण्डल और संचित निधि के प्रति निर्देशों का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वे क्रमशः राष्ट्रपति, संघ लोक सेवा आयोग, संसद और भारत की संचित निधि के प्रति निर्देश हैं ।

        अनुच्छेद 233. जिला न्यायाधीशों की नियुक्तिः-

        1. (1) किसी राज्य में जिला न्यायाधीश नियुक्त होने वाले व्यक्तियों की नियुक्ति तथा जिला न्यायाधीश की पदस्थापना और प्रोन्नति उस राज्य का राज्यपाल ऐसे राज्य के सम्बन्ध में अधिकारिता का प्रयोग करने वाले उच्च न्यायालय से परामर्श करके करेगा ।
        2. (2) वह व्यक्ति, जो ंसंघ की या राज्य की सेवा में पहले से ही नहीं है, जिला न्यायाधीश नियुक्त होने के लिए केवल तभी पात्र होगा जब वह कम से कम सात वर्ष तक अधिवक्ता या प्लीडर रहा है और उसकी नियुक्ति के लिए उच्च न्यायालय ने सिफारिश की है ।

        अनुच्छेद 234. न्यायिक सेवा में जिला न्यायाधीशों से भिन्न व्यक्तियों की भर्तीः-

        जिला न्यायाधीशों से भिन्न व्यक्तियों की किसी राज्य की न्यायिक सेवा में नियुक्ति उस राज्य के राज्यपाल द्वारा, राज्य लोक सेवा आयोग से और ऐसे राज्य के सम्बन्ध में अधिकारिता का प्रयोग करने वाले उच्च न्यायालय से परामर्श करने के पश्चात् और राज्यपाल द्वारा इस निमित्त बनाये गये नियमों के अनुसार की जाएगी।

        अनुच्छेद 237. कुछ वर्ग या वर्गों के मजिस्ट्रेटों पर इस अध्याय के उपबन्धों का लागू होनाः-

        राज्यपाल, लोक अधिसूचना द्वारा, निदेश दे सकेगा कि इस अध्याय के पूर्वगामी उपबन्ध और उनके अधीन बनाए गए नियम ऐसी तारीख से, जो वह इस निमित्त नियत करे, ऐसे अपवादों और उपांतरणों के अधीन रहते हुए जो ऐसी अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किए जाएं, राज्य में किसी वर्ग या वर्गों के मजिस्ट्रेटों के सम्बन्ध में वैसे ही लागू होंगे जैसे वे राज्य की न्यायिक सेवा में नियुक्त व्यक्तियों के सम्बन्ध में लागू होते हैं ।

        अनुच्छेद 243(छ).

        ‘‘ग्राम‘‘ से राज्यपाल द्वारा इस भाग के प्रयोजनों के लिए, लोक अधिसूचना द्वारा ग्राम के रूप में विनिर्दिष्ट ग्राम अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत इस प्रकार विनिर्दिष्ट ग्रामों का समूह भी है ।

        अनुच्छेद 243झ. वित्तीय स्थिति के पुनर्विलोकन के लिए वित्त आयोग का गठनः-

        (1) राज्य का राज्यपाल, संविधान (तिहत्तरवॉं संशोधन) अधिनियम, 1992 के प्रारम्भ से एक वर्ष के भीतर यथाशीघ्र, और तत्पश्चात् प्रत्येक पॉंचवे वर्ष की समाप्ति पर, वित्त आयोग का गठन करेगा जो पंचायतों की वित्तीय स्थिति का पुनर्विलोकन करेगा और जो (ग) पंचायतों के सुदृढ़ वित्त के हित में राज्यपाल द्वारा वित्त आयोग को निर्दिष्ट किये गये किसी अन्य विषय के बारे में, राज्यपाल को सिफारिश करेगा ।

        (4) राज्यपाल इस अनुच्छेद के अधीन आयोग द्वारा की गयी प्रत्येक सिफारिश को, उस पर की गयी कार्यवाई के स्पष्टीकारक ज्ञापन सहित, राज्य के विधान मण्डल के समक्ष रखवाएगा ।

        अनुच्छेद 243ट. पंचायतों के लिए निर्वाचनः-

        1. (1) पंचायतों के लिए कराये जाने वाले सभी निर्वाचनों के लिए निर्वाचक नामावली तैयार कराने का और उन सभी निर्वाचनों के संचालन का अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण एक राज्य निर्वाचन आयोग में निहित होगा, जिसमें एक राज्य निर्वाचन आयुक्त होगा, जो राज्यपाल द्वारा नियुक्त किया जाएगा ।
        2. (2) किसी राज्य के विधान मण्डल द्वारा बनाई गई किसी विधि के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, राज्य निर्वाचन आयुक्त की सेवा की शर्तें और पदावधि ऐसी होगी जो राज्यपाल नियम द्वारा अवधारित करे।

        अनुच्छेद 243ठ. संघ राज्यक्षेत्रों का लागू होनाः-

        इस भाग के उपबन्ध संघ राज्यक्षेत्रों पर लागू होंगे और किसी संघ राज्यक्षेत्र को उनके लागू होने में इस प्रकार प्रभावी होंगे मानों किसी राज्य के राज्यपाल के प्रति निर्देश, अनुच्छेद 239 के अधीन नियुक्त संघ राज्यक्षेत्र के प्रशासक के प्रति निर्देश हों और किसी राज्य के विधान-मण्डल या विधान सभा के प्रति निर्देश, किसी ऐसे संघ राज्यक्षेत्र के संबंध में, जिसमें विधान सभा है, उस विधान सभा के प्रति निर्देश हों ।

        अनुच्छेद 243त(ग).

        ‘‘महानगर क्षेत्र‘‘ से दस लाख या उससे अधिक जनसंख्या वाला ऐसा क्षेत्र अभिप्रेत है जिसमें एक या अधिक जिला समाविष्ट हैं और जो दो या अधिक नगरपालिकाओं या पंचायतों या अन्य संलग्न क्षेत्रों से मिलकर बनता है तथा जिसे राज्यपाल, इस भाग के प्रयोजनों के लिए, लोक अधिसूचना द्वारा, महानगर क्षेत्र के रूप में विनिर्दिष्ट करें ।

        अनुच्छेद 243त(घ).

        ‘‘नगरपालिका क्षेत्र‘‘ से राज्यपाल द्वारा अधिसूचित किसी नगरपालिका का प्रादेशिक क्षेत्र अभिप्रेत है।

        अनुच्छेद 243थ. नगरपालिकाओं का गठनः-

        1. 1) प्रत्येक राज्य में, इस भाग के उपबन्धों के अनुसार-
          1. (क) किसी संक्रमणशील क्षेत्र के लिए, अर्थात् ग्रामीण क्षेत्र से नगरीय क्षेत्र में संक्रमणगत क्षेत्र के लिए कोई नगर पंचायत का (चाहे वह किसी भी नाम से ज्ञात हो )
          2. (ख) किसी लघुतर नगरीय क्षेत्र के लिए नगरपालिका परिषद का और
          3. (ग) किसी वृहत्तर नगरीय क्षेत्र के लिए नगर निगम का, गठन किया जाएगा । परन्तु इस खण्ड के अधीन कोई नगरपालिका ऐसे नगरीय क्षेत्र या उसके किसी भाग में गठित नहीं की जा सकेगी जिसे राज्यपाल, क्षेत्र के आकार और उस क्षेत्र में किसी औद्योगिक स्थापन द्वारा दी जा रही या दिए जाने के लिए प्रस्तावित नगरपालिका सेवाओं और ऐसी अन्य बातों के, जो वह ठीक समझे, ध्यान में रखते हुए, लोक अधिसूचना द्वारा, औद्योगिक नगरी के रूप में विनिर्दिष्ट करे।
        2. (2) इस अनुच्छेद में, ‘‘संक्रमणशील क्षेत्र‘‘, ‘‘लघुतर नगरीय क्षेत्र‘‘ या ‘‘बृहत्तर नगरीय क्षेत्र‘‘ से ऐसा क्षेत्र अभिप्रेत है जिसे राज्यपाल, इस भाग के प्रयोजनों के लिए, उस क्षेत्र की जनसंख्या, उसमें जनसंख्या की सघनता, स्थानीय प्रशासन के लिए उत्पन्न राजस्व, कृषि से भिन्न क्रियाकलापों में नियोजन की प्रतिशतता, आर्थिक महत्व या ऐसी अन्य बातों को, जो वह ठीक समझे, ध्यान में रखते हुए, लोक अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट करे ।

        अनुच्छेद 243म. वित्त आयोगः-

        1. (1) अनुच्छेद 243झ के अधीन गठित वित्त आयोग नगरपालिकाओं की वित्तीय स्थिति का भी पुनर्विलोकन करेगा और …….
        2. (2) राज्यपाल इस अनुच्छेद के अधीन आयोग द्वारा की गयी प्रत्येक सिफारिश को, उस पर की गयी कार्यवाही के स्पष्टीकारक ज्ञापन सहित, राज्य के विधान-मण्डल के समक्ष रखवाएगा ।

        अनुच्छेद 243यख. संघ राज्यक्षेत्रों का लागू होनाः-

        इस भाग के उपबन्ध संघ राज्यक्षेत्रों को लागू होंगे और किसी संघ राज्यक्षेत्र को उनके लागू होने में इस प्रकार प्रभावी होंगे मानों किसी राज्य के राज्यपाल के प्रति निर्देश, अनुच्छेद 239 के अधीन नियुक्त संघ राज्यक्षेत्र के प्रशासक के प्रति निर्देश हों और किसी राज्य के विधान मण्डल या विधान सभा के प्रति निर्देश, किसी ऐसे संघ राज्यक्षेत्र के संबंध में, जिसमें विधान सभा है, उस विधान सभा के प्रति निर्देश हों।

        अनुच्छेद 243य(घ). जिला योजना के लिए समितिः-

        (3) प्रत्येक जिला योजना समिति, विकास योजना प्रारूप तैयार करने में-(क) निम्नलिखित का ध्यान रखेगी, अर्थात

        1. (प) पंचायतों और नगरपालिकाओं के सामान्य हित के विषय, जिनके अंतर्गत स्थानिक योजना, जल तथा अन्य भौतिक और प्राकृतिक संसाधनों में हिस्सा बंटाना, अवसंरचना का एकीकृत विकास और पर्यावरण संरक्षण है,
          1. (पप) उपलब्ध वित्तीय या अन्य संसाधनों की मात्रा और प्रकार
          2. (ख) ऐसी संस्थाओं और संगठनों से परामर्श करेगी जिन्हें राज्यपाल, आदेश द्वारा, विनिर्दिष्ट करे ।

        अनुच्छेद 255. सिफारिशों और पूर्व मंजूरी के बारे में अपेक्षाओं को केवल प्रक्रिया के विषय माननाः-

        यदि संसद के या किसी राज्य के विधान मण्डल के किसी अधिनियम को-

        1. (क) जहॉं राज्यपाल की सिफारिश अपेक्षित थी वहॉं राज्यपाल या राष्ट्रपति ने,
        2. (ख) जहां राजप्रमुख की सिफारिश अपेक्षित थी वहॉं राज्यप्रमुख या राष्ट्रपति ने
        3. (ग) जहां राष्ट्रपति की सिफारिश अपेक्षित थी वहॉं राष्ट्रपति ने, अनुमति दे दी है तो ऐसा अधिनियम और ऐसे अधिनियम का कोई उपबन्ध केवल इस कारण अविधिमान्य नहीं होगा कि इस संविधान द्वारा अपेक्षित कोई सिफारिश नहीं की गयी थी या पूर्व मंजूरी नहीं दी गयी थी ।

        अनुच्छेद 258क. संघ को कृत्य सौंपने की राज्यों की शक्तिः-

        इस संविधान में किसी बात के होते हुए भी, किसी राज्य का राज्यपाल, भारत सरकार की सहमति से उस सरकार को या उसके अधिकारियों को ऐसे किसी विषय से सम्बन्धित कृत्य, जिन पर उस राज्य की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार है, सशर्त या बिना शर्त सौंप सकेगा ।

        अनुच्छेद 267. आकस्मिकता निधिः-

        (2) राज्य का विधान मण्डल, विधि द्वारा, अग्रदाय के स्वरूप की एक आकस्मिकता निधि की स्थापना कर सकेगा जो ‘‘राज्य की आकस्मिकता निधि‘‘ के नाम से ज्ञात होगी जिसमें ऐसी विधि द्वारा अवधारित राशियॉं समय-समय पर जमा की जाएंगी और अनवेक्षित व्यय का अनुच्छेद 205 या अनुच्छेद 206 के अधीन राज्य के विधान मण्डल द्वारा, विधि द्वारा प्राधिकृत किया जाना लम्बित रहने तक ऐसी निधि में से ऐसे व्यय की पूर्ति के लिए अग्रिम धन देने के लिए राज्यपाल को समर्थ बनाने के लिए उक्त निधि राज्य के राज्यपाल के व्ययनाधीन रखी जाएगी ।

        अनुच्छेद 294. कुछ दशाओं में सम्पत्ति, आस्तियों, अधिकारों, दायित्वों और बाध्यताओं का उत्तराधिकारः-

        इस संविधान के प्रारम्भ से ही-—

        1. (क) जो संपत्ति और आस्तियॉं ऐसे प्रारम्भ से ठीक पहले भारत डोमिनियन की सरकार के प्रयोजनों के लिए हिज मजेस्टी में निहित थीं और जो सम्पत्ति और आस्तियॉं ऐसे प्रारम्भ से ठीक पहले प्रत्येक राज्यपाल वाले प्रान्त की सरकार के प्रयोजनों के लिए हिज मजेस्टी में निहित थीं, वे सभी इस संविधान के प्रारम्भ से पहले पाकिस्तान डोमिनियन के या पश्चिमी बंगाल, पूर्वी बंगाल, पश्चिमी पंजाब और पूर्वी पंजाब प्रान्तों के सृजन के कारण किये गये या किये जाने वाले किसी समायोजन के अधीन रहते हुए क्रमशः संघ और तत्स्थानी राज्य में निहत होंगी, और
        2. (ख) जो अधिकार, दायित्व और बाध्यताएं भारत डोमिनियन की सरकार की और प्रत्येक राज्यपाल वाले प्रान्त की सरकार की थीं, चाहे वे किसी संविदा से या अन्यथा उद्भूत हुई हों, वे सभी इस संविधान के प्रारम्भ से पहले पाकिस्तान डोमिनियन के या पश्चिमी बंगाल, पूर्वी बंगाल, पश्चिमी पंजाब और पूर्वी पंजाब प्रान्तों के सृजन के कारण किये गये या किये जाने वाले किसी समायोजन के अधीन रहते हुए क्रमशः भारत सरकार और प्रत्येक तत्स्थानी राज्य की सरकार के अधिकार, दायित्व और बाध्यताएं होंगी ।

        अनुच्छेद 299. संविदाएंः-

        1. (1) संघ की या राज्य की कार्यपालिका शक्ति का प्रयोग करते हुए की गयी सभी संविदाएं, यथास्थिति, राष्ट्रपति द्वारा या उस राज्य के राज्यपाल द्वारा की गयी कही जाएंगी और वे सभी संविदाएं और सम्पत्ति संबंधी हस्तांतरण-पत्र, जो उस शक्ति का प्रयोग करते हुए किए जाएं, राष्ट्रपति या राज्यपाल की ओर से ऐसे व्यक्तियों द्वारा और रीति से निष्पादित किए जाएंगे जिसे वह निर्दिष्ट या प्राधिकृत करे ।
        2. (2) राष्ट्रपति या किसी राज्य का राज्यपाल इस संविधान के प्रयोजनों के लिए या भारत सरकार के संबंध में इससे पूर्व प्रवृत्त किसी अधिनियमिति के प्रयोजनों के लिए की गयी या निष्पादित की गयी किसी संविदा या हस्तांतरण-पत्र के सम्बन्ध में वैयक्तिक रूप से दायी नहीं होगा या उनमें से किसी की ओर से ऐसी संविदा या हस्तांतरण-पत्र करने या निष्पादित करने वाला व्यक्ति उसके संबंध में वैयक्तिक रूप से दायी नहीं होगा ।

        अनुच्छेद 309. संघ या राज्य की सेवा करने वाले व्यक्तियों की भर्ती और सेवा की शर्तेंः-

        इस संविधान के उपबंधों के अधीन रहते हुए, समुचित विधान-मण्डल के अधिनियम संघ या किसी राज्य के कार्यकलाप से संबंधित लोक सेवाओं और पदों के लिए भर्ती का और नियुक्त व्यक्तियों की सेवा की शर्तों का विनियमन कर सकेंगे । परन्तु जब तक इस अनुच्छेद के अधीन समुचित विधान-मण्डल के अधिनियम द्वारा या उसके अधीन इस निमित्त उपबंध नहीं किया जाता है, तब तक, यथास्थिति, संघ के कार्य कलाप से संबंधित सेवाओं और पदों की दशा में राष्ट्रपति या ऐसा व्यक्ति जिसे वह निर्दिष्ट करे और राज्य के कार्य कलाप से संबंधित सेवाओं और पदों की दशा में राज्य का राज्यपाल या ऐसा व्यक्ति जिसे वह निर्दिष्ट करे, ऐसी सेवाओं और पदों के लिए भर्ती का और नियुक्त व्यक्तियों की सेवा की शर्तों का विनियमन करने वाले नियम बनाने के लिए सक्षम होगा और इस प्रकार बनाए गए नियम किसी ऐसे अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए प्रभावी होंगे ।

        अनुच्छेद 310. संघ या राज्य की सेवा करने वाले व्यक्तियों की पदावधिः-

        1. (1) इस संविधान द्वारा अभिव्यक्त रूप से यथा उपबंधित के सिवाय, प्रत्येक व्यक्ति जो रक्षा सेवा का या संघ की सिविल सेवा का या अखिल भारतीय सेवा का सदस्य है अथवा रक्षा से संबंधित कोई पद या संघ के अधीन कोई सिविल पद धारण करता है, राष्ट्रपति के प्रसादपर्यन्त पद धारण करता है और प्रत्येक व्यक्ति जो किसी राज्य की सिविल सेवा का सदस्य है या राज्य के अधीन कोई सिविल पद धारण करता है, उस राज्य के राज्यपाल के प्रसादपर्यन्त पद धारण करता है ।
        2. (2) इस बात के होते हुए भी संघ या किसी राज्य के अधीन सिविल पद धारण करने वाला व्यक्ति, यथास्थिति, राष्ट्रपति या राज्य के राज्यपाल के प्रसादपर्यन्त पद धारण करता है, कोई संविदा जिसके अधीन कोई व्यक्ति जो रक्षा सेवा का या अखिल भारतीय सेवा के या संघ या राज्य की सिविल सेवा के सदस्य नहीं हैं, ऐसे किसी पद को धारण करने के लिए इस संविधान के अधीन नियुक्त किया जाता है, उस दशा में, जिसमें, यथास्थिति, राष्ट्रपति या राज्यपाल विशेष अर्हताओं वाले किसी व्यक्ति की सेवाएं प्राप्त करने के लिए आवश्यक समझता है, यह उपबंध कर सकेगी कि यदि करार की गई अवधि की समाप्ति से पहले वह पद समाप्त कर दिया जाता है या ऐसे कारणों से, जो उसके किसी अवचार से संबंधित नहीं है, उससे वह पद रिक्त करने की अपेक्षा की जाती है तो, उसे प्रतिकर किया जाएगा ।

        अनुच्छेद 311. संघ या राज्य के अधीन सिविल हैसियत में नियोजित व्यक्तियों का पदच्युत किया जाना, पद से हटाया जाना या पंक्ति में अवनत किया जानाः-

        (2) यथापूर्वोक्त, किसी व्यक्ति को, ऐसी जॉंच के पश्चात ही, जिसमें उसे अपने विरुद्ध आरोपों की सूचना दे दी गयी है और उन आरोपों के संबंध में सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर दे दिया गया है, पदच्युत किया जाएगा या पद से हटाया जाएगा या पंक्ति में अवनत किया जाएगा, अन्यथा नहीं । परन्तु जहां ऐसी जांच के पश्चात उस पर ऐसी कोई शास्ति अधिरोपित करने की प्रस्थापना है वहां ऐसी शास्ति ऐसी जांच के दौरान दिये गये साक्ष्य के आधार पर अधिरोपित की जा सकेगी और ऐसे व्यक्ति को प्रस्थापित शास्ति के विषय में अभ्यावेदन करने का अवसर देना आवश्यक नहीं होगा । परन्तु यह और कि यह खंड वहां लागू नहीं होगा,

      3. (ग) जहां, यथास्थिति, राष्ट्रपति या राज्यपाल का यह समाधान हो जाता है कि राज्य की सुरक्षा के हित में यह समीचीन नहीं है कि ऐसी जॉंच की जाए।
      4. (3) यदि यथापूर्वोक्त किसी व्यक्ति के संबंध में यह प्रश्न उठता है कि खंड (2) में निर्दिष्ट जांच करना युक्तियुक्त रूप से साध्य है या नहीं तो उस व्यक्ति को पदच्युत करने या पद से हटाने या पंक्ति में अवनत करने के लिए सशक्त प्राधिकारी का उस पर विनिश्चय अंतिम होगा ।

        अनुच्छेद 315. संघ और राज्यों के लिए लोक सेवा आयोगः-

        (4) यदि किसी राज्य का राज्यपाल संघ लोक सेवा आयोग से ऐसा करने का अनुरोध करता है तो वह राष्ट्रपति के अनुमोदन से, उस राज्य की सभी या किन्हीं आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिए सहमत हो सकेगा ।

        अनुच्छेद 316. सदस्यों की नियुक्ति और पदावधिः-

        1. (1) लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और अन्य सदस्यों की नियुक्ति, यदि वह संघ आयोग या संयुक्त आयोग है तो, राष्ट्रपति द्वारा और, यदि वह राज्य आयोग है तो राज्य के राज्यपाल द्वारा की जाएगी ।
          1. (1क) यदि आयोग के अध्यक्ष का पद रिक्त हो जाता है या यदि कोई ऐसा अध्यक्षता अनुपस्थिति के कारण या अन्य कारण से अपने पद के कर्तव्यों का पालन करने में असमर्थ है तो, यथास्थिति, जब तक रिक्त पद पर खंड (1) के अधीन नियुक्त कोई व्यक्ति उस पद का कर्तव्य भार ग्रहण नहीं कर लेता है या जब तक अध्यक्ष अपने कर्तव्यों को फिर से नही संभाल लेता है तब तक आयोग के अन्य सदस्यों में से ऐसा एक सदस्य, जिसे संघ आयोग या संयुक्त आयोग की दशा में राष्ट्रपति और राज्य आयोग की दशा में उस राज्य का राज्यपाल इस प्रयोजन के लिए नियुक्त करे, उन कर्त्तव्यों का पालन करेगा ।
        2. (2) लोक सेवा आयोग का सदस्य, अपने पद ग्रहण की तारीख से छह वर्ष की अवधि तक या संघ आयोग की दशा में पैंसठ वर्ष की आयु प्राप्त कर लेने तक और राज्य आयोग या संयुक्त आयोग की दशा में बासठ वर्ष की आयु प्राप्त कर लेने तक, इनमें से जो भी पहले हो, अपना पद धारण करेगा,
          परन्तुः

          1. (क) लोक सेवा आयोग का कोई सदस्य, संघ आयोग या संयुक्त आयोग की दशा में राष्ट्रपति को और राज्य आयोग की दशा में राज्य के राज्यपाल को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्याग सकेगा ।

        अनुच्छेद 317. लोक सेवा आयोग के किसी सदस्य का हटाया जाना और निलम्बित किया जानाः-

        (2) आयोग के अध्यक्ष या किसी अन्य सदस्य को, जिसके संबंध में खण्ड (1) के अधीन उच्चतम न्यायालय को निर्देश दिया गया है, संघ आयोग या संयुक्त आयोग की दशा में राष्ट्रपति और राज्य आयोग की दशा में राज्यपाल उसके पद से तब तक के लिए निलंबित कर सकेगा जब तक राष्ट्रपति ऐसे निर्देश पर उच्चतम न्यायालय का प्रतिवेदन मिलने पर अपना आदेश पारित नही कर देता है ।

        अनुच्छेद 318. आयोग के सदस्यों और कर्मचारिवृन्द की सेवा की शर्तों के बारे में विनियम बनाने की शक्तिः-

        संघआयोगयासंयुक्तआयोगकीदशामेंराष्ट्रपतिऔरराज्यआयोगकीदशामेंउसराज्यकाराज्यपालविनियमोंद्वाराः

        1. आयोगकेसदस्योंकीसंख्याऔरउनकीसेवाकीशर्तोंकाअवधारणकरसकेगा, और
        2. आयोगकेकर्मचारिवृन्दकेसदस्योंकीसंख्याऔरउनकीसेवाकीशर्तोंकेसम्बन्धमेंउपबंधकरसकेगा। परन्तुलोकसेवाआयोगकेसदस्यकीसेवाकीशर्तोंमेंउसकीनियुक्तिकेपश्चातउसकेलिएअलाभकारीपरिवर्तननहींकियाजाएगा।

        अनुच्छेद 320. लोकसेवाआयोगोंकेकृत्यः-

        भारतसरकारयाकिसीराज्यकीसरकारयाभारतमेंक्राउनकेअधीनयाकिसीदेशीराज्यकीसरकारकेअधीनसिविलहैसियतमेंसेवाकरतेसमयकिसीव्यक्तिकोहुईक्षतियोंकेबारेमेंपेंशनअधिनिर्णीतकियेजानेकेलिएकिसीदावेपरऔरऐसेअधिनिर्णयकीरकमविषयकप्रश्नपर, —

        1. परामर्शकियाजाएगाऔरइसप्रकारउसेनिर्देशितकियेगयेकिसीविषयपरतथाऐसेकिसीअन्यविषयपर, जिसे, यथास्थिति, राष्ट्रपतियाउसराज्यकाराज्यपालउसेनिर्देशितकरें
        2. परामर्शदेनेकालोकसेवाआयेागकाकर्तव्यहोगा।परन्तुअखिलभारतीयसेवाओंकेसंबंधमेंतथासंघकेकार्यकलापसेसंबंधितअन्यसेवाओंऔरपदोंकेसंबंधमेंतथासंघकेकार्यकलापसेसंबंधितअन्यसेवाओंऔरपदोंकेसंबंधमेंभीराष्ट्रपतितथाराज्यके
        3. कार्यकलापसेसंबंधितअन्यसेवाओंऔरपदोंकेसंबंधमेंराज्यपालउनविषयोंकोविनिर्दिष्टकरनेवालेविनियमबनासकेगाजिनमेंसाधारणतयायाकिसीविशिष्टवर्गकेमामलेमेंयाकिन्हींविशिष्टपरिस्थितियोंमेंलोकसेवाआयोगसेपरामर्शकियाजानाआवश्यकनहींहोगा।
        4. राष्ट्रपतियाकिसीराज्यकेराज्यपालद्वाराखंड (3) केपरंतुककेअधीनबनाएगएसभीविनियम, बनायेजानेकेपश्चात्यथाशीघ्र, यथास्थिति,

        संसदकेप्रत्येकसदनयाराज्यकेविधानमण्डलकेसदनयाप्रत्येकसदनकेसमक्षकमसेकमचौदहदिनकेलिएरखेजाएंगेऔरनिरसनयासंशोधनद्वाराकियेगऐऐसेउपांतरणोंकेअधीनहोंगेजोसंसदकेदोनोंसदनयाउसराज्यकेविधानमण्डलकासदनयादोनोंसदनउससत्रमेंकरेंजिसमेंवेइसप्रकाररखेगयेहैं।

        अनुच्छेद 323. लोकसेवाआयोगोंकेप्रतिवेदनः-

        राज्यआयोगकायहकर्तव्यहोगाकिवहराज्यकेराज्यपालकोआयोगद्वाराकिएगएकार्यकेबारेमेंप्रतिवर्षप्रतिवेदनदेऔरसंयुक्तआयोगकायहकर्तव्यहोगाकिऐसेराज्योंमेंसेप्रत्येकके, जिनकीआवश्यकताओंकीपूर्तिसंयुक्तआयोगद्वाराकीजातीहै, राज्यपालकोउसराज्यकेसंबंधमेंआयोगद्वाराकियेगयेकार्यकेबारेमेंप्रतिवर्षप्रतिवेदनदेंऔरदोनोंमेंसेप्रत्येकदशामेंऐसाप्रतिवेदनप्राप्तहोनेपर, राज्यपालउनमामलोंकेसंबंधमें, यदिकोईहों, जिनमेंआयोगकीसलाहस्वीकारनहींकीगयीथी, ऐसीअस्वीकृतिकेकारणोंकोस्पष्टकरनेवालेज्ञापनसहितउसप्रतिवेदनकीप्रतिराज्यकेविधानमण्डलकेसमक्षरखवाएगा।

        अनुच्छेद 324. निर्वाचनोंकेअधीक्षण, निदेशनऔरनियंत्रणकानिर्वाचनआयोगमेंनिहितहोनाः-

        जबनिर्वाचनआयोगऐसाअनुरोधकरेतबराष्ट्रपतियाकिसीराज्यकाराज्यपालनिर्वाचनआयोगयाप्रादेशिकआयुक्तकोउतनेकर्मचारिवृन्दउपलब्धकराएगाजितनेखंड (1) द्वारानिर्वाचनआयोगकोसौंपेगयेकृत्योंकेनिर्वहनकेलिएआवश्यकहों।

        अनुच्छेद 333. राज्योंकीविधानसभाओंमेंआंग्ल-भारतीयसमुदायकाप्रतिनिधित्वः-

        अनुच्छेद 170 मेंकिसीबातकेहोतेहुएभी, यदिकिसीराज्यकेराज्यपालकीयहरायहैकिउसराज्यकीविधानसभामेंआंग्ल-भारतीयसमुदायकाप्रतिनिधित्वआवश्यकहैऔरउसमेंउसकाप्रतिनिधित्वपर्याप्तनहींहैतोवहउसविधानसभामेंउससमुदायकाएकसदस्यनामनिर्देशितकरसकेगा।

        अनुच्छेद 338. राष्ट्रीयअनुसूचितजातिआयोगः-

        जहांकोईऐसाप्रतिवेदन, याउसकाकेाईभागकिसीऐसेविषयसेसंबंधितहैजिसकाकिसीराज्यसरकारसेसंबंधहैतोऐसेप्रतिवेदनकीएकप्रतिउसराज्यकेराज्यपालकोभेजीजाएगीजोउसेराज्यकेविधानमण्डलकेसमक्षरखवाएगाऔरउसकेसाथराज्यसेसंबंधितसिफारिशोंपरकीगयीयाकियेजानेकेलिएप्रस्थापितकार्रवाहीतथायदिकोईऐसीसिफारिशअस्वीकृतकीगयीहैतोअस्वीकृतिकेकारणोंकोस्पष्टकरनेवालाज्ञापनभीहोगा।

        अनुच्छेद 338क. राष्ट्रीयअनुसूचितजनजातिआयोगः-

        जहांकोईऐसीरिपोर्टयाउसकाकेाईभाग, किसीऐसेविषयसेसंबंधितहैजिसकाकिसीराज्यसरकारसेसंबंधहैतोऐसीरिपोर्टकीएकप्रतिउसराज्यकेराज्यपालकोभेजीजाएगीजोउसेराज्यकेविधानमण्डलकेसमक्षरखवाएगाऔरउसकेसाथराज्यसेसंबंधितसिफारिशोंपरकीगयीयाकिएजानेकेलिएप्रस्थापितकार्यवाहीतथायदिकोईऐसीसिफारिशअस्वीकृतकीगयीहैतोअस्वीकृतिकेकारणोंकोस्पष्टकरनेवालाज्ञापनभीहोगा।

        अनुच्छेद 341. अनुसूचितजातियाँः-

        1. राष्ट्रपति, किसीराज्ययासंघराज्यक्षेत्रकेसंबंधमेंऔरजहांवहराज्यहैवहांउसकेराज्यपालसेपरामर्शकरनेकेपश्चातलोकअधिसूचनाद्वारा, उनजातियों, मूलवंशोंयाजनजातियों, अथवाजातियों, मूलवंशोंयाजनजातियोंकेभागोंयाउनमेंकेयूथोंकोविनिर्दिष्टकरसकेगा, जिन्हेंइससंविधानकेप्रयोजनोंकेलिए, यथास्थितिउसराज्ययासंघराज्यक्षेत्रकेसंबंधमेंअनुसूचितजातियॉंसमझाजाएगा।

        अनुच्छेद 342. अनुसूचितजनजातियाँः-

        1. राष्ट्रपति, किसीराज्ययासंघराज्यक्षेत्रकेसंबंधमेंऔरजहांवहराज्यहैवहांउसकेराज्यपालसेपरामर्शकरनेकेपश्चातलोकअधिसूचनाद्वारा, उनजनजातियोंयाजनजातिसमुदायोंअथवाजनजातियोंयाजनजातिसमुदायोंकेभागोंयाउनमेंकेयूथोंकोविनिर्दिष्टकरसकेगा, जिन्हेंइससंविधानकेप्रयोजनोंकेलिए, यथास्थितिउसराज्ययासंघराज्यक्षेत्रकेसंबंधमेंअनुसूचितजनजातियॉंसमझाजाएगा।

        अनुच्छेद 348. उच्चतमन्यायालयऔरउच्चन्यायालयोंमेंऔरअधिनियमों, विधेयकोंआदिकेलिएप्रयोगकीजानेवालीभाषाः-

        1. इसभागकेपूर्वगामीउपबंधोंमेंकिसीबातकेहोतेहुएभी, जबतकसंसदविधिद्वाराअन्यथाउपबंधनकरेतबतक –

          उच्चतमन्यायायलयऔरप्रत्येकउच्चन्यायालयमेंसभीकार्यवाहियॉंअंग्रेजीभाषामेंहोंगी।

          1. संसदकेप्रत्येकसदनयाकिसीराज्यकेविधान-मण्डलकेसदनयाप्रत्येकसदनमेंपुरःस्थापितकियेजानेवालेसभीविधेयकोंयाप्रस्तावितकियेजानेवालेउनकेसंशोधनके
          2. संसदयाकिसीराज्यकेविधान-मण्डलद्वारापारितसभीअधिनियमोंकेऔरराष्ट्रपतियाकिसीराज्यकेराज्यपालद्वाराप्रख्यापितअध्यादेशोंके, और
          3. इससंविधानकेअधीनअथवासंसदयाकिसीराज्यकेविधान-मण्डलद्वाराबनाईगयीकिसीविधिकेअधीननिकालेगयेयाबनाएगयेसभीआदेशों, नियमों, विनियमोंऔरउपविधियोंके,
            प्राधिकृतपाठअंग्रेजीभाषामेंहोंगे।
        2. खण्ड (1) केउपखण्ड (क) मेंकिसीबातकेहोतेहुएभी, किसीराज्यकाराज्यपालराष्ट्रपतिकीपूर्वसहमतिसेउसउच्चन्यायालयकाकार्यवाहियोंमें, जिसकामुख्यस्थानउसराज्यमेंहै, हिन्दीभाषाकायाउसराज्यकेशासकीयप्रयोजनोंकेलिएप्रयोगहोनेवालीकिसीअन्यभाषाकाप्रयोगप्राधिकृतकरसकेगा।परन्तुइसखण्डकीकोईबातऐसेउच्चन्यायालयद्वारादियेगयेकिसीनिर्णय, डिक्रीयाआदेशकोलागूनहींहोगी।
        3. खण्ड (1) केउपखण्ड (ख) मेंकिसीबातकेहोतेहुएभी, जहांकिसीराज्यकेविधान-मण्डलने, उसविधानमण्डलमेंपुरःस्थापितविधेयकोंमेंयाउसकेद्वारापारितअधिनियमोंमेंअथवाउसराज्यकेराज्यपालद्वाराप्रख्यापितअध्यादेशोंमेंअथवाउसउपखण्डकेपैरा (पपप) मेंनिर्दिष्टकिसीआदेश, नियम, विनियमयाउपविधिमेंप्रयोगकेलिएअंग्रेजीभाषासेभिन्नकोईभाषाविहितकीहै, वहांउसराज्यकेराजपत्रमेंउसराज्यकेराज्यपालकेप्राधिकारसेप्रकाशितअंग्रेजीभाषामेंउसकाअनुवादइसअनुच्छेदकेअधीनउसकाअंग्रेजीभाषामेंप्राधिकृतपाठसमझाजाएगा।

        अनुच्छेद 356. राज्योंमेंसांविधानिकतंत्रकेविफलहोजानेकीदशामेंउपबन्धः-

        1. यदिराष्ट्रपतिका, किसीराज्यकेराज्यपालसेप्रतिवेदनमिलनेपरयाअन्यथा, यहसमाधानहोजाताहैकिऐसीस्थितिउत्पन्नहोगयीहैजिसमेंउसराज्यकाशासनइससंविधानकेउपबंधोंकेअनुसारनहींचलायाजासकताहै, तोराष्ट्रपतिउद्घोषणाद्वारा –
          1. उसराज्यकीसरकारकेसभीयाकोईकृत्यऔरराज्यपालमेंयाराज्यकेविधानमण्डलसेभिन्नराज्यकेकिसीनिकाययाप्राधिकारीमेंनिहितयाउसकेद्वाराप्रयोक्तव्यसभीयाकोईशक्तियॉंअपनेहाथमेंलेसकेगा।
          2. यहघोषणाकरसकेगाकिराज्यकेविधान-मण्डलकीशक्तियॉंसंसदद्वारायाउसकेप्राधिकारकेअधीनप्रयोक्तव्यहोंगी
          3. राज्यकेकिसीनिकाययाप्राधिकारीसेसंबंधितइससंविधानकेकिन्हींउपबंधोंकेप्रवर्तनकोपूर्णतःयाभागतःनिलम्बितकरनेकेलिएउपबंधोंसहितऐसेआनुषंगिकऔरपारिणामिकउपबंधकरसकेगाजोउद्घोषणाकेउद्देश्योंकोप्रभावीकरनेकेलिएराष्ट्रपतिकोआवश्यकयावांछनीयप्रतीतहोंः
            परन्तुइसखण्डकीकोईबातराष्ट्रपतिकोउच्चन्यायालयमेंनिहितयाउसकेद्वाराप्रयोक्तव्यकिसीशक्तिकोअपनेहाथमेंलेनेयाउच्चन्यायालयोंसेसंबंधितइससंविधानकेकिसीउपबंधकेप्रवर्तनकोपूर्णतःयाभागतःनिलम्बितकरनेकेलिएप्राधिकृतनहींकरेगी।
            (2) ऐसीकोईउद्घोषणाकिसीपश्चात््वर्तीउद्घोषणाद्वारावापसलीजासकेगीयाउसमेंपरिवर्तनकियाजासकेगा।

        अनुच्छेद 361. राष्ट्रपतिऔरराज्यपालोंऔरराजप्रमुखोंकासंरक्षणः-

        1. राष्ट्रपतिअथवाराज्यकाराज्यपालयाराज्यप्रमुखअपनेपदकीशक्तियोंकेप्रयोगऔरकर्तव्योंकेपालनकेलिएयाउनशक्तियोंकाप्रयोगऔरकर्तव्योंकापालनकरतेहुएअपनेद्वाराकिएगएयाकियेजानेकेलिएतात्पर्यितकिसीकार्यकेलिएकिसीन्यायालयकोउत्तरदायीनहींहोगा।
        2. राष्ट्रपतियाकिसीराज्यकेराज्यपालकेविरुद्धउसकीपदावधिकेदौरानकिसीन्यायालयमेंकिसीभीप्रकारकीदांडिककार्यवाहीसंस्थितनहींकीजाएगीयाचालूनहींरखीजाएगी।
        3. राष्ट्रपतियाकिसीराज्यकेराज्यपालकीपदावधिकेदौरानउसकीगिरफ्तारीयाकारावासकेलिएकिसीन्यायालयसेकोईआदेशिकानिकालीनहींजाएगी।
        4. राष्ट्रपतियाकिसीराज्यकेराज्यपालकेरूपमेंअपनापदग्रहणकरनेसेपहलेयाउसकेपश्चातउसकेद्वाराअपनीवैयक्तिकहैसियतमेंकियेगयेयाकिएजानेकेलिएतात्पर्यितकिसीकार्यकेसंबंधमेंकोईसिविलकार्यवाहियॉं, जिनमेंराष्ट्रपतियाऐसेराज्यकेराज्यपालकेविरुद्धअनुतोषकादावाकियाजाताहै, उसकीपदावधिकेदौरानकिसीन्यायालयमेंतबतकसंस्थितनहींकीजाएगीजबतककार्यवाहियोंकीप्रकृति, उनकेलिएवादहेतुक, ऐसीकार्यवाहियोंकोसंस्थितकरनेवालेपक्षकारकानाम, वर्णन, निवास-स्थानऔरउसअनुतोषकाजिसकावहदावाकरताहै, कथनकरनेवालीलिखितसूचना, यथास्थिति, राष्ट्रपतियाराज्यपालकोपरिदत्तकियेजानेयाउसकेकार्यालयमेंछोड़ेजानेकेपश्चात्दोमासकासमयसमाप्तनहींहोगयाहै।

        अनुच्छेद 367, व्याख्याः-

        इससंविधानमेंकोईभीसंदर्भचाहेवहसंसदद्वारानिर्मितहो, अथवाकोईभीअधिनियमअथवाकानूनचाहेवहराज्यविधानमण्डलद्वाराबनायागयाहो, राष्ट्रपतिअथवाराज्यपालद्वाराजारीकियेगएअध्यादेशकेसंदर्भकेरूपमेंमानाजाएगा, जैसाभीमामलाहो।

        द्वितीयवअन्यअनुसूचियोंकेप्रावधान

    • श्री बंडारू दत्तात्रेय (माननीय राज्यपाल, हरियाणा)

          • श्री बखविन्दर सिंह, विशेष कार्य अधिकारी राज्यपाल/उप सचिव, हरियाणा राजभवन
            • श्री वजिंदर कुमार, आशुलिपिक
          • श्री बी.ए. भानुसंकर, सलाहकार (आईटी) राज्यपाल
          • श्री कैलास नागेश, निजि सचिव राज्यपाल
          • श्री महेश रामगुंडम, निजि सहायक राज्यपाल
      • श्री अतुल द्विवेदी, भा0प्र0से0 (सचिव राज्यपाल, विभागाध्यक्ष व प्रशासनिक सचिव)
          • श्री बिजेन्दर सिंह कादयान, निजि सचिव/सचिव राज्यपाल
        • श्री सुमेर प्रताप सिंह, भारतीय पुलिस सेवा परिसहाय राज्यपाल (पुलिस) और मेजर जसदीप सिंह, एसएम, परिसहाय राज्यपाल (सैना)
          • श्री राजीव देसवाल, सहायक
          • श्री सुरेंद्र सिंह, लिपिक
          • ड्राइवरध्वाहन
        • श्री अमरजीत सिंह, एचसीएस, संयुक्त सचिव (सीएम विंडो/ सीपीग्राम/ प्रथम अपीलीय प्राधिकारी/ई-ऑफिस/सीएजी-ऑडिट-1/राज्य प्रशिक्षण नीति)
          • श्री विपिन गुलाटी, निजि सहायक/संयुक्त सचिव
          • श्री विवेक गर्ग, जूनियर प्रोग्रामर/ नेटवर्क सहायक (आईटी सेल)
        • श्रीमती अनीता, अवर सचिव (मुकदमेबाजी प्रबंधन प्रणाली)
          • श्री महाबीर सिंह, सामान्य सहायक
          • श्रीमती कमलेश, विविध सहायक
          • श्रीमती सोनू, अनुसंधान सहायक
          • श्री ओ.पी थपलियाल, विश्वविद्यालय सहायक
          • श्री विजय कुमार, लिखित प्रमाण रखने वाला/विश्वविद्यालय सहायक/विविध सहायक
          • श्रीमती उमा देवी, रोजनामचा रखने वाला
          • श्री मदनेश कुमार, डिस्पैचर
        • श्रीमती विनोद सभरवाल, लेखा अधिकारी (एसपीआईओ/आरटीआई/डीडीओ/एनएपीएस/जीईएम/सीएजी-लेखा परीक्षा-2)
        • श्रीमती वीणा देवी, उपाधीक्षक
          • श्री संदीप कुमार, खजांची
          • श्री अनिल धनिया, सहायक लेखा
          • श्री अनिल कुमार, गैराज क्लर्क
          • श्री धर्मवीर सिंह, लिपिक
        • श्री राजीव रंजन रॉय, परामर्श संपादक & श्री सतीश मेहरा, डीडीआईपीआर
          • श्री अनिल कुमार, फोटोग्राफर
          • श्रीमती स्वीटी भारद्वाज, एसएसएस
        • श्री जगन नाथ बैंस, सीडीएच
          • श्री. नरेंद्र सिंह, स्टोर कीपर
          • श्री मुकेश कुमार पहाड़िया, केयर टेकर
        • डॉ. राकेश तलवार, वरिष्ठ चिकित्सा अधिकारी (हरियाणा राजभवन औषधालय)
          • श्रीमती रेखा, फार्मासिस्ट
          • श्री आशीष, लैब. तकनीशियन

    There are souls for whom we have fewer apt words to describe their contributions in laying the foundation of a strong society and the nation. Savitribai Phule is one of them. Along with her husband, Mahatma Jyotiba Phule, she fought bravely against untouchability, hegemonic, castetist, status quoist forces to ensure that girls from weaker sections of society, in particular those from backward, scheduled castes and tribes, have access to education. She opened schools for them and lit the light of hope in millions of lives at a time when they did not think of getting into schools for education.

    It was truly a watershed moment towards the holistic empowerment of women in our society, and Savitribai Phule, who epitomized ‘Naari Shakti,’ was the harbinger of this great revolution, which has now become a principal focus of the Central and state governments. Women’s empowerment has now become a buzzword. I join the nation in paying my humble tributes to Savitribai Phule, India’s first woman teacher, on her birth anniversary (January 3).

    Today her vision assumes more significance than ever before as we are building a new India – Ek Bharat, Shreshta Bharat, which cannot be realized without implementing the vision of Savitribai Phule. Her commitment to serve the poorest among poor, who were devoid of any right to access health and education facilities because of untouchability and the castes they were born in, is amply reflected in our Constitution, which is premised on the four pillars of equality, justice, fraternity and liberty.

    Special efforts including affirmative measures are being initiated at every possible level to uplift poor women in a wholesome manner. ‘Beti Bachao, Beti Padhao Abhiyan’ (BBBPA) has proved a blessing in disguise. It has a great impact on improving child sex ratio. As per the latest available report of Health Management Information System, an improving trend of 19 points at the national level from 918 (2014-15) to 937 (2020- 21) has been observed. It is 927 in Haryana.

    Our daughters are very efficient, and if provided with the right kind of support ecosystem, they will do wonders. Some of great women role models India has produced are Indira Gandhi, Sushma Swaraj, Nirmala Sitharaman, J Jayalalitha, Anandi Gopal Joshi, one of the first female doctors; Justice Anna Chandy, first female judge in India, Kalpana Chawla, first Indian woman in space; Abala Bose, known for her efforts in the advancement of women’s education; Anasuya Sarabhai, social worker who fought for women’s labour rights; Arati Saha, first Indian and Asian woman to swim across the English Channel in 1959, PV Sindhu, and Sain Nehwal, Saina Nehwal, an ace badminton player, Karnam Malleswari, weightlifter, to name a few.

    If we talk of Haryana, there is no dearth of women talent. For example, Rani Rampal, captain of Indian women hockey team; Geetika Jakhar, wrestler; Deepa Malik, athlete; Sakshi Malik, freestyle wrestler; Phogat sisters; Krishna Poonia, an international gold-medalist Indian discus thrower; Manpreet Kaur, professional Olympic shot putter; and Santosh Yadav, first woman in the world to climb Mount Everest twice and the first woman to successfully climb Mount Everest from Kangshung Face.

    So what I am trying to convey is the fact that we must not underestimate the talent of women. They have a huge potential for skills, arts, management, and concentration, discipline and determination of leadership to lead us on multiple fronts. What is needed is an ecosystem, which encourages them without any discrimination. Today we have five women led startups which have entered into the unicorn club. They are Upasana Taku led digital payments solution Mobiwik; Ruchi Deepak’s Acko Insurance; Ruchi Kalra’s OfBusiness, and Ghzal Alagh’s Mamaearth. As per the 6th Economic Census, we have 8.05 million women entrepreneurs in the country.

    It is a matter of happiness that Prime Minister Narendra Modi ji has initiated a number of initiatives to empower women. The Women Entrepreneurship Platform (WEP) is NITI Aayog’s flagship initiative, a one-of-its-kind, unified information portal for women entrepreneurs. The National Education Policy-2020 prioritizes gender equity and equitable access to quality education to all students, with a special emphasis on socially and economically disadvantaged groups. Under the Swachh Vidyalaya Mission, all schools will have at least one functional toilet for girls. All stakeholders should join hands to provide toilet facilities for girls in every institution. Lack of toilets has been a major stumbling block for girls’ enrolment in schools in rural areas.

    Pradhan Mantri Ujjwala Yojana (PMUY) aims to safeguard the health of women by providing them with clean cooking fuel and also from drudgery of collecting firewood. The total connections released under Pradhan Mantri Ujjwala Yojana as on October 20, 2021 stand at over 8.48 crore. Similarly, under the National Rural Livelihood Mission, as of date, 6768 blocks have been covered under the programme with mobilizing 7.7 crore women into 70 lakh SHGs. From providing initial capitalization support to the SHGs are being credited to the tune of almost Rs 80,000 crore annually. They should also be provided with facilities to market their products. For this, private sector players should come forward and buy their products.

    Triple Talaq law making ‘instant divorce’ a criminal offence and enhancing the age of marriage of girls to 21 are milestone steps. These progressive steps are in tune with the vision of Savitribai Phule and should be properly implemented. I am tempted to share a fact here. As the Chancellor, I was recently honoured 42 gold medalists at a university, out of which 36 were girls. It is a great signal. Women are coming forward in every field and they should be encouraged. Reservation and affirmative measures meant for them should be properly implemented and reviewed periodically. We should have a multi-pronged approach in bringing women of weaker sections of society and those in rural areas on par with others, which will be a true tribute to Savitribai Phule.

    In a nutshell, the path shown by Savitribai Phule for women’s wholesome empowerment must be followed by all in its true letter and spirit. She fought for equality for women in all respects. Her vision of social reforms is aligned to education and economic empowerment of women. Today our mindset towards girl children has changed. Earlier, a girl child was seen as a burden but now as Maha Lakshmi. It is a good omen. Let us strive hard for all round development of women as envisioned by Savitribai Phule to realize the goal of inclusive growth.

    (The views expressed are strictly of the author)

    Chandigarh, January 14, 2022: Haryana Governor Shri Bandaru Dattatraya on Friday extended his warm congratulations and best wishes to Shri Ramchandra Ahlawat, 76, resident of Lakadia, Jhajjar, for winning the Gold Medal at the recently held International Yoga Festival in Puducherry. Shri Ahlawat secured the first position among 50 plus age group participants.
    Governor Shri Dattatraya, while encouraging him during a telephonic conversation today, said that doing yoga is the key to staying free from diseases in today’s time. Yoga strengthens people’s will power and makes them energetic. He advised Shri Ahlawat to spread the word about benefits of Yoga so that more and more people adopt Yoga to stay healthy.
    He said that it is a matter of pride for Haryana that Shri Ahlawat has won the Gold Medal in Yoga. Thanks to the efforts of Prime Minister Shri Narendra Modi ji, the International Yoga Day is celebrated on June 21 every year, which is taking the Indian Yoga system to every nook and corner of the world. The Haryana Governor said that Yoga is being promoted continuously in the country and the state, which is a matter of pride for the countrymen.
    During this telephonic conversation, Shri Ahlawat thanked Shri Dattatraya and said that he is feeling very happy after getting good wishes and compliments from the state’s Governor.
    Shri Ahlawat said that he is feeling encouraged and will try his level best to further promote yoga among the general public. He described yoga as an ideal way of life. He said that in the year 2009, he suffered from a serious illness and after that started yoga. His life changed and he is now completely healthy at the age of 76.

    Haryana Governor Shri Bandaru Dattatraya on Friday called up and congratulated Shri Ramchandra Ahlawat, resident of Lakadia, Jhajjar, for winning the Gold Medal at the age of 76 at the recently held International Yoga Festival in Puducherry.

    Haryana Governor Shri Bandaru Dattatraya on Friday called up and congratulated Shri Ramchandra Ahlawat, resident of Lakadia, Jhajjar, for winning the Gold Medal at the age of 76 at the recently held International Yoga Festival in Puducherry

    Chandigarh, January 14, 2022: Haryana Governor Shri Bandaru Dattatraya on Friday conveyed his heartiest greetings to the people of the country and the state on the pious occasion of Makar Sankranti and wished them good health, prosperity and happiness.

    He said that the festival of Makar Sankranti is celebrated with great enthusiasm in Haryana as Sakrant. This festival is a symbol of respect for daughters and blessings of elders in Haryana. On this day, people present shawls and blankets to their elders as a mark of respect and get their blessings.
    “Our festivals are a unique and indispensable part of our civilization and traditions. Since time immemorial, we have been following a rich culture of celebrating various festivals, depicting the vibrancy and inclusiveness of our diversity,” said Shri Dattatraya.
    Makar Sankranti, which is also celebrated as Uttarayan and Pongal, is considered as the oldest and the most colourful harvest festival in north India. People celebrate the festival by flying kites, expressing happiness and desire to soar and leap through life.
    The Governor said that in Andhra and Telangana, people celebrate Makar Sankranti festival for four days during which they light bonfires, sing and dance. They also wear new clothes and offer traditional foods to their ancestors.
    Pongal is a vibrant festival of Tamil Nadu, which the people of the state celebrate with usual fervour and enthusiasm. Magh Bihu is celebrated with zeal in Assam. Our every festival signifies how well connected we are to Mother Nature, said the Governor.

    AIDE DE-CAMP (MILITARY ) TO GOVERNOR OF HARYANA
    Sl No. Name From: To:
    1 Maj Jasdeep Singh , SM 10.08.2020 Till Date
    2 Sqn Ldr Saurabh Yadav 25.12.2017 09.08.2020
    3 Maj Krishna Singh 29.06.2015 25.12.2017
    4 Maj Anand A Shirali 09.01.2013 29.06.2015
    5 Maj Bhaskar Jha 20.11.2010 09.01.2013
    6 Maj Abhishek Sharma 08.09.2006 23.04.2010
    7 Maj Shashank Kushwaha 16.12.2004 08.09.2006
    8 Capt Shashank Kushwaha 01.09.2003 16.12.2004
    9 Capt Sreejith K S M 15.03.2001 01.09.2003
    10 Capt C P Rajeev 13.01.1999 15.03.2001
    11 Capt Nitinysawant 22.12.1995 12.10.1999
    12 Capt S Benjamin 11.03.1993 22.12.1995
    13 Capt Ashokan K 05.10.1990 11.03.1993
    14 Capt R K Bhatia 14.07.1988 31.10.1990
    15 Capt G M Vishwanathan 05.04.1986 31.05.1988
    16 Capt V K Verma 01.08.1984 21.02.1986
    17 Capt Ashwani Kumar 01.02.1983 25.07.1984
    18 Capt J S Yadav 01.03.1982 28.02.1983
    19 Capt H S Chahal 01.03.1980 28.02.1982
    20 Capt Jaswant Singh Sirohi 1974 1977
    21 Capt Premvir Singh 1971 1974
    22 Capt S S Raheja 1968 1970

    अनुच्छेद 151(2).संपरीक्षा प्रतिवेदन:

    भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के किसी राज्य के लेखाओं संबंधी प्रतिवेदनों को उस राज्य के राज्यपाल के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा, जो उनको राज्य के विधान मण्डल के समक्ष रखवाएगा ।

    अनुच्छेद 153. राज्यों के राज्यपाल:

    प्रत्येक राज्य के लिए एक राज्यपाल होगा । परन्तु इस अनुच्छेद की कोई बात एक ही व्यक्ति को दो या अधिक राज्यों के लिए राज्यपाल नियुक्त किये जाने से निवारित नहीं करेगी ।

    अनुच्छेद 154. राज्य की कार्यपालिका शक्ति:

    1. राज्य की कार्यपालिका शक्ति राज्यपाल में निहित होगी और वह इसका प्रयोग इस संविधान के अनुसार स्वयं या अपने अधीनस्थ अधिकारियों के द्वारा करेगा ।
    2. इस अनुच्छेद की कोई बात–
      1. किसी विद्यमान विधि द्वारा किसी अन्य प्राधिकारी को प्रदान किये गये कृत्य राज्यपाल को अंतरित करने वाली नहीं समझी जाएगी, या
      2. राज्यपाल के अधीनस्थ किसी प्राधिकारी को विधि द्वारा कृत्य प्रदान करने से संसद या राज्य के विधान-मण्डल को निवारित नहीं करेगी ।

    अनुच्छेद 155. राज्यपाल की नियुक्ति:

    राज्य के राज्यपाल को राष्ट्रपति अपने हस्ताक्षर और मुद्रा सहित अधिपत्र द्वारा नियुक्त करेगा ।

    अनुच्छेद 156. राज्यपाल की पदावधि:

    1. राज्यपाल, राष्ट्रपति के प्रसाद पर्यन्त पद धारण करेगा ।
    2. राज्यपाल, राष्ट्रपति को सम्बोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्याग सकेगा ।
    3. इस अनुच्छेद के पूर्वगामी उपबंधों के अधीन रहते हुए, राज्यपाल अपने पदग्रहण की तारीख से पांच वर्ष की अवधि तक पद धारण करेगा । परन्तु राज्यपाल, अपने पद की अवधि समाप्त हो जाने पर भी, तब तक पद धारण करता रहेगा जब तक उसका उत्तराधिकारी अपना पद ग्रहण नहीं कर लेता है ।

    अनुच्छेद 157. राज्यपाल नियुक्त होने के लिए अर्हताएं:

    कोई व्यक्ति राज्यपाल नियुक्त होने का पात्र तभी होगा जब वह भारत का नागरिक है और पैंतीस वर्ष की आयु पूरी कर चुका है ।

    अनुच्छेद 158. राज्यपाल पद के लिए शर्तें:

    1. राज्यपाल संसद के किसी सदन का या पहली अनुसूची में विनिर्दिष्ट किसी राज्य के विधान-मण्डल के किसी सदन का सदस्य नहीं होगा और यदि संसद के किसी सदन का या ऐसे किसी राज्य के विधान-मण्डल के किसी सदन का कोई सदस्य राज्यपाल नियुक्त हो जाता है तो यह समझा जाएगा कि उसने उस सदन में अपना स्थान राज्यपाल के रूप में अपने पद ग्रहण की तारीख से रिक्त कर दिया है ।
    2. राज्यपाल अन्य कोई लाभ का पद धारण नहीं करेगा ।
    3. राज्यपाल, बिना किराया दिए, अपने शासकीय निवासों के उपयोग का हकदार होगा और ऐसी उपलब्धियों, भत्तों और विशेषाधिकारों का भी, जो संसद, विधि द्वारा, अवधारित करे और जब तक इस निमित्त इस प्रकार उपबन्ध नहीं किया जाता है तब तक ऐसी उपलब्धियों, भत्तों और विशेषाधिकारों का, जो दूसरी अनुसूची में विनिर्दिष्ट हैं, हकदार होगा ।
      1. जहां एक ही व्यक्ति को दो या अधिक राज्यों का राज्यपाल नियुक्त किया जाता है वहाॅ उस राज्यपाल को संदेय उपलब्धियाॅं और भत्ते उन राज्यों के बीच ऐसे अनुपात में आवण्टित किये जायेंगे जो राष्ट्रपति आदेश द्वारा अवधारित करे ।
    4. राज्यपाल की उपलब्धियाॅं और भत्ते उसकी पदावधि के दौरान कम नहीं किए जायेंगे ।

    अनुच्छेद 159. राज्यपाल द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान:

    प्रत्येक राज्यपाल और प्रत्येक व्यक्ति, जो राज्यपाल के कृत्यों का निर्वहन कर रहा है, अपना पद ग्रहण करने से पहले उस राज्य के सम्बन्ध में अधिकारिता का प्रयोग करने वाले उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति या उसकी अनुपस्थिति में उस न्यायालय के उपलब्ध ज्येष्ठतम न्यायाधीश के समक्ष निम्नलिखित प्ररूप में शपथ लेगा या प्रतिज्ञान करेगा और उस पर अपने हस्ताक्षर करेगा, अर्थात्:
    ”मैं अमुक………. , ईश्वर की शपथ लेता हॅूं /सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञान करता हॅंू कि मैं श्रद्धापूर्वक ……………. (राज्य का नाम) के राज्यपाल के पद का कार्यपालन (अथवा राज्यपाल के कृत्यों का निर्वहन) करूॅंगा तथा अपनी पूरी योग्यता से संविधान और विधि का परिरक्षण, संरक्षण और प्रतिरक्षण करूॅंगा और मैं …………… (राज्य का नाम) की जनता की सेवा और कल्याण में निरत रहॅंूगा ।”

    अनुच्छेद 160. कुछ आकस्मिकताओं में राज्यपाल के कृत्यों का निर्वहन:

    राष्ट्रपति ऐसे किसी आकस्मिकता में, जो इस अध्याय में उपबन्धित नहीं है, राज्य के राज्यपाल के कृत्यों के निर्वहन के लिए ऐसा उपबंध कर सकेगा जो वह ठीक समझता है ।

    अनुच्छेद 161. क्षमा आदि की और कुछ मामलों में दंडादेश के निलम्बन, परिहार या लघुकरण की राज्यपाल की शक्ति:

    किसी राज्य के राज्यपाल को उस विषय संबंधी, जिस विषय पर उस राज्य की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार है, किसी विधि के विरुद्ध किसी अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराये गये किसी व्यक्ति के दंड को क्षमा, उसका प्रविलम्बन, विराम या परिहार करने की अथवा दंडादेश के निलम्बन, परिहार या लघुकरण की शक्ति होगी ।

    अनुच्छेद 163. राज्यपाल को सहायता और सलाह देने के लिए मंत्रि-परिषद्:

    1. जिन बातों में इस संविधान द्वारा या इसके अधीन राज्यपाल से यह अपेक्षित है कि वह अपने कृत्यों या उनमें से किसी को अपने विवेकानुसार करे, उन बातों को छोड़कर राज्यपाल को अपने कृत्यों का प्रयोग करने में सहायता और सलाह देने के लिए एक मंत्रि-परिषद् होगी जिसका प्रधान, मुख्यमंत्री होगा ।
    2. यदि कोई प्र्रश्न उठता है कि कोई विषय ऐसा है या नहीं, जिसके सम्बन्ध में इस संविधान द्वारा या इसके अधीन राज्यपाल से यह अपेक्षित है कि वह अपने विवेकानुसार कार्य करे तो राज्यपाल का अपने विवेकानुसार किया गया विनिश्चय अंन्तिम होगा और राज्यपाल द्वारा की गयी किसी बात की विधिमान्यता इस आधार पर प्र्रश्नगत नहीं की जाएगी कि उसे अपने विवेकानुसार कार्य करना चाहिए था या नहीं ।
    3. इस प्रश्न की किसी न्यायालय में जाॅंच नहीं की जाएगी कि क्या मंत्रियों ने राज्यपाल को कोई सलाह दी, और यदि दी तो क्या दी।

    अनुच्छेद 164. मंत्रियों के बारे में अन्य उपबन्ध:

    1. मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल करेगा और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राज्यपाल, मुख्यमंत्री की सलाह पर करेगा तथा मंत्री, राज्यपाल के प्रसादपर्यन्त अपने पद धारण करेंगे । परन्तु (छत्तीसगढ़, झारखण्ड), मध्य प्रदेश और (उड़ीसा) राज्यों में जनजातियों के कल्याण का भारसाधक एक मंत्री होगा जो साथ ही अनुसूचित जातियों और पिछड़े वर्गों के कल्याण का या किसी अन्य कार्य का भी भारसाधक हो सकेगा ।
      1. किसी राज्य की मंत्रि-परिषद में, मुख्यमंत्री सहित मंत्रियों की कुल संख्या उस राज्य की विधान सभा के सदस्यों की कुल संख्या के पन्द्रह प्रतिशत से अधिक नहीं होगी । परन्तु किसी राज्य में मुख्यमंत्री सहित मंत्रियों की संख्या बारह से कम नहीं होगी । परन्तु यह और कि जहां संविधान (इक्यानबेवां संशोधन) अधिनियम, 2003 के प्रारम्भ पर किसी राज्य की मंत्रि-परिषद में मुख्यमंत्री सहित की कुल संख्या, यथास्थिति, उक्त पन्द्रह प्रतिशत या पहले परन्तुक में विनिर्दिष्ट संख्या से अधिक है वहां उस राज्य मंत्रियों की कुल संख्या ऐसी तारीख से जो राष्ट्रपति लोक अधिसूचना द्वारा नियत करे, छह मास के भीतर इस खण्ड के उपबन्धों के अनुरूप लाई जाएगी ।
      2. किसी राजनीतिक दल का किसी राज्य की विधान सभा या किसी राज्य के विधान-मण्डल के किसी सदन का जिसमें विधान परिषद् हैं, कोई सदस्य जो दसवीं अनुसूची के पैरा 2 के अधीन उस सदन का सदस्य होने के लिए निरर्हित है, अपनी निरर्हता की तारीख से प्रारम्भ होने वाली और उस तारीख तक जिसको ऐसे सदस्य के रूप में उसकी पदावधि समाप्त होगी या जहां वह, ऐसी अवधि की समाप्ति के पूर्व यथास्थिति, किसी राज्य की विधान सभा के लिए या विधान परिषद् वाले किसी राज्य के विधान-मण्डल के किसी सदन के लिए कोई निर्वाचन लड़ता है, उस तारीख तक जिसको वह निर्वाचित घोषित किया जाता है, इनमें से जो भी पूर्वतर हो, की अवधि के दौरान, खण्ड (1) के अधीन मंत्री के रूप में नियुक्त किये जाने के लिए भी निरर्हित होगा ।
    2. मंत्रि-परिषद राज्य की विधान सभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होगी ।
    3. किसी मंत्री द्वारा अपना पद ग्रहण करने से पहले, राज्यपाल तीसरी अनुसूची में इस प्रयोजन के लिए दिये गये प्ररूपों के अनुसार उसको पद की और गोपनीयता की शपथ दिलाएगा ।
    4. कोई मंत्री, जो निरन्तर छह मास की किसी अवधि तक राज्य के विधान मण्डल का सदस्य नहीं है, उस अवधि की समाप्ति पर मंत्री नहीं रहेगा ।
    5. मंत्रियों के वेतन और भत्ते ऐसे होंगे जो उस राज्य का विधान-मण्डल, विधि द्वारा, समय-समय पर अवधारित करे और जब तक उस राज्य का विधान-मण्डल इस प्रकार अवधारित नहीं करता है तब तक ऐसे होंगे जो दूसरी अनुसूची में विर्निदिष्ट हैं ।

    अनुच्छेद 165. राज्य का महाधिवक्ता:

    1. प्रत्येक राज्य का राज्यपाल, उच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त होने के लिए अर्हित किसी व्यक्ति को राज्य का महाधिवक्ता नियुक्त करेगा ।
    2. महाधिवक्ता का यह कत्र्तव्य होगा कि वह उस राज्य की सरकार को विधि संबंधी ऐसे विषयों पर सलाह दे और विधिक स्वरूप के ऐसे अन्य कत्र्तव्यों का पालन करे जो राज्यपाल उसको समय-समय पर निर्देशित करे या सौंपे और उन कृत्यों का निर्वहन करे जो उसको इस संविधान अथवा तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि द्वारा या उसके अधीन प्रदान किये गये हों ।
    3. महाधिवक्ता, राज्यपाल के प्रसादपर्यन्त पद धारण करेगा और ऐसा पारिश्रमिक प्राप्त करेगा जो राज्यपाल अवधारित करे ।

    अनुच्छेद 166. राज्य की सरकार के कार्य का संचालन:

    1. किसी राज्य की सरकार की समस्त कार्यपालिका कार्रवाई राज्यपाल के नाम से की हुई कहीं जाएगी ।
    2. राज्यपाल के नाम से किये गये और निष्पादित आदेशों और अन्य लिखतों को ऐसी रीति से अधिप्रमाणित किया जाएगा जो राज्यपाल द्वारा बनाये जाने वाले नियमों में विनिर्दिष्ट की जाए और इस प्रकार अधिप्रमाणित आदेश या लिखत की विधिमान्यता इस आधार पर प्र्रश्नगत नहीं की जाएगी कि वह राज्यपाल द्वारा किया गया या निष्पादित आदेश या लिखत नहीं है ।
    3. राज्यपाल, राज्य की सरकार का कार्य अधिक सुविधापूर्वक किये जाने के लिए और जहाॅं तक वह कार्य ऐसा कार्य नहीं है जिसके विषय में इस संविधान द्वारा या इसके अधीन राज्यपाल से यह अपेक्षित है कि वह अपने विवेकानुसार कार्य करे वहाॅं तक मंत्रियों में उक्त कार्य के आबंटन के लिए नियम बनाएगा ।

    अनुच्छेद 167. राज्यपाल को जानकारी देने आदि के सम्बन्ध में मुख्यमंत्री के कत्र्तव्य: प्रत्येक राज्य के मुख्यमंत्री का यह कत्र्तव्य होगा कि वह:

    1. राज्य के कार्यों के प्रशासन सम्बन्धी और विधान विषयक प्रस्थापनाओं सम्बन्धी मंत्रि-परिषद् के सभी विनिश्चय राज्यपाल को संसूचित करे ।
    2. राज्य के कार्यों के प्रशासन सम्बन्धी और विधान विषयक प्रस्थापनाओं सम्बन्धी जो जानकारी राज्यपाल मांगे, वह दे और
    3. किसी विषय को जिस पर किसी मंत्री ने विनिश्चय कर दिया है किन्तु मंत्रिपरिषद ने विचार नहीं किया है, राज्यपाल द्वारा अपेक्षा किये जाने पर परिषद के समक्ष विचार के लिए रखे ।

    अनुच्छेद 168. राज्यों के विधान-मण्डलों का गठन:

    1. प्रत्येक राज्य के लिए एक विधान मण्डल होगा जो राज्यपाल और:
      1. बिहा र, महाराष्ट्र, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश राज्यों में दो सदनों से
      2. अन्य राज्यों में एक सदन से, मिलकर बनेगा
    2. जहाॅं किसी राज्य के विधान-मण्डल के दो सदन हैं वहाॅं एक का नाम विधान परिषद और दूसरे का नाम विधान सभा होगा और जहाॅं केवल एक सदन है वहाॅं उसका नाम विधान सभा होगा ।
    3. अनुच्छेद 171. विधान परिषदों की संरचना:

      किसी राज्य की विधान परिषद के सदस्यों की कुल संख्या का: ………

      शेष सदस्य राज्यपाल द्वारा खण्ड (5) के उपबन्धों के अनुसार नाम निर्देशित किये जाएंगे ।

      राज्यपाल द्वारा खण्ड (3) के उपखण्ड (ड.) के अधीन नाम निर्देशित किये जाने वाले सदस्य ऐसे व्यक्ति होंगे जिन्हें निम्नलिखित विषयों के सम्बन्ध में विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव है, अर्थात्: साहित्य, विज्ञान, कला, सहकारी आंदोलन और समाज सेवा ।

      अनुच्छेद 174. राज्य के विधान-मण्डल के सत्र, सत्रावसान और विघटन:

      1. राज्यपाल, समय-समय पर, राज्य के विधान मंडल के सदन या प्रत्येक सदन को ऐसे समय और स्थान पर, जो वह ठीक समझे, अधिवेशन के लिए आहूत करेगा किन्तु उसके एक सत्र की अन्तिम बैठक और आगामी सत्र की प्रथम बैठक के लिए नियत तारीख के बीच छह मास का अन्तर नहीं होगा ।
      2. राज्यपाल, समय-समय पर-
        1. सदन का या किसी सदन का सत्रावसान कर सकेगा ।
        2. विधान सभा का विघटन कर सकेगा ।

      अनुच्छेद 175. सदन या सदनों में अभिभाषण का और उनको संदेश भेजने का राज्यपाल का अधिकार:

      1. राज्यपाल, विधान सभा में या विधान परिषद् वाले राज्य की दशा में उस राज्य के विधान-मंडल के किसी एक सदन में या एक साथ समवेत दोनों सदनों में, अभिभाषण कर सकेगा और इस प्रयोजन के लिए सदस्यों की उपस्थिति की अपेक्षा कर सकेगा ।
      2. राज्यपाल, राज्य के विधान-मण्डल में उस समय लम्बित किसी विधेयक के सम्बन्ध में संदेश या कोई अन्य संदेश, उस राज्य के विधान-मण्डल के सदन या सदनों को भेज सकेगा और जिस सदन को कोई संदेश इस प्रकार भेजा गया है वह सदन उस संदेश द्वारा विचार करने के लिए अपेक्षित विषय पर सुविधानुसार शीघ्रता से विचार करेगा ।

      अनुच्छेद 176. राज्यपाल का विशेष अभिभाषण:

      1. राज्यपाल, विधान सभा के लिए प्रत्येक साधारण निर्वाचन के पश्चात् प्रथम सत्र के आरम्भ में और प्रत्येक वर्ष के प्रथम सत्र के आरम्भ में विधान सभा में या विधान परिषद वाले राज्य की दशा में एक साथ समवेत दोनों सदनों में अभिभाषण करेगा और विधान-मण्डल को उसके आह््वान के कारण बताएगा ।
      2. सदन या प्रत्येक सदन की प्रक्रिया का विनियमन करने वाले नियमों द्वारा ऐसे अभिभाषण में निर्दिष्ट विषयों की चर्चा के लिए समय नियत करने के लिए उपबन्ध किया जाएगा ।

      अनुच्छेद 180. अध्यक्ष के पद के कर्तव्यों का पालन करने या अध्यक्ष के रूप में कार्य करने की उपाध्यक्ष या अन्य व्यक्ति की शक्ति:

      1. जब अध्यक्ष का पद रिक्त है तब उपाध्यक्ष, या यदि उपाध्यक्ष का पद भी रिक्त है तो विधान सभा का ऐसा सदस्य, जिसको राज्यपाल इस प्रयोजन के लिए नियुक्त करें, उस पद के कत्र्तव्यों का पालन करेगा ।
      2. विधान सभा की किसी बैठक से अध्यक्ष की अनुपस्थिति में उपाध्यक्ष या यदि वह भी अनुपस्थित है तो ऐसा व्यक्ति, जो विधान सभा की प्रक्रिया के नियमों द्वारा अवधारित किया जाए, या यदि ऐसा कोई व्यक्ति उपस्थित नहीं है तो ऐसा अन्य व्यक्ति, जो विधान सभा द्वारा अवधारित किया जाए, अध्यक्ष के रूप में कार्य करेगा ।

      अनुच्छेद 184. सभापति के पद के कत्र्तव्यों का पालन करने या सभापति के रूप में कार्य करने की उप-सभापति या अन्य व्यक्ति की शक्ति:

      जब सभापति का पद रिक्त है तब उपसभापति, या यदि उप सभापति का पद भी रिक्त है तो विधान परिषद का ऐसा सदस्य, जिसको राज्यपाल इस प्रयोजन के लिए नियुक्त करे, उस पद के कत्र्तव्यों का पालन करेगा ।

      अनुच्छेद 187. राज्य के विधान-मण्डल का सचिवालय:

      1. राज्य के विधान-मण्डल के सदन का या प्रत्येक सदन का पृथक सचिवीय कर्मचारिवृृन्द होगा । परन्तु विधान परिषद वाले राज्य के विधान मण्डल की दशा में, इस खण्ड की किसी बात का यह अर्थ नहीं लगाया जाएगा कि वह ऐसे विधान मण्डल के दोनों सदनों के लिए सम्मिलित पदों के सृजन को निवारित करती है ।
      2. राज्य का विधान-मण्डल, विधि द्वारा, राज्य के विधान-मण्डल के सदन या सदनों के सचिवीय कर्मचारिवृन्द में भर्ती का और नियुक्त व्यक्तियों की सेवा की शर्तों का विनियमन कर सकेगा ।
      3. जब तक राज्य का विधान-मण्डल खण्ड (2) के अधीन उपबंध नहीं करता है तब तक राज्यपाल, यथास्थिति, विधान सभा के अध्यक्ष या विधान परिषद के सभापति से परामर्श करने के पश्चात् विधान सभा के या विधान परिषद के सचिवीय कर्मचारिवृन्द में भर्ती के और नियुक्त व्यक्तियों की सेवा की शर्तों के विनियमन के लिए नियम बना सकेगा और इस प्रकार बनाए गए नियम उक्त खंड के अधीन बनाई गई किसी विधि के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, प्रभावी होेंगे ।

      अनुच्छेद 188. सदस्यों द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान:

      राज्य की विधान सभा या विधान परिषद का प्रत्येक सदस्य अपना स्थान ग्रहण करने से पहले, राज्यपाल या उसके द्वारा इस निमित्त नियुक्त व्यक्ति के समक्ष, तीसरी अनुसूची में इस प्रयोजन के लिए दिये गये प्ररूप के अनुसार, शपथ लेगा या प्रतिज्ञान करेगा और उस पर अपने हस्ताक्षर करेगा ।

      अनुच्छेद 192. सदस्यों की निरर्हताओं से सम्बन्धित प्रश्नों पर विनिश्चय:

      1. यदि यह प्रश्न उठता है कि किसी राज्य के विधान-मण्डल के किसी सदन का कोई सदस्य अनुच्छेद 191 के खण्ड (1) में वर्णित किसी निरर्हता से ग्रस्त हो गया है या नहीं तो वह प्रश्न राज्यपाल को विनिश्चय के लिए निर्देशित किया जाएगा और उसका विनिश्चिय अन्तिम होगा ।
      2. ऐसी किसी प्रश्न पर विनिश्चय करने से पहले राज्यपाल निर्वाचन आयोग की राय लेगा और ऐसी राय के अनुसार कार्य करेगा ।

      अनुच्छेद 199. धन विधेयक की परिभाषा:

      1. इस अध्याय के प्रयोजनों के लिए, कोई विधेयक धन विधेयक समझा जाएगा यदि उसमें केवल निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों से सम्बन्धित उपबन्ध हैं, अर्थात्:
        1. किसी कर का अधिरोपण, उत्सादन, परिहार, परिवर्तन या विनियमन
        2. राज्य द्वारा धन उधार लेने का या कोई प्रत्याभूति देने का विनियमन अथवा राज्य द्वारा अपने ऊपर ली गयी या ली जाने वाली किन्हीं वित्तीय बाध्यताओं से सम्बन्धित विधि का संशोधन
        3. राज्य की संचित निधि या आकस्मिकता निधि की अभिरक्षा, ऐसी किसी निधि में धन जमा करना या उसमें से धन निकालना
        4. राज्य की संचित निधि में से धन का विनियोग
        5. किसी व्यय को राज्य की संचित निधि पर भारित व्यय घोषित करना या ऐसे किसी व्यय की रकम को बढ़ाना
        6. राज्य की संचित निधि या राज्य के लोक लेखे मद्धे धन प्राप्त करना अथवा ऐसे धन की अभिरक्षा या उसका निर्गमन, या
        7. उपखण्ड (क) से उपखंड (च) में विनिर्दिष्ट किसी विषय का आनुषंगिक कोई विषय
      2. कोई विधेयक केवल इस कारण धन विधेयक नहीं समझा जाएगा, कि वह जुर्मानों या अन्य धनीय शास्तियों के अधिरोपण का अथवा अनुज्ञप्तियों के लिए फीसों की या की गयी सेवाओं के लिए फीसों की मांग का या उनके संदाय का उपबन्ध करता है अथवा इस कारण धन विधेयक नहीं समझा जाएगा कि वह किसी स्थानीय प्राधिकारी या निकाय द्वारा स्थानीय प्रयोजनों के लिए किसी कर के अधिरोपण, उत्सादन, परिहार, परिवर्तन या विनियमन का उपबन्ध करता है ।
      3. यदि यह प्रश्न उठता है कि विधान परिषद् वाले किसी राज्य के विधान-मण्डल में पुरःस्थापित कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं तो उस पर उस राज्य की विधान सभा के अध्यक्ष का विनिश्चय अन्तिम होगा ।
      4. जब धन विधेयक अनुच्छेद 198 के अधीन विधान परिषद् को पारेषित किया जाता है और जब वह अनुच्छेद 200 के अधीन अनुमति के लिए राज्यपाल के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है तब प्रत्येक धन विधेयक पर विधान सभा के अध्यक्ष के हस्ताक्षर सहित यह प्रमाण पृष्ठांकित किया जाएगा कि वह धन विधेयक है ।

      अनुच्छेद 200. विधेयकों पर अनुमति:

      जब कोई विधेयक राज्य की विधान सभा द्वारा या विधान परिषद वाले राज्य में विधान-मण्डल के दोनों सदनों द्वारा पारित कर दिया गया है तब वह राज्यपाल के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा और राज्यपाल घोषित करेगा कि वह विधेयक पर अनुमति देता है या अनुमति रोक लेता है अथवा वह विधेयक को राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रखता है ।
      परन्तु राज्यपाल अनुमति के लिए अपने समक्ष विधेयक प्रस्तुत किये जाने के पश्चात यथाशीघ्र उस विधेयक को, यदि वह धन विधेयक नहीं है तो सदन या सदनों को इस संदेश के साथ लौटा सकेगा कि सदन या दोनों सदन विधेयक पर या उसके किन्हीं विनिर्दिष्ट उपबंधों पर पुनर्विचार करें और विशिष्टतया किन्हीं ऐसे संशोधनों के पुरःस्थापन की वांछनीयता पर विचार करें जिनकी उसने अपने संदेश में सिफारिश की है और जब विधेयक इस प्रकार लौटा दिया जाता है तब सदन या दोनों सदन विधेयक पर तदनुसार पुनर्विचार करेंगे और यदि विधेयक सदन या सदनों द्वारा संशोधन सहित या उसके बिना फिर से पारित कर दिया जाता है और राज्यपाल के समक्ष अनुमति के लिए प्रस्तुत किया जाता है तो राज्यपाल उस पर अनुमति नहीं रोकेगा ।
      परन्तु यह और कि जिस विधेयक से, उसके विधि बन जाने पर, राज्यपाल की राय में उच्च न्यायालय की शक्तियों का ऐसा अल्पीकरण होगा कि वह स्थान, जिसकी पूर्ति के लिए वह न्यायालय इस संविधान द्वारा परिकल्पित है संकटापन्न हो जाएगा, उस विधेयक पर राज्यपाल अनुमति नहीं देगा, किन्तु उसे राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रखेगा ।

      अनुच्छेद 202. वार्षिक वित्तीय विवरण:

      1. राज्यपाल प्रत्येक वित्तीय वर्ष के सम्बन्ध में राज्य के विधान-मण्डल के सदन या सदनों के समक्ष उस राज्य की उस वर्ष के लिए प्राक्कलित प्राप्तियों और व्यय का विवरण रखवाएगा जिसे इस भाग में ”वार्षिक वित्तीय विवरण” कहा गया है ।
      2. वार्षिक वित्तीय विवरण में दिये हुए व्यय के प्राक्कलनों में:
        1. इस संविधान में राज्य की संचित निधि पर भारित व्यय के रूप में वर्णित व्यय की पूर्ति के लिए अपेक्षित राशियाॅं, और
        2. राज्य की संचित निधि में से किये जाने के लिए प्रस्थापित अन्य व्यय की पूर्ति के लिए अपेक्षित राशियाॅं, पृथक-पृथक दिखाई जाएंगी और राजस्व लेखे होने वाले व्यय का अन्य व्यय से भेद किया जाएगा:
      3. निम्नलिखित व्यय प्रत्येक राज्य की संचित निधि पर भारित व्यय होगा , अर्थात्
        1. राज्यपाल की उपलब्धियाॅं और भत्ते तथा उसके पद से सम्बन्धित अन्य व्यय,
        2. विधान सभा के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के तथा विधान परिषद वाले राज्य की दशा में विधान परिषद के सभापति और उपसभापति के भी वेतन और भत्ते
        3. ऐसे ऋण भार जिनका दायित्व राज्य पर है, जिनके अंतर्गत ब्याज, निक्षेप निधि भार और मोचन भार तथा उधार लेने और ऋण सेवा और ऋण मोचन से सम्बन्धित अन्य व्यय हैं
        4. किसी उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतनों और भत्तों के सम्बन्ध में व्यय
        5. किसी न्यायालय या माध्यमस्थम् अधिकरण के निर्णय, डिक्री या पंचाट की तुष्टि के लिए अपेक्षित राशियाॅं
        6. कोई अन्य व्यय जो इस संविधान द्वारा या राज्य के विधान-मण्डल द्वारा, विधि द्वारा, इस प्रकार भारित घोषित किया जाता है ।

      अनुच्छेद 203. विधान मण्डल में प्राक्कलनों के सम्बन्ध में प्रक्रिया:

      1. प्राक्कलनों में से जितने प्राक्कलन राज्य की संचित निधि पर भारित व्यय से संबंधित हैं वे विधान सभा में मतदान के लिए नहीं रखे जाएंगे, किन्तु इस खण्ड की किसी बात का यह अर्थ नहीं लगाया जाएगा कि वह विधान-मण्डल में उन प्राक्कलनों में से किसी प्राक्कलन पर चर्चा को निवारित करती है ।
      2. उक्त प्राक्कलनों में से जितने प्राक्कलन अन्य व्यय से सम्बन्घित हैं वे विधान सभा के समक्ष अनुदानों की मांगों के रूप में रखे जाएंगे और विधान सभा को शक्ति होगी कि वह किसी मांग को अनुमति दे या अनुमति देने से इंकार कर दे अथवा किसी मांग को, उसमें विनिर्दिष्ट रकम को कम करके, अनुमति दे ।
      3. किसी अनुदान की मांग राज्यपाल की सिफारिश पर ही की जाएगी, अन्यथा नहीं ।

      अनुच्छेद 205. अनुपूरक, अतिरिक्त या अधिक अनुदान:

      1. यदि:
        1. अनुच्छेद 204 के उपबन्धों के अनुसार बनाई गयी किसी विधि द्वारा किसी विशिष्ट सेवा पर चालू वित्तीय वर्ष के लिए व्यय किये जाने के लिए प्राधिकृत कोई रकम उस वर्ष के प्रयोजनों के लिए अपर्याप्त पाई जाती है या उस वर्ष के वार्षिक वित्तीय विवरण में अनुध्यात न की गयी किसी नई सेवा पर अनुपूरक या अतिरिक्त व्यय की चालू वित्तीय वर्ष के दौरान आवश्यकता पैदा हो गयी है, या
        2. किसी वित्तीय वर्ष के दौरान किसी सेवा पर उस वर्ष और उस सेवा के लिए अनुदान की गयी रकम से अधिक कोई धन व्यय हो गया है,
          तो राज्यपाल, यथास्थिति, राज्य के विधान मण्डल के सदन या सदनों के समक्ष उस व्यय की प्राक्कलित रकम को दर्शित करने वाला दूसरा विवरण रखवाएगा या राज्य की विधान सभा में ऐसे आधिक्य के लिए मांग प्रस्तुत करवाएगा ।
      2. ऐसे किसी विवरण और व्यय या मांग के संबंध में तथा राज्य की संचित निधि में से ऐसे व्यय या ऐसी मांग से सम्बन्धित अनुदान की पूर्ति के लिए धन का विनियोग प्राधिकृत करने के लिए बनाई जाने वाली किसी विधि के सम्बन्ध में भी, अनुच्छेद 202, अनुच्छेद 203, और अनुच्छेद 204 के उपबन्ध वैसे ही प्रभावी होंगे जैसे वे वार्षिक वित्तीय विवरण और उसमें वर्णित व्यय के संबंध में या किसी अनुदान की किसी मांग के सम्बन्ध में और राज्य की संचित निधि में से ऐसे व्यय या अनुदान की पूर्ति के लिए धन का विनियोग प्राधिकृत करने के लिए बनाई जाने वाली विधि के सम्बन्ध में प्रभावी हैं ।

      अनुच्छेद 207. वित्त विधेयकों के बारे में विशेष उपबन्ध:

      1. अनुच्छेद 199 के खण्ड (1) के उपखण्ड (क) से उपखण्ड (च) में विनिर्दिष्ट किसी विषय के लिए उपबन्ध करने वाला विधेयक या संशोधन राज्यपाल की सिफारिश से ही पुरःस्थापित या प्रस्तावित किया जाएगा, अन्यथा नहीं और ऐसा उपबन्ध करने वाला विधेयक विधान परिषद में पुरःस्थापित नहीं किया जाएगा । परन्तु किसी कर के घटाने या उत्सादन के लिए उपबन्ध करने वाले किसी संशोधन के प्रस्ताव के लिए इस खण्ड के अधीन सिफारिश की अपेक्षा नहीं होगी ।
      2. कोई विधेयक या संशोधन उक्त विषयों में से किसी विषय के लिए उपबन्ध करने वाला केवल इस कारण नहीं समझा जाएगा कि वह जुर्मानों या अन्य धनीय शास्तियों के अधिरोपण का अथवा अनुज्ञप्तियों के लिए फीसों की या की गयी सेवाओं के लिए फीसों की मांग का या उनके संदाय का उपबन्ध करता है अथवा इस कारण नहीं समझा जाएगा कि वह किसी स्थानीय प्राधिकारी या निकाय द्वारा स्थानीय प्रयोजनों के लिए किसी कर के अधिरोपण, उत्सादन, परिहार, परिवर्तन या विनियमन का उपबन्ध करता है ।
      3. जिस विधेयक को अधिनियमित और प्रवर्तित किये जाने पर राज्य की संचित निधि में से व्यय करना पड़ेगा वह विधेयक राज्य के विधान-मण्डल के किसी सदन द्वारा तब तक पारित नहीं किया जाएगा जब तक ऐसे विधेयक पर विचार करने के लिए उस सदन से राज्यपाल ने सिफारिश नहीं की है ।

      अनुच्छेद 208. प्रक्रिया के नियम:

      राज्यपाल, विधान परिषद वाले राज्य में विधान सभा के अध्यक्ष और विधान परिषद के सभापति से परामर्श करने के पश्चात् दोनों सदनों में परस्पर संचार से सम्बन्धित प्रक्रिया के नियम बना सकेगा ।

      अनुच्छेद 213. विधान मण्डल के विश्रांतिकाल में अध्यादेश प्रख्यापित करने की राज्यपाल की शक्ति:

      1. उस समय को छोड़कर जब किसी राज्य की विधान सभा सत्र में है या विधान परिषद वाले राज्य में विधान-मण्डल के दोनों सदन सत्र में हैं, यदि किसी समय राज्यपाल का यह समाधान हो जाता है कि ऐसी परिस्थितियाॅं विद्यमान हैं जिनके कारण तुरन्त कार्यवाही करना उसके लिए आवश्यक हो गया है तो वह ऐसे अध्यादेश प्रख्यापित कर सकेगा जो उसे उन परिस्थितियों में अपेक्षित प्रतीत हों, परन्तु राज्यपाल, राष्ट्रपति के अनुदेशों के बिना, कोई ऐसा अध्यादेश प्रख्यापित नहीं करेगा, यदि
        1. वैसे ही उपबन्ध अंतर्विष्ट करने वाले विधेयक को विधान-मण्डल में पुरःस्थापित किये जाने के लिए राष्ट्रपति की पूर्व मंजूरी की अपेक्षा इस संविधान के अधीन होती, या
        2. वह वैसे ही उपबन्ध अन्तर्विष्ट करने वाले विधेयक को राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रखना आवश्यक समझता, या
        3. वैसे ही उपबन्ध अंन्तर्विष्ट करने वाले राज्य के विधान मण्डल का अधिनियम इस संविधान के अधीन तब तक अविधिमान्य होता जब तक राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रखे जाने पर उसे राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त नहीं हो गयी होती ।
      2. इस अनुच्छेद के अधीन प्रख्यापित अध्यादेश का वहीं बल और प्रभाव होगा जो राज्य के विधान मण्डल के ऐसे अधिनियम का होता है जिसे राज्यपाल ने अनुमति दे दी है, किन्तु प्रत्येक ऐसा अध्यादेश –
        1. राज्य की विधान सभा के समक्ष और विधान परिषद वाले राज्य में दोनों सदनों के समक्ष रखा जाएगा तथा विधान मण्डल के पुनः समवेत होने से छह सप्ताह की समाप्ति पर या यदि उस अवधि की समाप्ति से पहले विधान सभा उसके अननुमोदन का संकल्प पारित कर देती है और यदि विधान परिषद है तो वह उससे सहमत हो जाती है तो, यथास्थिति, संकल्प के पारित होने पर या विधान परिषद द्वारा संकल्प से सहमत होने पर प्रवर्तन में नहीं रहेगा, और
        2. राज्यपाल द्वारा किसी भी समय वापस लिया जा सकेगा ।

        स्पष्टीकरण: जहां विधान परिषद वाले राज्य के विधान मण्डल के सदन, भिन्न-भिन्न तारीखों को पुनः समवेत होने के लिए, आहूत किये जाते हैं वहां इस खंड के प्रयोजनों के लिए, छह सप्ताह की अवधि की गणना उन तारीखों में से पश्चातवर्ती तारीख से की जाएगी ।

      3. यदि और जहां तक इस अनुच्छेद के अधीन अध्यादेश कोई ऐसा उपबन्ध करता है जो राज्य के विधान मण्डल के ऐसे अधिनियम में, जिसे राज्यपाल ने अनुमति दे दी है, अधिनियमित किये जाने पर विधिमान्य नहीं होता तो और वहाॅं तक वह अध्यादेश शून्य होगा ।

      परन्तु राज्य के विधान मण्डल के ऐसे अधिनियम के, जो समवर्ती सूची में प्रगणित किसी विषय के बारे में संसद के किसी अधिनियम या किसी विद्यमान विधि के विरुद्ध हैं, प्रभाव से सम्बन्धित इस संविधान के उपबन्धों के प्रयोजनों के लिए यह है कि कोई अध्यादेश, जो राष्ट्रपति के अनुदेशों के अनुसरण में इस अनुच्छेद के अधीन प्रख्यापित किया जाता है, राज्य के विधान मण्डल का ऐसा अधिनियम समझा जाएगा जो राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रखा गया था और जिसे उसने अनुमति दे दी है ।

      अनुच्छेद 217. उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की नियुक्ति और उसके पद की शर्तें:

      1. ( अनुच्छेद 124-क में निर्दिष्ट राष्ट्रीय न्यायिक आयोग की सिफारिश पर ) राष्ट्रपति अपने हस्ताक्षर और मुद्रा सहित अधिपत्र द्वारा उच्च न्यायालय के प्रत्येक न्यायाधीश को नियुक्त करेगा और वह न्यायाधीश अपर या कार्यकारी न्यायाधीश की दशा में अनुच्छेद 224 में उपबन्धित रूप में पद धारण करेगा और किसी अन्य दशा में तब तक पद धारण करेगा जब तक वह बासठ वर्ष की आयु प्राप्त नहीं कर लेता है:

        परन्तु –

      2. कोई न्यायाधीश, राष्ट्रपति को सम्बोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्याग सकेगा
      3. किसी न्यायाधीश को उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने के लिए अनुच्छेद 124 के खण्ड (4) में उपबन्धित रीति से उसके पद से राष्ट्रपति द्वारा हटाया जा सकेगा ।
      4. किसी न्यायाधीश का पद, राष्ट्रपति द्वारा उसे उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त किये जाने पर या राष्ट्रपति द्वारा उसे भारत के राज्य क्षेत्र में किसी अन्य उच्च न्यायालय को अंतरित किये जाने पर रिक्त हो जाएगा ।
    4. कोई व्यक्ति, किसी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति के लिए तभी अर्हित होगा जब वह भारत का नागरिक है और –
      1. भारत के राज्य क्षेत्र में कम से कम दस वर्ष तक न्यायिक पद धारण कर चुका है, या
      2. किसी उच्च न्यायालय का या ऐसे दो या अधिक न्यायालयों का लगातार कम से कम दस वर्ष तक अधिवक्ता रहा है:

      स्पष्टीकरण: इस खण्ड के प्रयोजनों के लिए –

      1. भारत के राज्य क्षेत्र में न्यायिक पद धारण करने की अवधि की संगणना करने में वह अवधि भी सम्मिलित की जाएगी जिसके दौरान कोई व्यक्ति न्यायिक पद धारण करने के पश्चात किसी उच्च न्यायालय का अधिवक्ता रहा है या उसने किसी अधिकरण के सदस्य का पद धारण किया है अथवा संघ या राज्य के अधीन कोई ऐसा पद धारण किया है जिसके लिए विधि का विशेष ज्ञान अपेक्षित है
      2. किसी उच्च न्यायालय का अधिवक्ता रहने की अवधि की संगणना करने में वह अवधि भी सम्मिलित की जाएगी जिसके दौरान किसी व्यक्ति ने अधिवक्ता होने के पश्चात न्यायिक पद धारण किया है या किसी अधिकरण के सदस्य का पद धारण किया है अथवा संघ या राज्य के अधीन कोई ऐसा पद धारण किया है जिसके लिए विधि का विशेष ज्ञान अपेक्षित है:
      3. भारत के राज्य क्षेत्र में न्यायिक पद धारण करने या किसी उच्च न्यायालय का अधिवक्ता रहने की अवधि की संगणना करने में इस संविधान के प्रारम्भ से पहले की वह अवधि भी सम्मिलित की जाएगी जिसके दौरान किसी व्यक्ति ने, यथास्थिति, ऐसे क्षेत्र में जो 15 अगस्त, 1947 से पहले भारत शासन अधिनियम, 1935 में परिभाषित भारत में समाविष्ट था, न्यायिक पद धारण किया है या वह ऐसे किसी क्षेत्र में किसी उच्च न्यायालय का अधिवक्ता रहा है ।
      4. यदि उच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश की आयु के बारे में कोई प्र्रश्न उठता है तो उस प्रश्न का विनिश्चय भारत के मुख्य न्यायमूर्ति से परामर्श करने के पश्चात्, राष्ट्रपति द्वारा दिया जायेगा और राष्ट्रपति का विनिश्चय अंतिम होगा ।

    अनुच्छेद 219. उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान:

    उच्च न्यायालय का न्यायाधीश होने के लिए नियुक्त प्रत्येक व्यक्ति, अपना पद ग्रहण करने से पहले, उस राज्य के राज्यपाल या उसके द्वारा इस निमित्त नियुक्त व्यक्ति के समक्ष, तीसरी अनुसूची में इस प्रयोजन के लिए दिये गये प्ररूप के अनुसार, शपथ लेगा या प्रतिज्ञान करेगा और उस पर अपने हस्ताक्षर करेगा ।

    अनुच्छेद 227. सभी न्यायालयों के अधीक्षण की उच्च न्यायालय की शक्ति:

    1. प्रत्येक उच्च न्यायालय उन राज्यक्षेत्रों में सर्वत्र, जिनके सम्बन्ध में वह अपनी अधिकारिता का प्रयोग करता है, सभी न्यायालयों और अधिकरणों का अधीक्षण करेगा ।
    2. पूर्वगामी उपबन्ध की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, उच्च न्यायालय:
      1. ऐसे न्यायालयों से विवरणी मंगा सकेगा
      2. ऐसे न्यायालयों की पद्धति और कार्यवाहियों के विनियमन के लिए साधारण नियम और प्ररूप बना सकेगा, और निकाल सकेगा तथा विहित कर सकेगा, और
      3. किन्हीं ऐसे न्यायालयों के अधिकारियों द्वारा रखी जाने वाली पुस्तकों, प्रविष्टियों और लेखाओं के प्ररूप विहित कर सकेगा ।
    3. उच्च न्यायालय उन फीसों की सारणियाॅं भी स्थिर कर सकेगा जो ऐसे न्यायालयों के शैरिफ को तथा सभी लिपिकों और अधिकारियों को तथा उनमें विधि-व्यवसाय करने वाले अटार्नियों, अधिवक्ताओं और प्लीडरों को अनुज्ञेय होगी । परन्तु खण्ड (2) या खण्ड (3) के अधीन बनाये गये कोई नियम, विहित किये गये कोई प्ररूप या स्थिर की गयी कोई सारणी तत्समय प्रवृत किसी विधि के उपबन्ध से असंगत नहीं होगी और इनके लिए राज्यपाल के पूर्व अनुमोदन की अपेक्षा होगी ।

    अनुच्छेद 229. उच्च न्यायालय के अधिकारी और सेवक तथा व्यय:

    1. किसी उच्च न्यायालय के अधिकारियों और सेवकों की नियुक्तियाॅं उस न्यायालय का मुख्य न्यायमूर्ति करेगा या उस न्यायालय का ऐसा अन्य न्यायाधीश या अधिकारी करेगा जिसे वह निर्दिष्ट करे । परन्तु उस राज्य का राज्यपाल नियम द्वारा यह अपेक्षा कर सकेगा कि ऐसी किन्हीं दशाओं में जो नियम में विनिर्दिष्ट की जाएं, किसी ऐसे व्यक्ति को, जो पहले से ही न्यायालय से संलग्न नहीं हैं, न्यायालय से सम्बन्धित किसी पद पर राज्य लोक सेवा आयोग से परामर्श करके ही नियुक्त किया जाएगा, अन्यथा नहीं ।
    2. राज्य के विधान मण्डल द्वारा बनाई गयी विधि के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, उच्च न्यायालय के अधिकारियों और सेवकों की सेवा की शर्तें ऐसी होंगी जो उस न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति या उस न्यायालय के ऐसे अन्य न्यायाधीश या अधिकारी द्वारा, जिसे मुख्य न्यायमूर्ति ने इस प्रयोजन के लिए नियम बनाने के लिए प्राधिकृत किया है, बनाए गए नियमों द्वारा विहित की जाएं । परन्तु इस खण्ड के अधीन बनाए गये नियमों के लिए, जहां तक वे वेतनों, भत्तों, छुट्टी या पेंशनों से सम्बन्धित हैं, उस राज्य के राज्यपाल के अनुमोदन की अपेक्षा होगी ।

    अनुच्छेद 230. उच्च न्यायालयों की अधिकारिता पर संघ का राज्यक्षेत्रों पर विस्तार:

    उस राज्यक्षेत्र में अधीनस्थ न्यायालयों के लिए किन्हीं नियमों, प्ररूपों या सारणियों के संबंध में, अनुच्छेद 227 में राज्यपाल के प्रति निर्देश का, यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह राष्ट्रपति के प्रति निर्देश है ।

    अनुच्छेद 231. दो या अधिक राज्यों के लिए एक ही उच्च न्यायालय की स्थापना:

    किसी ऐसे उच्च न्यायालय के सम्बन्ध में: (ख) अधीनस्थ न्यायालयों के लिए किन्हीं नियमों, प्ररूपों या सारणियों के सम्बन्ध में, अनुच्छेद 227 में राज्यपाल के प्रति निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह उस राज्य के राज्यपाल के प्रति निर्देश हैं जिसमें वे अधीनस्थ न्यायालय स्थित है, और

    अनुच्छेद 219 और अनुच्छेद 229 में राज्य के प्रति निर्देशों का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वे उस राज्य के प्रति निर्देश हैं, जिसमें उस उच्च न्यायालय का मुख्य स्थान है। परन्तु यदि ऐसा मुख्य स्थान किसी संघ राज्यक्षेत्र में है तो अनुच्छेद 219 और अनुच्छेद 229 में राज्य के, राज्यपाल, लोक सेवा आयोग, विधान मण्डल और संचित निधि के प्रति निर्देशों का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वे क्रमशः राष्ट्रपति, संघ लोक सेवा आयोग, संसद और भारत की संचित निधि के प्रति निर्देश हैं ।

    अनुच्छेद 233. जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति:

    1. किसी राज्य में जिला न्यायाधीश नियुक्त होने वाले व्यक्तियों की नियुक्ति तथा जिला न्यायाधीश की पदस्थापना और प्रोन्नति उस राज्य का राज्यपाल ऐसे राज्य के सम्बन्ध में अधिकारिता का प्रयोग करने वाले उच्च न्यायालय से परामर्श करके करेगा ।
    2. वह व्यक्ति, जो ंसंघ की या राज्य की सेवा में पहले से ही नहीं है, जिला न्यायाधीश नियुक्त होने के लिए केवल तभी पात्र होगा जब वह कम से कम सात वर्ष तक अधिवक्ता या प्लीडर रहा है और उसकी नियुक्ति के लिए उच्च न्यायालय ने सिफारिश की है ।

    अनुच्छेद 234. न्यायिक सेवा में जिला न्यायाधीशों से भिन्न व्यक्तियों की भर्ती:

    जिला न्यायाधीशों से भिन्न व्यक्तियों की किसी राज्य की न्यायिक सेवा में नियुक्ति उस राज्य के राज्यपाल द्वारा, राज्य लोक सेवा आयोग से और ऐसे राज्य के सम्बन्ध में अधिकारिता का प्रयोग करने वाले उच्च न्यायालय से परामर्श करने के पश्चात् और राज्यपाल द्वारा इस निमित्त बनाये गये नियमों के अनुसार की जाएगी ।

    अनुच्छेद 237. कुछ वर्ग या वर्गों के मजिस्ट्रेटों पर इस अध्याय के उपबन्धों का लागू होना:

    राज्यपाल, लोक अधिसूचना द्वारा, निदेश दे सकेगा कि इस अध्याय के पूर्वगामी उपबन्ध और उनके अधीन बनाए गए नियम ऐसी तारीख से, जो वह इस निमित्त नियत करे, ऐसे अपवादों और उपांतरणों के अधीन रहते हुए जो ऐसी अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किए जाएं, राज्य में किसी वर्ग या वर्गों के मजिस्ट्रेटों के सम्बन्ध में वैसे ही लागू होंगे जैसे वे राज्य की न्यायिक सेवा में नियुक्त व्यक्तियों के सम्बन्ध में लागू होते हैं ।

    अनुच्छेद 243(छ).

    ”ग्राम” से राज्यपाल द्वारा इस भाग के प्रयोजनों के लिए, लोक अधिसूचना द्वारा ग्राम के रूप में विनिर्दिष्ट ग्राम अभिपे्रत है और इसके अन्तर्गत इस प्रकार विनिर्दिष्ट ग्रामों का समूह भी है ।

    अनुच्छेद 243झ. वित्तीय स्थिति के पुनर्विलोकन के लिए वित्त आयोग का गठन:

    1. राज्य का राज्यपाल, संविधान (तिहत्तरवाॅं संशोधन) अधिनियम, 1992 के प्रारम्भ से एक वर्ष के भीतर यथाशीघ्र, और तत्पश्चात् प्रत्येक पाॅंचवे वर्ष की समाप्ति पर, वित्त आयोग का गठन करेगा जो पंचायतों की वित्तीय स्थिति का पुनर्विलोकन करेगा और जो (ग) पंचायतों के सुदृढ़ वित्त के हित में राज्यपाल द्वारा वित्त आयोग को निर्दिष्ट किये गये किसी अन्य विषय के बारे में, राज्यपाल को सिफारिश करेगा ।
    2. राज्यपाल इस अनुच्छेद के अधीन आयोग द्वारा की गयी प्रत्येक सिफारिश को, उस पर की गयी कार्यवाई के स्पष्टीकारक ज्ञापन सहित, राज्य के विधान मण्डल के समक्ष रखवाएगा ।

    अनुच्छेद 243ट. पंचायतों के लिए निर्वाचन:

    1. पंचायतों के लिए कराये जाने वाले सभी निर्वाचनों के लिए निर्वाचक नामावली तैयार कराने का और उन सभी निर्वाचनों के संचालन का अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण एक राज्य निर्वाचन आयोग में निहित होगा, जिसमें एक राज्य निर्वाचन आयुक्त होगा, जो राज्यपाल द्वारा नियुक्त किया जाएगा ।
    2. किसी राज्य के विधान मण्डल द्वारा बनाई गई किसी विधि के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, राज्य निर्वाचन आयुक्त की सेवा की शर्तें और पदावधि ऐसी होगी जो राज्यपाल नियम द्वारा अवधारित करे।

    अनुच्छेद 243ठ. संघ राज्यक्षेत्रों का लागू होना:

    इस भाग के उपबन्ध संघ राज्यक्षेत्रों पर लागू होंगे और किसी संघ राज्यक्षेत्र को उनके लागू होने में इस प्रकार प्रभावी होंगे मानों किसी राज्य के राज्यपाल के प्रति निर्देश, अनुच्छेद 239 के अधीन नियुक्त संघ राज्यक्षेत्र के प्रशासक के प्रति निर्देश हों और किसी राज्य के विधान-मण्डल या विधान सभा के प्रति निर्देश, किसी ऐसे संघ राज्यक्षेत्र के संबंध में, जिसमें विधान सभा है, उस विधान सभा के प्रति निर्देश हों ।

    अनुच्छेद 243त(ग).

    ”महानगर क्षेत्र” से दस लाख या उससे अधिक जनसंख्या वाला ऐसा क्षेत्र अभिपे्रत है जिसमें एक या अधिक जिला समाविष्ट हैं और जो दो या अधिक नगरपालिकाओं या पंचायतों या अन्य संलग्न क्षेत्रों से मिलकर बनता है तथा जिसे राज्यपाल, इस भाग के प्रयोजनों के लिए, लोक अधिसूचना द्वारा, महानगर क्षेत्र के रूप में विनिर्दिष्ट करें ।

    अनुच्छेद 243त(घ).

    ”नगरपालिका क्षेत्र” से राज्यपाल द्वारा अधिसूचित किसी नगरपालिका का प्रादेशिक क्षेत्र अभिपे्रत है।

    अनुच्छेद 243थ. नगरपालिकाओं का गठन:

    1. प्रत्येक राज्य में, इस भाग के उपबन्धों के अनुसार-
      1. किसी संक्रमणशील क्षेत्र के लिए, अर्थात् ग्रामीण क्षेत्र से नगरीय क्षेत्र में संक्रमणगत क्षेत्र के लिए कोई नगर पंचायत का (चाहे वह किसी भी नाम से ज्ञात हो )
      2. किसी लघुतर नगरीय क्षेत्र के लिए नगरपालिका परिषद का और
      3. किसी वृहत्तर नगरीय क्षेत्र के लिए नगर निगम का, गठन किया जाएगा । परन्तु इस खण्ड के अधीन कोई नगरपालिका ऐसे नगरीय क्षेत्र या उसके किसी भाग में गठित नहीं की जा सकेगी जिसे राज्यपाल, क्षेत्र के आकार और उस क्षेत्र में किसी औद्योगिक स्थापन द्वारा दी जा रही या दिए जाने के लिए प्रस्तावित नगरपालिका सेवाओं और ऐसी अन्य बातों के, जो वह ठीक समझे, ध्यान में रखते हुए, लोक अधिसूचना द्वारा, औद्योगिक नगरी के रूप में विनिर्दिष्ट करे ।
    2. इस अनुच्छेद में, ”संक्रमणशील क्षेत्र”, ”लघुतर नगरीय क्षेत्र” या ”बृहत्तर नगरीय क्षेत्र” से ऐसा क्षेत्र अभिपे्रत है जिसे राज्यपाल, इस भाग के प्रयोजनों के लिए, उस क्षेत्र की जनसंख्या, उसमें जनसंख्या की सघनता, स्थानीय प्रशासन के लिए उत्पन्न राजस्व, कृषि से भिन्न क्रियाकलापों में नियोजन की प्रतिशतता, आर्थिक महत्व या ऐसी अन्य बातों को, जो वह ठीक समझे, ध्यान में रखते हुए, लोक अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट करे ।

    अनुच्छेद 243म. वित्त आयोग:

    1. अनुच्छेद 243झ के अधीन गठित वित्त आयोग नगरपालिकाओं की वित्तीय स्थिति का भी पुनर्विलोकन करेगा और …….
    2. राज्यपाल इस अनुच्छेद के अधीन आयोग द्वारा की गयी प्रत्येक सिफारिश को, उस पर की गयी कार्यवाही के स्पष्टीकारक ज्ञापन सहित, राज्य के विधान-मण्डल के समक्ष रखवाएगा ।
      अनुच्छेद 243यख. संघ राज्यक्षेत्रों का लागू होना: इस भाग के उपबन्ध संघ राज्यक्षेत्रों को लागू होंगे और किसी संघ राज्यक्षेत्र को उनके लागू होने में इस प्रकार प्रभावी होंगे मानों किसी राज्य के राज्यपाल के प्रति निर्देश, अनुच्छेद 239 के अधीन नियुक्त संघ राज्यक्षेत्र के प्रशासक के प्रति निर्देश हों और किसी राज्य के विधान मण्डल या विधान सभा के प्रति निर्देश, किसी ऐसे संघ राज्यक्षेत्र के संबंध में, जिसमें विधान सभा है, उस विधान सभा के प्रति निर्देश हों ।

    अनुच्छेद 243य(घ). जिला योजना के लिए समिति:

    1. रत्येक जिला योजना समिति, विकास योजना प्रारूप तैयार करने में- (क) निम्नलिखित का ध्यान रखेगी, अर्थात्
    2. पंचायतों और नगरपालिकाओं के सामान्य हित के विषय, जिनके अंतर्गत स्थानिक योजना, जल तथा अन्य भौतिक और प्राकृतिक संसाधनों में हिस्सा बंटाना, अवसंरचना का एकीकृत विकास और पर्यावरण संरक्षण है,
    3. उपलब्ध वित्तीय या अन्य संसाधनों की मात्रा और प्रकार
    4. ऐसी संस्थाओं और संगठनों से परामर्श करेगी जिन्हें राज्यपाल, आदेश द्वारा, विनिर्दिष्ट करे ।

    अनुच्छेद 255. सिफारिशों और पूर्व मंजूरी के बारे में अपेक्षाओं को केवल प्रक्रिया के विषय मानना:

    यदि संसद के या किसी राज्य के विधान मण्डल के किसी अधिनियम को-

    1. जहाॅं राज्यपाल की सिफारिश अपेक्षित थी वहाॅं राज्यपाल या राष्ट्रपति ने,
    2. जहां राजप्रमुख की सिफारिश अपेक्षित थी वहाॅं राज्यप्रमुख या राष्ट्रपति ने
    3. जहां राष्ट्रपति की सिफारिश अपेक्षित थी वहाॅं राष्ट्रपति ने,
      अनुमति दे दी है तो ऐसा अधिनियम और ऐसे अधिनियम का कोई उपबन्ध केवल इस कारण अविधिमान्य नहीं होगा कि इस संविधान द्वारा अपेक्षित कोई सिफारिश नहीं की गयी थी या पूर्व मंजूरी नहीं दी गयी थी ।

    अनुच्छेद 258क. संघ को कृत्य सौंपने की राज्यों की शक्ति:

    इस संविधान में किसी बात के होते हुए भी, किसी राज्य का राज्यपाल, भारत सरकार की सहमति से उस सरकार को या उसके अधिकारियों को ऐसे किसी विषय से सम्बन्धित कृत्य, जिन पर उस राज्य की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार है, सशर्त या बिना शर्त सौंप सकेगा ।

    अनुच्छेद 267. आकस्मिकता निधि:

    राज्य का विधान मण्डल, विधि द्वारा, अग्रदाय के स्वरूप की एक आकस्मिकता निधि की स्थापना कर सकेगा जो ”राज्य की आकस्मिकता निधि” के नाम से ज्ञात होगी जिसमें ऐसी विधि द्वारा अवधारित राशियाॅं समय-समय पर जमा की जाएंगी और अनवेक्षित व्यय का अनुच्छेद 205 या अनुच्छेद 206 के अधीन राज्य के विधान मण्डल द्वारा, विधि द्वारा प्राधिकृत किया जाना लम्बित रहने तक ऐसी निधि में से ऐसे व्यय की पूर्ति के लिए अग्रिम धन देने के लिए राज्यपाल को समर्थ बनाने के लिए उक्त निधि राज्य के राज्यपाल के व्ययनाधीन रखी जाएगी ।

    अनुच्छेद 294. कुछ दशाओं में सम्पत्ति, आस्तियों, अधिकारों, दायित्वों और बाध्यताओं का उत्तराधिकार:

    इस संविधान के प्रारम्भ से ही –

    1. जो संपत्ति और आस्तियाॅं ऐसे प्रारम्भ से ठीक पहले भारत डोमिनियन की सरकार के प्रयोजनों के लिए हिज मजेस्टी में निहित थीं और जो सम्पत्ति और आस्तियाॅं ऐसे प्रारम्भ से ठीक पहले प्रत्येक राज्यपाल वाले प्रान्त की सरकार के प्रयोजनों के लिए हिज मजेस्टी में निहित थीं, वे सभी इस संविधान के प्रारम्भ से पहले पाकिस्तान डोमिनियन के या पश्चिमी बंगाल, पूर्वी बंगाल, पश्चिमी पंजाब और पूर्वी पंजाब प्रान्तों के सृजन के कारण किये गये या किये जाने वाले किसी समायोजन के अधीन रहते हुए क्रमशः संघ और तत्स्थानी राज्य में निहत होंगी, और
    2. जो अधिकार, दायित्व और बाध्यताएं भारत डोमिनियन की सरकार की और प्रत्येक राज्यपाल वाले प्रान्त की सरकार की थीं, चाहे वे किसी संविदा से या अन्यथा उद्भूत हुई हों, वे सभी इस संविधान के प्रारम्भ से पहले पाकिस्तान डोमिनियन के या पश्चिमी बंगाल, पूर्वी बंगाल, पश्चिमी पंजाब और पूर्वी पंजाब प्रान्तों के सृजन के कारण किये गये या किये जाने वाले किसी समायोजन के अधीन रहते हुए क्रमशः भारत सरकार और प्रत्येक तत्स्थानी राज्य की सरकार के अधिकार, दायित्व और बाध्यताएं होंगी ।

    अनुच्छेद 299. संविदाएं:

    1. संघ की या राज्य की कार्यपालिका शक्ति का प्रयोग करते हुए की गयी सभी संविदाएं, यथास्थिति, राष्ट्रपति द्वारा या उस राज्य के राज्यपाल द्वारा की गयी कही जाएंगी और वे सभी संविदाएं और सम्पत्ति संबंधी हस्तांतरण-पत्र, जो उस शक्ति का प्रयोग करते हुए किए जाएं, राष्ट्रपति या राज्यपाल की ओर से ऐसे व्यक्तियों द्वारा और रीति से निष्पादित किए जाएंगे जिसे वह निर्दिष्ट या प्राधिकृत करे ।
    2. राष्ट्रपति या किसी राज्य का राज्यपाल इस संविधान के प्रयोजनों के लिए या भारत सरकार के संबंध में इससे पूर्व प्रवृत्त किसी अधिनियमिति के प्रयोजनों के लिए की गयी या निष्पादित की गयी किसी संविदा या हस्तांतरण-पत्र के सम्बन्ध में वैयक्तिक रूप से दायी नहीं होगा या उनमें से किसी की ओर से ऐसी संविदा या हस्तांतरण-पत्र करने या निष्पादित करने वाला व्यक्ति उसके संबंध में वैयक्तिक रूप से दायी नहीं होगा ।

    अनुच्छेद 309. संघ या राज्य की सेवा करने वाले व्यक्तियों की भर्ती और सेवा की शर्तें:

    इस संविधान के उपबंधों के अधीन रहते हुए, समुचित विधान-मण्डल के अधिनियम संघ या किसी राज्य के कार्यकलाप से संबंधित लोक सेवाओं और पदों के लिए भर्ती का और नियुक्त व्यक्तियों की सेवा की शर्तों का विनियमन कर सकेंगे । परन्तु जब तक इस अनुच्छेद के अधीन समुचित विधान-मण्डल के अधिनियम द्वारा या उसके अधीन इस निमित्त उपबंध नहीं किया जाता है, तब तक, यथास्थिति, संघ के कार्य कलाप से संबंधित सेवाओं और पदों की दशा में राष्ट्रपति या ऐसा व्यक्ति जिसे वह निर्दिष्ट करे और राज्य के कार्य कलाप से संबंधित सेवाओं और पदों की दशा में राज्य का राज्यपाल या ऐसा व्यक्ति जिसे वह निर्दिष्ट करे, ऐसी सेवाओं और पदों के लिए भर्ती का और नियुक्त व्यक्तियों की सेवा की शर्तों का विनियमन करने वाले नियम बनाने के लिए सक्षम होगा और इस प्रकार बनाए गए नियम किसी ऐसे अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए प्रभावी होंगे ।

    अनुच्छेद 310. संघ या राज्य की सेवा करने वाले व्यक्तियों की पदावधि:

    1. इस संविधान द्वारा अभिव्यक्त रूप से यथा उपबंधित के सिवाय, प्रत्येक व्यक्ति जो रक्षा सेवा का या संघ की सिविल सेवा का या अखिल भारतीय सेवा का सदस्य है अथवा रक्षा से संबंधित कोई पद या संघ के अधीन कोई सिविल पद धारण करता है, राष्ट्रपति के प्रसादपर्यन्त पद धारण करता है और प्रत्येक व्यक्ति जो किसी राज्य की सिविल सेवा का सदस्य है या राज्य के अधीन कोई सिविल पद धारण करता है, उस राज्य के राज्यपाल के प्रसादपर्यन्त पद धारण करता है ।
    2. इस बात के होते हुए भी संघ या किसी राज्य के अधीन सिविल पद धारण करने वाला व्यक्ति, यथास्थिति, राष्ट्रपति या राज्य के राज्यपाल के प्रसादपर्यन्त पद धारण करता है, कोई संविदा जिसके अधीन कोई व्यक्ति जो रक्षा सेवा का या अखिल भारतीय सेवा के या संघ या राज्य की सिविल सेवा के सदस्य नहीं हैं, ऐसे किसी पद को धारण करने के लिए इस संविधान के अधीन नियुक्त किया जाता है, उस दशा में, जिसमें, यथास्थिति, राष्ट्रपति या राज्यपाल विशेष अर्हताओं वाले किसी व्यक्ति की सेवाएं प्राप्त करने के लिए आवश्यक समझता है, यह उपबंध कर सकेगी कि यदि करार की गई अवधि की समाप्ति से पहले वह पद समाप्त कर दिया जाता है या ऐसे कारणों से, जो उसके किसी अवचार से संबंधित नहीं है, उससे वह पद रिक्त करने की अपेक्षा की जाती है तो, उसे प्रतिकर किया जाएगा ।

    अनुच्छेद 311. संघ या राज्य के अधीन सिविल हैसियत में नियोजित व्यक्तियों का पदच्युत किया जाना, पद से हटाया जाना या पंक्ति में अवनत किया जाना:

    यथापूर्वोक्त, किसी व्यक्ति को, ऐसी जाॅंच के पश्चात ही, जिसमें उसे अपने विरुद्ध आरोपों की सूचना दे दी गयी है और उन आरोपों के संबंध में सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर दे दिया गया है, पदच्युत किया जाएगा या पद से हटाया जाएगा या पंक्ति में अवनत किया जाएगा, अन्यथा नहीं । परन्तु जहां ऐसी जांच के पश्चात उस पर ऐसी कोई शास्ति अधिरोपित करने की प्रस्थापना है वहां ऐसी शास्ति ऐसी जांच के दौरान दिये गये साक्ष्य के आधार पर अधिरोपित की जा सकेगी और ऐसे व्यक्ति को प्रस्थापित शास्ति के विषय में अभ्यावेदन करने का अवसर देना आवश्यक नहीं होगा । परन्तु यह और कि यह खंड वहां लागू नहीं होगा,

    जहां, यथास्थिति, राष्ट्रपति या राज्यपाल का यह समाधान हो जाता है कि राज्य की सुरक्षा के हित में यह समीचीन नहीं है कि ऐसी जाॅंच की जाए।

    यदि यथापूर्वोक्त किसी व्यक्ति के संबंध में यह प्रश्न उठता है कि खंड (2) में निर्दिष्ट जांच करना युक्तियुक्त रूप से साध्य है या नहीं तो उस व्यक्ति को पदच्युत करने या पद से हटाने या पंक्ति में अवनत करने के लिए सशक्त प्राधिकारी का उस पर विनिश्चय अंतिम होगा ।

    अनुच्छेद 315. संघ और राज्यों के लिए लोक सेवा आयोग:

    यदि किसी राज्य का राज्यपाल संघ लोक सेवा आयोग से ऐसा करने का अनुरोध करता है तो वह राष्ट्रपति के अनुमोदन से, उस राज्य की सभी या किन्हीं आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिए सहमत हो सकेगा ।

    अनुच्छेद 316. सदस्यों की नियुक्ति और पदावधि:

    1. लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और अन्य सदस्यों की नियुक्ति, यदि वह संघ आयोग या संयुक्त आयोग है तो, राष्ट्रपति द्वारा और, यदि वह राज्य आयोग है तो राज्य के राज्यपाल द्वारा की जाएगी ।
      1. यदि आयोग के अध्यक्ष का पद रिक्त हो जाता है या यदि कोई ऐसा अध्यक्षता अनुपस्थिति के कारण या अन्य कारण से अपने पद के कर्तव्यों का पालन करने में असमर्थ है तो, यथास्थिति, जब तक रिक्त पद पर खंड (1) के अधीन नियुक्त कोई व्यक्ति उस पद का कर्तव्य भार ग्रहण नहीं कर लेता है या जब तक अध्यक्ष अपने कर्तव्यों को फिर से नही संभाल लेता है तब तक आयोग के अन्य सदस्यों में से ऐसा एक सदस्य, जिसे संघ आयोग या संयुक्त आयोग की दशा में राष्ट्रपति और राज्य आयोग की दशा में उस राज्य का राज्यपाल इस प्रयोजन के लिए नियुक्त करे, उन कत्र्तव्यों का पालन करेगा ।
    2. लोक सेवा आयोग का सदस्य, अपने पद ग्रहण की तारीख से छह वर्ष की अवधि तक या संघ आयोग की दशा में पैंसठ वर्ष की आयु प्राप्त कर लेने तक और राज्य आयोग या संयुक्त आयोग की दशा में बासठ वर्ष की आयु प्राप्त कर लेने तक, इनमें से जो भी पहले हो, अपना पद धारण करेगा,

      परन्तु:

      1. लोक सेवा आयोग का कोई सदस्य, संघ आयोग या संयुक्त आयोग की दशा में राष्ट्रपति को और राज्य आयोग की दशा में राज्य के राज्यपाल को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्याग सकेगा ।

    अनुच्छेद 317. लोक सेवा आयोग के किसी सदस्य का हटाया जाना और निलम्बित किया जाना:

    आयोग के अध्यक्ष या किसी अन्य सदस्य को, जिसके संबंध में खण्ड (1) के अधीन उच्चतम न्यायालय को निर्देश दिया गया है, संघ आयोग या संयुक्त आयोग की दशा में राष्ट्रपति और राज्य आयोग की दशा में राज्यपाल उसके पद से तब तक के लिए निलंबित कर सकेगा जब तक राष्ट्रपति ऐसे निर्देश पर उच्चतम न्यायालय का प्रतिवेदन मिलने पर अपना आदेश पारित नही कर देता है ।

    अनुच्छेद 318. आयोग के सदस्यों और कर्मचारिवृन्द की सेवा की शर्तों के बारे में विनियम बनाने की शक्ति:

    संघ आयोग या संयुक्त आयोग की दशा में राष्ट्रपति और राज्य आयोग की दशा में उस राज्य का राज्यपाल विनियमों द्वारा:

    1. आयोग के सदस्यों की संख्या और उनकी सेवा की शर्तों का अवधारण कर सकेगा, और
    2. आयोग के कर्मचारिवृन्द के सदस्यों की संख्या और उनकी सेवा की शर्तों के सम्बन्ध में उपबंध कर सकेगा ।

    परन्तु लोक सेवा आयोग के सदस्य की सेवा की शर्तों में उसकी नियुक्ति के पश्चात उसके लिए अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जाएगा ।

    अनुच्छेद 320. लोक सेवा आयोगों के कृत्य:

    भारत सरकार या किसी राज्य की सरकार या भारत में क्राउन के अधीन या किसी देशी राज्य की सरकार के अधीन सिविल हैसियत में सेवा करते समय किसी व्यक्ति को हुई क्षतियों के बारे में पेंशन अधिनिर्णीत किये जाने के लिए किसी दावे पर और ऐसे अधिनिर्णय की रकम विषयक प्रश्न पर,
    परामर्श किया जाएगा और इस प्रकार उसे निर्देशित किये गये किसी विषय पर तथा ऐसे किसी अन्य विषय पर, जिसे, यथास्थिति, राष्ट्रपति या उस राज्य का राज्यपाल उसे निर्देशित करें, परामर्श देने का लोक सेवा आयेाग का कर्तव्य होगा । परन्तु अखिल भारतीय सेवाओं के संबंध में तथा संघ के कार्यकलाप से संबंधित अन्य सेवाओं और पदों के संबंध में तथा संघ के कार्यकलाप से संबंधित अन्य सेवाओं और पदों के संबंध में भी राष्ट्रपति तथा राज्य के कार्यकलाप से संबंधित अन्य सेवाओं और पदों के संबंध में राज्यपाल उन विषयों को विनिर्दिष्ट करने वाले विनियम बना सकेगा जिनमें साधारणतया या किसी विशिष्ट वर्ग के मामले में या किन्हीं विशिष्ट परिस्थितियों में लोक सेवा आयोग से परामर्श किया जाना आवश्यक नहीं होगा ।

    राष्ट्रपति या किसी राज्य के राज्यपाल द्वारा खंड (3) के परंतुक के अधीन बनाए गए सभी विनियम, बनाये जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, यथास्थिति, संसद के प्रत्येक सदन या राज्य के विधान मण्डल के सदन या प्रत्येक सदन के समक्ष कम से कम चैदह दिन के लिए रखे जाएंगे और निरसन या संशोधन द्वारा किये गऐ ऐसे उपांतरणों के अधीन होंगे जो संसद के दोनों सदन या उस राज्य के विधान मण्डल का सदन या दोनों सदन उस सत्र में करें जिसमें वे इस प्रकार रखे गये हैं ।

    अनुच्छेद 323. लोक सेवा आयोगों के प्रतिवेदन:

    राज्य आयोग का यह कर्तव्य होगा कि वह राज्य के राज्यपाल को आयोग द्वारा किए गए कार्य के बारे में प्रतिवर्ष प्रतिवेदन दे और संयुक्त आयोग का यह कर्तव्य होगा कि ऐसे राज्यों में से प्रत्येक के, जिनकी आवश्यकताओं की पूर्ति संयुक्त आयोग द्वारा की जाती है, राज्यपाल को उस राज्य के संबंध में आयोग द्वारा किये गये कार्य के बारे में प्रतिवर्ष प्रतिवेदन दें और दोनों में से प्रत्येक दशा में ऐसा प्रतिवेदन प्राप्त होने पर, राज्यपाल उन मामलों के संबंध में, यदि कोई हों, जिनमें आयोग की सलाह स्वीकार नहीं की गयी थी, ऐसी अस्वीकृति के कारणों को स्पष्ट करने वाले ज्ञापन सहित उस प्रतिवेदन की प्रति राज्य के विधान मण्डल के समक्ष रखवाएगा ।

    अनुच्छेद 324. निर्वाचनों के अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण का निर्वाचन आयोग में निहित होना:

    जब निर्वाचन आयोग ऐसा अनुरोध करे तब राष्ट्रपति या किसी राज्य का राज्यपाल निर्वाचन आयोग या प्रादेशिक आयुक्त को उतने कर्मचारिवृन्द उपलब्ध कराएगा जितने खंड (1) द्वारा निर्वाचन आयोग को सौंपे गये कृत्यों के निर्वहन के लिए आवश्यक हों ।

    अनुच्छेद 333. राज्यों की विधान सभाओं में आंग्ल-भारतीय समुदाय का प्रतिनिधित्व:

    अनुच्छेद 170 में किसी बात के होते हुए भी, यदि किसी राज्य के राज्यपाल की यह राय है कि उस राज्य की विधान सभा में आंग्ल-भारतीय समुदाय का प्रतिनिधित्व आवश्यक है और उसमें उसका प्रतिनिधित्व पर्याप्त नहीं है तो वह उस विधान सभा में उस समुदाय का एक सदस्य नाम निर्देशित कर सकेगा ।

    अनुच्छेद 338. राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग:

    जहां कोई ऐसा प्रतिवेदन, या उसका केाई भाग किसी ऐसे विषय से संबंधित है जिसका किसी राज्य सरकार से संबंध है तो ऐसे प्रतिवेदन की एक प्रति उस राज्य के राज्यपाल को भेजी जाएगी जो उसे राज्य के विधानमण्डल के समक्ष रखवाएगा और उसके साथ राज्य से संबंधित सिफारिशों पर की गयी या किये जाने के लिए प्रस्थापित कार्रवाही तथा यदि कोई ऐसी सिफारिश अस्वीकृत की गयी है तो अस्वीकृति के कारणों को स्पष्ट करने वाला ज्ञापन भी होगा ।

    अनुच्छेद 338क. राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग:

    जहां कोई ऐसी रिपोर्ट या उसका केाई भाग, किसी ऐसे विषय से संबंधित है जिसका किसी राज्य सरकार से संबंध है तो ऐसी रिपोर्ट की एक प्रति उस राज्य के राज्यपाल को भेजी जाएगी जो उसे राज्य के विधान मण्डल के समक्ष रखवाएगा और उसके साथ राज्य से संबंधित सिफारिशों पर की गयी या किए जाने के लिए प्रस्थापित कार्यवाही तथा यदि कोई ऐसी सिफारिश अस्वीकृत की गयी है तो अस्वीकृति के कारणों को स्पष्ट करने वाला ज्ञापन भी होगा ।

    अनुच्छेद 341. अनुसूचित जातियाॅं:

    1. राष्ट्रपति, किसी राज्य या संघ राज्यक्षेत्र के संबंध में और जहां वह राज्य है वहां उसके राज्यपाल से परामर्श करने के पश्चात लोक अधिसूचना द्वारा, उन जातियों, मूलवंशों या जनजातियों, अथवा जातियों, मूलवंशों या जनजातियों के भागों या उनमें के यूथों को विनिर्दिष्ट कर सकेगा, जिन्हें इस संविधान के प्रयोजनों के लिए, यथास्थिति उस राज्य या संघ राज्य क्षेत्र के संबंध में अनुसूचित जातियाॅं समझा जाएगा ।

    अनुच्छेद 342. अनुसूचित जनजातियाॅं:

    1. राष्ट्रपति, किसी राज्य या संघ राज्य क्षेत्र के संबंध में और जहां वह राज्य है वहां उसके राज्यपाल से परामर्श करने के पश्चात लोक अधिसूचना द्वारा, उन जनजातियों या जनजाति समुदायों अथवा जनजातियों या जनजाति समुदायों के भागों या उनमें के यूथों को विनिर्दिष्ट कर सकेगा, जिन्हें इस संविधान के प्रयोजनों के लिए, यथास्थिति उस राज्य या संघ राज्य क्षेत्र के संबंध में अनुसूचित जनजातियाॅं समझा जाएगा ।

    अनुच्छेद 348. उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों में और अधिनियमों, विधेयकों आदि के लिए प्रयोग की जाने वाली भाषा:

    1. इस भाग के पूर्वगामी उपबंधों में किसी बात के होते हुए भी, जब तक संसद विधि द्वारा अन्यथा उपबंध न करे तब तक –
      1. उच्चतम न्यायायलय और प्रत्येक उच्च न्यायालय में सभी कार्यवाहियाॅं अंगे्रजी भाषा में होंगी ।
      2. (प) संसद के प्रत्येक सदन या किसी राज्य के विधान-मण्डल के सदन या प्रत्येक सदन में पुरःस्थापित किये जाने वाले सभी विधेयकों या प्रस्तावित किये जाने वाले उनके संशोधन के,
      3. संसद या किसी राज्य के विधान-मण्डल द्वारा पारित सभी अधिनियमों के और राष्ट्रपति या किसी राज्य के राज्यपाल द्वारा प्रख्यापित अध्यादेशों के, और
      4. इस संविधान के अधीन अथवा संसद या किसी राज्य के विधान-मण्डल द्वारा बनाई गयी किसी विधि के अधीन निकाले गये या बनाए गये सभी आदेशों, नियमों, विनियमों और उपविधियों के,
        प्राधिकृत पाठ अंगे्रजी भाषा में होंगे ।
    2. खण्ड (1) के उपखण्ड (क) में किसी बात के होते हुए भी, किसी राज्य का राज्यपाल राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से उस उच्च न्यायालय का कार्यवाहियों में, जिसका मुख्य स्थान उस राज्य में है, हिन्दी भाषा का या उस राज्य के शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाली किसी अन्य भाषा का प्रयोग प्राधिकृत कर सकेगा । परन्तु इस खण्ड की कोई बात ऐसे उच्च न्यायालय द्वारा दिये गये किसी निर्णय, डिक्री या आदेश को लागू नहीं होगी ।
    3. खण्ड (1) के उपखण्ड (ख) में किसी बात के होते हुए भी, जहां किसी राज्य के विधान-मण्डल ने, उस विधान मण्डल में पुरःस्थापित विधेयकों में या उसके द्वारा पारित अधिनियमों में अथवा उस राज्य के राज्यपाल द्वारा प्रख्यापित अध्यादेशों में अथवा उस उपखण्ड के पैरा (पपप) में निर्दिष्ट किसी आदेश, नियम, विनियम या उपविधि में प्रयोग के लिए अंग्रेजी भाषा से भिन्न कोई भाषा विहित की है, वहां उस राज्य के राजपत्र में उस राज्य के राज्यपाल के प्राधिकार से प्रकाशित अंग्रेजी भाषा में उसका अनुवाद इस अनुच्छेद के अधीन उसका अंग्रेजी भाषा में प्राधिकृत पाठ समझा जाएगा ।

    अनुच्छेद 356. राज्यों में सांविधानिक तंत्र के विफल हो जाने की दशा में उपबन्ध:

    1. यदि राष्ट्रपति का, किसी राज्य के राज्यपाल से प्रतिवेदन मिलने पर या अन्यथा, यह समाधान हो जाता है कि ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गयी है जिसमें उस राज्य का शासन इस संविधान के उपबंधों के अनुसार नहीं चलाया जा सकता है, तो राष्ट्रपति उद्घोषणा द्वारा –
      1. उस राज्य की सरकार के सभी या कोई कृत्य और राज्यपाल में या राज्य के विधान मण्डल से भिन्न राज्य के किसी निकाय या प्राधिकारी में निहित या उसके द्वारा प्रयोक्तव्य सभी या कोई शक्तियाॅं अपने हाथ में ले सकेगा ।
      2. यह घोषणा कर सकेगा कि राज्य के विधान-मण्डल की शक्तियाॅं संसद द्वारा या उसके प्राधिकार के अधीन प्रयोक्तव्य होंगी
      3. राज्य के किसी निकाय या प्राधिकारी से संबंधित इस संविधान के किन्हीं उपबंधों के प्रवर्तन को पूर्णतः या भागतः निलम्बित करने के लिए उपबंधों सहित ऐसे आनुषंगिक और पारिणामिक उपबंध कर सकेगा जो उद्घोषणा के उद्देश्यों को प्रभावी करने के लिए राष्ट्रपति को आवश्यक या वांछनीय प्रतीत हों:

      परन्तु इस खण्ड की कोई बात राष्ट्रपति को उच्च न्यायालय में निहित या उसके द्वारा प्रयोक्तव्य किसी शक्ति को अपने हाथ में लेने या उच्च न्यायालयों से संबंधित इस संविधान के किसी उपबंध के प्रवर्तन को पूर्णतः या भागतः निलम्बित करने के लिए प्राधिकृत नहीं करेगी ।

    2. ऐसी कोई उद्घोषणा किसी पश्चात््वर्ती उद्घोषणा द्वारा वापस ली जा सकेगी या उसमें परिवर्तन किया जा सकेगा । ……

    अनुच्छेद 361. राष्ट्रपति और राज्यपालों और राजप्रमुखों का संरक्षण:

    1. राष्ट्रपति अथवा राज्य का राज्यपाल या राज्य प्रमुख अपने पद की शक्तियों के प्रयोग और कर्तव्यों के पालन के लिए या उन शक्तियों का प्रयोग और कर्तव्यों का पालन करते हुए अपने द्वारा किए गए या किये जाने के लिए तात्पर्यित किसी कार्य के लिए किसी न्यायालय को उत्तरदायी नहीं होगा । ….
    2. राष्ट्रपति या किसी राज्य के राज्यपाल के विरुद्ध उसकी पदावधि के दौरान किसी न्यायालय में किसी भी प्रकार की दांडिक कार्यवाही संस्थित नहीं की जाएगी या चालू नहीं रखी जाएगी ।
    3. राष्ट्रपति या किसी राज्य के राज्यपाल की पदावधि के दौरान उसकी गिरफ्तारी या कारावास के लिए किसी न्यायालय से कोई आदेशिका निकाली नहीं जाएगी ।
    4. राष्ट्रपति या किसी राज्य के राज्यपाल के रूप में अपना पद ग्रहण करने से पहले या उसके पश्चात उसके द्वारा अपनी वैयक्तिक हैसियत में किये गये या किए जाने के लिए तात्पर्यित किसी कार्य के संबंध में कोई सिविल कार्यवाहियाॅं, जिनमें राष्ट्रपति या ऐसे राज्य के राज्यपाल के विरुद्ध अनुतोष का दावा किया जाता है, उसकी पदावधि के दौरान किसी न्यायालय में तब तक संस्थित नहीं की जाएगी जब तक कार्यवाहियों की प्रकृति, उनके लिए वाद हेतुक, ऐसी कार्यवाहियों को संस्थित करने वाले पक्षकार का नाम, वर्णन, निवास-स्थान और उस अनुतोष का जिसका वह दावा करता है, कथन करने वाली लिखित सूचना, यथास्थिति, राष्ट्रपति या राज्यपाल को परिदत्त किये जाने या उसके कार्यालय में छोड़े जाने के पश्चात् दो मास का समय समाप्त नहीं हो गया है ।

    अनुच्छेद 367, व्याख्या :

    इस संविधान में कोई भी संदर्भ चाहे वह संसद द्वारा निर्मित हो, अथवा कोई भी अधिनियम अथवा कानून चाहे वह राज्य विधान मण्डल द्वारा बनाया गया हो, राष्ट्रपति अथवा राज्यपाल द्वारा जारी किये गए अध्यादेश के संदर्भ के रूप में माना जाएगा, जैसा भी मामला हो |

    द्वितीय व अन्य अनुसूचियों के प्रावधान

    परिसहाय (सैन्य) / राज्यपाल
    क्रमांक नाम कब से : कब तक :
    1 कैप्टन स स रहेजा 1968 1970
    2 कैप्टन प्रेमवीर सिंह 1971 1974
    3 कैप्टन जसवंत सिंह सरोही  1974 1977
    4 कैप्टन हरिंदर सिंह चहल  01.03.1980 28.02.1982
    5 कैप्टन ज० स० यादव  01.03.1982 28.02.1983
    6 कैप्टन अश्वनी कुमार 01.02.1983 25.07.1984
    7 कैप्टन व० क० वर्मा  01.08.1984 21.02.1986
    8 कैप्टन ग० म० विश्वानथन 05.04.1986 31.05.1988
    9 कैप्टन र० क० भाटिया   14.07.1988 31.10.1990
    10 कैप्टन  अशोकन क 05.10.1990 11.03.1993
    11 कैप्टन स० बेंजामिन 11.03.1993 22.12.1995
    12 कैप्टन नितिन य० सावंत 22.12.1995 12.10.1999
    13 कैप्टन स० प० राजीव 13.01.1999 15.03.2001
    14 कैप्टन श्रीजीत क० स० म०  15.03.2001 01.09.2003
    15 कैप्टन शशांक खुसवहा  01.09.2003 16.12.2004
    16 मेजर शशांक खुसवहा 16.12.2004 08.09.2006
    17 मेजर अभिषेक शर्मा 08.09.2006 23.04.2010
    18 मेजर भास्कर झा 20.11.2010 09.01.2013
    19 मेजर आनंद अ० शिराली 09.01.2013 26.06.2015
    20 मेजर कृष्णा सिंह 26.06.2015 25.12.2017
    21 स्क्वड्रन लीडर सौरभ यादव 25.12.2017 09.08.2020
    22 मेजर जसदीप सिंह, स० म०   09.08.2020 आज तक

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    • Shri Bandaru Dattatraya(Hon’ble Governor Haryana)

          • Shri Bakhvinder Singh, OSD to Governor/Deputy Secretary, Haryana Raj Bhavan
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        • Dr. Rakesh Talwar, Senior Medical Officer (Haryana Raj Bhavan Dispensary)
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          • Shri Ashish, Lab Technician
    • 2020 के वर्ष में भाषण
    • 2017 के वर्ष में भाषण
    • 2016 के वर्ष में भाषण
    • 2015 के वर्ष में भाषण
    • 2014 के वर्ष में भाषण

    Article 151. Audit reports :

    1. The reports of the Comptroller and Auditor-General of India relating to the accounts of a State shall be submitted to the Governor of the State, who shall cause them to be laid before the Legislature of the State.

    Article 153. The Governor :

    There shall be a Governor for each State. Provided that nothing in this Article shall preventthe appointment of the same person as Governor for twoor more States.

    Article 154. Executive power of State :

    1. The executive power of the State shall be vested in the Governor and shall be exercised by him either directly or through officers subordinate to him in accordance with this Constitution.
    2. Nothing in this Article shall—
    1. be deemed to transfer to the Governor any functions conferred by any existing law on any other authority; or
    2. prevent Parliament or the Legislature of the State from conferring by law functions on any authority subordinate to the Governor.

    Article 155. Appointment of Governor :

    • The Governor of a State shall be appointed by the President by warrant under his hand and seal.

    Article 156. Term of office of Governor :

    1. The Governor shall hold office during the pleasure of the President.
    2. The Governor may, by writing under his hand addressed to the President, resign his office.
    3. Subject to the foregoing provisions of this Article, a Governor shall hold office for a term of five years from the date on which he enters upon his office. Provided that a Governor shall, notwithstanding the expiration of his term, continue to hold office until his successor enters upon his office.

    Article 157. Qualifications for appointment as Governor :

    No person shall be eligible for appointment as Governor unless he is a citizen of India and has completed the age of thirty-five years.

    Article 158. Conditions of Governor’s office.

    1. The Governor shall not be a member of either House of Parliament or of a House of the Legislature of any State specified in the First Schedule, and if a member of either House of Parliament or of a House of the Legislature of any such State be appointed Governor, he shall be deemed to have vacated his seat in that House on the date on which he enters upon his office as Governor.
    2. The Governor shall not hold any other office of profit.
    3. The Governor shall be entitled without payment of rent to the use of his official residences and shall be also entitled to such emoluments, allowances and privileges as may be determined by Parliament by law and, until provision in that behalf is so made, such emoluments, allowances and privileges as are specified in the Second Schedule.
      1. Where the same person is appointed as Governor of two or more States, the emoluments and allowances payable to the Governor shall be allocated among the States in such proportion as the President may by order determine.
    4. The emoluments and allowances of the Governor shall not be diminished during his term of office.

    Article 159. Oath or affirmation by the Governor :

    • Every Governor and every person discharging the functions of the Governor shall, before entering upon his office, make and subscribe in the presence of the Chief Justice of the High Court exercising jurisdiction in relation to the State, or, in his absence, the seniormost Judge of that Court available, an oath or affirmation in the following form, that is to say :
    • “I, A.B., do swear in the name of God / solemnly affirm that I will faithfully execute the office of Governor (or discharge the functions of the Governor) of ……… (name of State) and will to the best of my ability preserve, protect and defend the Constitution and the law and that I will devote myself to the service and well-being of the people of ………. (name of the State).”

    Article 160. Discharge of the functions of the Governor in certain contingencies :

    The President may make such provision as he thinks fit for the discharge of the functions of the Governor of a State in any contingency not provided for in this Chapter.

    Article 161. Power of Governor to grant pardons, etc., and to suspend, remit or commute sentences in certain cases :

    The Governor of a State shall have the power to grant pardons, reprieves, respites or remissions of punishment or to suspend, remit or commute the sentence of any person convicted of any offence against any law relating to a matter to which the executive power of the State extends.

    Article 163. Council of Ministers to aid and advise Governor:

    1. There shall be a Council of Ministers with the Chief Minister at the head to aid and advise the Governor in the exercise of his functions, except in so far as he is by or under this Constitution required to exercise his functions or any of them in his discretion.
    2. If any question arises whether any matter is or is not a matter as respects which the Governor is by or under this Constitution required to act in his discretion, the decision of the Governor in his discretion shall be final, and the validity of anything done by the Governor shall not be called in question on the ground that he ought or ought not to have acted in his discretion.
    3. The question whether any, and if so what, advice was tendered by Ministers to the Governor shall not be inquired into in any court.

    Article 164. Other provisions as to Ministers :

    1. The Chief Minister shall be appointed by the Governor and the other Ministers shall be appointed by the Governor on the advice of the Chief Minister, and the Ministers shall hold office during the pleasure of the Governor. Provided that in the States of [Chhattisgarh, Jharkhand], Madhya Pradesh and [Odisha] there shall be a Minister in charge of tribal welfare who may in addition be in charge of the welfare of the Scheduled Castes and backward classes or any other work.
      1. The total number of Ministers, including the Chief Minister, in the Council of Ministers in a State shall not exceed fifteen percent of the total number of members of the Legislative Assembly of that State. Provided that the number of Ministers, including the Chief Minister in a State shall not be less than twelve. Provided further that where the total number of Ministers including the Chief Minister in the Council of Ministers in any State at the commencement of the Constitution (Ninety-first Amendment) Act, 2003 exceeds the said fifteen percent or the number specified in the first proviso, as the case may be, then the total number of Ministers in that State shall be brought in conformity with the provisions of this clause within six months from such date as the President may by public notification appoint.
      2. A member of the Legislative Assembly of a State or either House of the Legislature of a State having Legislative Council belonging to any political party who is disqualified for being a member of that House under paragraph 2 of the Tenth Schedule shall also be disqualified to be appointed as a Minister under clause (1) for duration of the period commencing from the date of his disqualification till the date on which the term of his office as such member would expire or where he contests any election to the Legislative Assembly of a State or either House of the Legislature of a State having Legislative Council, as the case may be, before the expiry of such period, till the date on which he is declared elected, whichever is earlier.
      3. The Council of Ministers shall be collectively responsible to the Legislative Assembly of the State.
      4. Before a Minister enters upon his office, the Governor shall administer to him the oaths of office and of secrecy according to the forms set out for the purpose in the Third Schedule.
      5. A Minister who for any period of six consecutive months is not a member of the Legislature of the State shall at the expiration of that period cease to be a Minister.
      6. The salaries and allowances of Ministers shall be such as the Legislature of the State may from time to time by law determine and, until the Legislature of the State so determines, shall be as specified in the Second Schedule.

      Article 165. The Advocate-General for the State :

      1. The Governor of each State shall appoint a person who is qualified to be appointed a Judge of a High Court to be Advocate-General for the State.
      2. It shall be the duty of the Advocate-General to give advice to the Government of the State upon such legal matters, and to perform such other duties of a legal character, as may from time to time be referred or assigned to him by the Governor, and to discharge the functions conferred on him by or under this Constitution or any other law for the time being in force.
      3. The Advocate-General shall hold office during the pleasure of the Governor, and shall receive such remuneration as the Governor may determine.

      Article 166. Conduct of Business of the Government of a State :

      1. All executive action of the Government of a State shall be expressed to be taken in the name of the Governor.
      2. Orders and other instruments made and executed in the name of the Governor shall be authenticated in such manner as may be specified in rules to be made by the Governor, and the validity of an order or instrument which is so authenticated shall not be called in question on the ground that it is not an order or instrument made or executed by the Governor.
      3. The Governor shall make rules for the more convenient transaction of the business of the Government of the State, and for the allocation among Ministers of the said business in so far as it is not business with respect to which the Governor is by or under this Constitution required to act in his discretion.

      Article 167. Duties of Chief Minister as respects the furnishing of information to Governor etc. :

      It shall be the duty of the Chief Minister of each State—

      1. to communicate to the Governor of the State all decisions of the Council of Ministers relating to the administration of the affairs of the State and proposals for legislation;
      2. to furnish such information relating to the administration of the affairs of the State and proposals for legislation as the Governor may call
        for; and
      3. if the Governor so requires, to submit for the consideration of the Council of Ministers any matter on which a decision has been taken by a Minister but which has not been considered by the Council.

      Article 168. Constitution of Legislatures in States :

      1. For every State there shall be a Legislature which shall consist of the Governor, and :
        1. In the States of Bihar, Maharashtra, Karnataka and Uttar Pradesh two Houses;
        2. In other States, one House.
      2. Where there are two Houses of the Legislature of a State, one shall be known as the Legislative Council and the other as the Legislative Assembly, and where there is only one House, it shall be known as the Legislative Assembly.

      Article 171. Composition of the Legislative Councils :

      Of the total number of members of the Legislative Council of a State—

      1. as nearly as may be, one-third shall be elected by electorates consisting of members of municipalities, district boards and such other local authorities in the State as Parliament may by law specify;
      2. as nearly as may be, one-twelfth shall be elected by electorates consisting of persons residing in the State who have been for at least three years graduates of any university in the territory of India or have been for at least three years in possession of qualifications prescribed by or under any law made by Parliament as equivalent to that of a graduate of any such university;
      3. as nearly as may be, one-twelfth shall be elected by electorates consisting of persons who have been for at least three years engaged in teaching in such educational institutions within the State, not lower in standard than that of a secondary school, as may
        be prescribed by or under any law made by Parliament;
      4. as nearly as may be, one-third shall be elected by the members of the Legislative Assembly of the State from amongst persons who are not members of the Assembly;
      5. the remainder shall be nominated by the Governor in accordance with the provisions of clause (5).

      The members to be nominated by the Governor under sub-clause (e) of clause (3) shall consist of persons having special knowledge or practical experience in respect of such matters as the following, namely ; Literature, science, art, co-operative movement and social service.

      Article 174. Sessions of the State Legislature, prorogation and dissolution :

      1. The Governor shall from time to time summon the House or each House of the Legislature of the State to meet at such time and place as he thinks fit, but six months shall not intervene between its last sitting in one session and the date appointed for its first sitting in the next session.
      2. The Governor may from time to time—
        1. prorogue the House or either House;
        2. dissolve the Legislative Assembly.

      Article 175. Right of Governor to address and send messages to the House or Houses.

      1. The Governor may address the Legislative Assembly or, in the case of a State having a Legislative Council, either House of the Legislature
        of the State, or both Houses assembled together, and may for that purpose require the attendance of members.
      2. The Governor may send messages to the House or Houses of the Legislature of the State, whether with respect to a Bill then pending in the Legislature or otherwise, and a House to which any message is so sent shall with all convenient despatch consider any matter required by the message to be taken into consideration.

      Article 176. Special address by the Governor :

      1. At the commencement of the first session after each general election to the Legislative Assembly and at the commencement of the first session of each year, the Governor shall address the Legislative Assembly or, in the case of a State having a Legislative Council, both Houses assembled together and inform the Legislature of the causes of its summons.
      2. Provision shall be made by the rules regulating the procedure of the House or either House for the allotment of time for discussion of the matters referred to in such address.

      Article 180. Power of the Deputy Speaker or other person to perform the duties of the office of, or to act as, Speaker :

      1. While the office of Speaker is vacant, the duties of the office shall be performed by the Deputy Speaker or, if the office of Deputy Speaker is also vacant, by such member of the Assembly as the Governor may appoint for the purpose.
      2. During the absence of the Speaker from any sitting of the Assembly the Deputy Speaker or, if he is also absent, such person as may be determined by the rules of procedure of the Assembly, or, if no such person is present, such other person as may be determined by the Assembly, shall act as Speaker.

      Article 184. Power of the Deputy Chairman or other person to perform the duties of the office of, or to act as, Chairman :

      1. While the office of Chairman is vacant, the duties of the office shall be performed by the Deputy Chairman or, if the office of Deputy Chairman is also vacant, by such member of the Council as the Governor may appoint for the purpose.

      Article 187. Secretariat of State Legislature :

      1. The House or each House of the Legislature of a State shall have a separate secretarial staff. Provided that nothing in this clause shall, in the case of the Legislature of a State having a Legislative Council, be construed as preventing the creation of posts common to both Houses of such Legislature.
      2. The Legislature of a State may by law regulate the recruitment, and the conditions of service of persons appointed, to the secretarial staff of the House or Houses of the Legislature of the State.
      3. Until provision is made by the Legislature of the State under clause (2), the Governor may, after consultation with the Speaker of the Legislative Assembly or the Chairman of the Legislative Council, as the case may be, make rules regulating the recruitment, and the conditions of service of persons appointed, to the secretarial staff of the Assembly or the Council, and any rules so made shall have effect subject to the provisions of any law made under the said clause.

      Article 188. Oath or affirmation by members :

      Every member of the Legislative Assembly or the Legislative Council of a State shall, before taking his seat, make and subscribe before the Governor, or some person appointed in that behalf by him, an oath or affirmation according to the form set out for the purpose in the Third Schedule.

      Article 192. Decision on questions as to disqualifications of members :

      If any question arises as to whether a member of a House of the Legislature of a State has become subject to any of the disqualifications mentioned in clause

      1. of article 191, the question shall be referred for the decision of the Governor and his decision shall be final.
      2. Before giving any decision on any such question, the Governor shall obtain the opinion of the Election Commission and shall act according to such opinion.

      Article 199. Definition of “Money Bills” :

      1. For the purposes of this Chapter, a Bill shall be deemed to be a Money Bill if it contains only provisions dealing with all or any of the following matters, namely:—

        1. the imposition, abolition, remission, alteration or regulation of any tax;
        2. the regulation of the borrowing of money or the giving of any guarantee by the State, or the amendment of the law with respect to any financial obligations undertaken or to be undertaken by the State;
        3. the custody of the Consolidated Fund or the Contingency Fund of the State, the payment of moneys into or the withdrawal of moneys from any such Fund;
        4. the appropriation of moneys out of the Consolidated Fund of the State;
        5. the declaring of any expenditure to be expenditure charged on the Consolidated Fund of the State, or the increasing of the amount of any such expenditure;
        6. the receipt of money on account of the Consolidated Fund of the State or the public account of the State or the custody or issue of such money; or
        7. any matter incidental to any of the matters specified in sub-clauses (a) to (f).

      Article 200. Assent to Bills :

      When a Bill has been passed by the Legislative Assembly of a State or, in the case of a State having a Legislative Council, has been passed by both Houses of the Legislature of the State, it shall be presented to the Governor and the Governor shall declare either that he assents to the Bill or that he withholds assent therefrom or that he reserves the Bill for the consideration of the President. Provided that the Governor may, as soon as possible after the presentation to him of the Bill for assent, return the Bill if it is not a Money Bill together with a message requesting that the House or Houses will reconsider the Bill or any specified provisions thereof and, in particular, will consider the desirability of introducing any such amendments as he may recommend in his message and, when a Bill is so returned, the House or Houses shall reconsider the Bill accordingly, and if the Bill is passed again by the House or Houses with or without amendment and presented to the Governor for assent, the Governor shall not withhold assent therefrom. Provided further that the Governor shall not assent to, but shall reserve for the consideration of the President, any Bill which in the opinion of the Governor would, if it became law, so derogate from the powers of the High Court as to endanger the position which that Court is by this Constitution designed to fill.

      Article 201. Bills reserved for consideration :

      When a Bill is reserved by a Governor for the consideration of the President, the President shall declare either that he assents to the Bill or that he withholds assent therefrom. Provided that, where the Bill is not a Money Bill, the President may direct the Governor to return the Bill to the House or, as the case may be, the Houses of the Legislature of the State together with such a message as is mentioned in the first proviso to Article 200 and, when a Bill is so returned, the House or Houses shall reconsider it accordingly within a period of six months from the date of receipt of such message and, if it is again passed by the House or Houses with or without amendment, it shall be presented again to the President for his consideration.

      Article 202. Annual financial statement :

      1. The Governor shall in respect of every financial year cause to be laid before the House or Houses of the Legislature of the State a statement of the estimated receipts and expenditure of the State for that year, in this Part referred to as the “annual financial statement”.
      2. The estimates of expenditure embodied in the annual financial statement shall show separately :
        1. the sums required to meet expenditure described by this Constitution as expenditure charged upon the Consolidated Fund of the State; and
        2. the sums required to meet other expenditure proposed to be made from the Consolidated Fund of the State, and shall distinguish expenditure on revenue account from other expenditure.
      3. The following expenditure shall be expenditure charged on the Consolidated Fund of each State—
        1. the emoluments and allowances of the Governor and other expenditure relating to his office;
        2. the salaries and allowances of the Speaker and the Deputy Speaker of the Legislative Assembly and, in the case of a State having a Legislative Council, also of the Chairman and the Deputy Chairman of the Legislative Council;
        3. debt charges for which the State is liable including interest, sinking fund charges and redemption charges, and other expenditure relating to the raising of loans and the service and redemption of debt,
        4. expenditure in respect of the salaries and allowances of Judges of any High Court;
        5. any sums required to satisfy any judgment, decree or award of any court or arbitral tribunal,
        6. any other expenditure declared by this Constitution, or by the Legislature of the State by law, to be so charged.

      Article 203. Procedure in Legislature with respect to estimates :

      1. So much of the estimates as relates to expenditure charged upon the Consolidated Fund of a State shall not be submitted to the vote of the Legislative Assembly, but nothing in this clause shall be construed as preventing the discussion in the Legislature of any of those estimates.
      2. So much of the said estimates as relates to other expenditure shall be submitted in the form of demands for grants to the Legislative Assembly, and the Legislative Assembly shall have power to assent, or to refuse to assent, to any demand, or to assent to any demand subject to a reduction of the amount specified therein.
      3. No demand for a grant shall be made except on the recommendation of the Governor.

      Article 205. Supplementary, additional or excess grants :

      1. The Governor shall—
        1. if the amount authorised by any law made in accordance with the provisions of Article 204 to be expended for a particular service for the current financial year is found to be insufficient for the purposes of that year or when a need has arisen during the current financial year for supplementary or additional expenditure upon some new service
          not contemplated in the annual financial statement for that year, or
        2. if any money has been spent on any service during a financial year in excess of the amount granted for that service and for that year, cause to be laid before the House or the Houses of the Legislature of the State another statement showing the estimated amount of that expenditure or cause to be presented to the Legislative Assembly of the State a demand for such excess, as the case may be.
      2. The provisions of Articles 202, 203 and 204 shall have effect in relation to any such statement and expenditure or demand and also to any law to be made authorising the appropriation of moneys out of the Consolidated Fund of the State to meet such expenditure or the grant in respect of such demand as they have effect in relation to the annual financial statement and the expenditure mentioned therein or to a demand for a grant and the law to be made for the authorisation of appropriation of moneys out of the Consolidated Fund of the State to meet such expenditure or grant.

      Article 207. Special provisions as to financial Bills

      1. A Bill or amendment making provision for any of the matters specified in sub-clauses (a) to (f) of clause (1) of Article 199 shall not be introduced or moved except on the recommendation of the Governor, and a Bill making such provision shall not be introduced in a Legislative Council. Provided that no recommendation shall be required under this clause for the moving of an amendment making provision for the reduction or abolition of any tax.
      2. A Bill or amendment shall not be deemed to make provision for any of the matters aforesaid by reason only that it provides for the imposition of fines or other pecuniary penalties, or for the demand or payment of fees for licences or fees for services rendered, or by reason that it provides for the imposition, abolition, remission, alteration or regulation of any tax by any local authority or body for local purposes.
      3. A Bill which, if enacted and brought into operation, would involve expenditure from the Consolidated Fund of a State shall not be passed by a House of the Legislature of the State unless the Governor has recommended to that House the consideration of the Bill.

      Article 208. Rules of Procedure :

      In a State having a Legislative Council the Governor, after consultation with the Speaker of the Legislative Assembly and the Chairman of the Legislative Council, may make rules as to the procedure with respect to communications between the two Houses.

      Article 213. Power of Governor to promulgate Ordinances during recess of Legislature.

      1. If at any time, except when the Legislative Assembly of a State is in session, or where there is a Legislative Council in a State, except when both Houses of the Legislature are in session, the Governor is satisfied that circumstances exist which render it necessary for him to take immediate action, he may promulgate such Ordinances as the circumstances appear to him to require. Provided that the Governor shall not, without instructions from the President, promulgate any such Ordinance if :

        1. a Bill containing the same provisions would under this Constitution have required the previous sanction of the President for the introduction thereof into the Legislature; or
        2. he would have deemed it necessary to reserve a Bill containing the same provisions for the consideration of the President; or
        3. an Act of the Legislature of the State containing the same provisions would under this Constitution have been invalid unless, having been reserved for the consideration of the President, it had received
          the assent of the President.
      2. An Ordinance promulgated under this Article shall have the same force and effect as an Act of the Legislature of the State assented to by the Governor, but every such Ordinance—
        1. shall be laid before the Legislative Assembly of the State, or where there is a Legislative Council in the State, before both the Houses, and shall cease to operate at the expiration of six weeks from the reassembly of the Legislature, or if before the expiration of that period a resolution disapproving it is passed by the Legislative Assembly and agreed to by the Legislative Council, if any, upon the passing of the resolution or, as the case may be, on the resolution being agreed to by the Council; and
        2. may be withdrawn at any time by the Governor.
          Explanation : Where the Houses of the Legislature of a State having a Legislative Council are summoned to reassemble on different dates, the period of six weeks shall be reckoned from the later of those dates for the
          purposes of this clause.
      3. If and so far as an Ordinance under this Article makes any provision which would not be valid if enacted in an Act of the Legislature of the State assented to by the Governor, it shall be void. Provided that, for the purposes of the provisions of this Constitution relating to the effect of an Act of the Legislature of a State which is repugnant to an Act of Parliament or an existing law with respect to a matter enumerated in the Concurrent List, an Ordinance promulgated under this Article in pursuance of instructions from the President shall be deemed to be an Act of the Legislature of the State which has been reserved for the consideration of the President and assented to by him

      Article 217. Appointment and conditions of the office of a Judge of a High Court :

      1. Every Judge of a High Court shall be appointed by the President by warrant under his hand and seal on the recommendation of the National Judicial Appointments Commission referred in Article 124A and shall hold office, in the case of an additional or acting Judge, as provided in Article 224, and in any other case, until he attains the age of sixty two years. Provided that—
        1. a Judge may, by writing under his hand addressed to the President, resign his office, (b) a Judge may be removed from his office by the President in the manner provided in clause (4) of Article 124 for the removal of a Judge of the Supreme Court;
        2. the office of a Judge shall be vacated by his being appointed by the President to be a Judge of the Supreme Court or by his being transferred by the President to any other High Court within the territory of India.
      2. A person shall not be qualified for appointment as a Judge of a High Court unless he is a citizen of India and—
        1. has for at least ten years held a judicial office in the territory of India; or (b) has for at least ten years been an advocate of a High Court or of two or more such Courts in succession.

      Article 219. Oath or affirmation by Judges of High Courts :

      Every person appointed to be a Judge of a High Court shall, before he enters upon his office, make and subscribe before the Governor of the State, or some person appointed in that behalf by him, an oath or affirmation according to the form set out for the purpose in the Third Schedule.

      Article 227. Power of superintendence over all courts by the High Court :

      1. Every High Court shall have superintendence over all courts and tribunals throughout the territories in relation to which it exercises jurisdiction.
      2. Without prejudice to the generality of the foregoing provision, the High Court may—
        1. call for returns from such courts;
        2. make and issue general rules and prescribe forms for regulating the practice and proceedings of such courts; and
        3. prescribe forms in which books, entries and accounts shall be kept by the officers of any such courts.
      3. The High Court may also settle tables of fees to be allowed to the sheriff and all clerks and officers of such courts and to attorneys, advocates and pleaders practising therein. Provided that any rules made, forms prescribed or tables settled under clause (2) or clause (3) shall not be inconsistent with the provision of any law for the time being in force, and shall require the previous approval of the Governor.

      Article 229. Officers and servants and the expenses of High Courts :

      Subject to the provisions of any law made by the Legislature of the State, the conditions of service of officers and servants of a High Court shall be such as may be prescribed by rules made by the Chief Justice of the Court or by some other Judge or officer of the Court authorised by the Chief Justice to make rules for the purpose. Provided that the rules made under this clause shall, so far as they relate to salaries, allowances, leave or pensions, require the approval of the Governor of the State.

      Article 230. Extension of jurisdiction of High Courts to Union territories :

      Where the High Court of a State exercises jurisdiction in relation to a Union territory,

      1. nothing in this Constitution shall be construed as empowering the Legislature of the State to increase, restrict or abolish that jurisdiction; and
      2. the reference in article 227 to the Governor shall, in relation to any rules, forms or tables for subordinate courts in that territory, be construed as a reference to the President.

      Article 231. Establishment of a common High Court for two or more States :

      1. In relation to any such High Court:
      2. the reference in article 227 to the Governor shall, in relation to any rules, forms or tables for subordinate courts, be construed as a reference to the Governor of the State in which the subordinate courts are situate; and
      3. the references in articles 219 and 229 to the State shall be construed as a reference to the State in which the High Court has its principal seat. Provided that if such principal seat is in a Union territory, the references in articles 219 and 229 to the Governor, Public Service Commission, Legislature and Consolidated Fund of the State shall be construed respectively as references to the President, Union Public Service Commission, Parliament and Consolidated Fund of India.

      Article 233. Appointment of district judges :

      1. Appointments of persons to be, and the posting and promotion of, district judges in any State shall be made by the Governor of the State in consultation with the High Court exercising jurisdiction in relation to such State.
      2. A person not already in the service of the Union or of the State shall only be eligible to be appointed a district judge if he has been for not less than seven years an advocate or a pleader and is recommended by the High Court for appointment.

      Article 234. Recruitment of persons other than district judges to the judicial service :

      Appointments of persons other than district judges to the judicial service of a State shall be made by the Governor of the State in accordance with rules made by him in that behalf after consultation with the State Public Service Commission and with the High Court exercising jurisdiction in relation to such State.

      Article 237. Application of the provisions of this Chapter to certain class or classes of magistrates :

      The Governor may by public notification direct that the foregoing provisions of this Chapter and any rules made thereunder shall with effect from such date as may be fixed by him in that behalf apply in relation to any class or classes of magistrates in the State as they apply in relation to persons appointed to the judicial service of the State subject to such exceptions and modifications as may be specified in the notification.

      Article 243(g). Definition :

      “village” means a village specified by the Governor by public notification to be a village for the purposes of this Part and includes a group of villages so specified.

      Article 243(I). Constitution of Finance Commission to review financial position :

      The Governor of a State shall, as soon as may be within one year from the commencement of the Constitution (Seventy-third Amendment) Act, 1992, and thereafter at the expiration of every fifth year, constitute a Finance Commission to review the financial position of the Panchayats and to make recommendations to the Governor as to—(c) any other matter referred to the Finance Commission by the Governor in the interests of
      sound finance of the Panchayats. (2)…(3).

      The Governor shall cause every recommendation made by the Commission under this article together with an explanatory memorandum as to the action taken thereon to be laid before the Legislature of the State.

      Article 243K. Elections to the Panchayats :

      1. The superintendence, direction and control of the preparation of electoral rolls for, and the conduct of, all elections to the Panchayats shall be vested in a State Election Commission consisting of a State Election Commissioner to be appointed by the Governor.
      2. Subject to the provisions of any law made by the Legislature of a State, the conditions of service and tenure of office of the State Election Commissioner shall be such as the Governor may by rule determine.

      Article 243L. Application to Union territories :

      The provisions of this Part shall apply to the Union territories and shall, in their application to a Union territory, have effect as if the references to the Governor of a State were references to the Administrator of the Union territory appointed under article 239 and references to the Legislature or the Legislative Assembly of a State were references, in relation to a Union territory having a Legislative Assembly, to that Legislative Assembly.

      Article 243P(c). Definition :

      “Metropolitan area” means an area having a population of ten lakhs or more, comprised in one or more districts and consisting of two or more Municipalities or Panchayats or other contiguous areas, specified by the Governor by public notification to be a Metropolitan area for the purposes of this Part;

      Article 243P(d) Definition :

      “Municipal area” means the territorial area of a Municipality as is notified by the Governor;

      Article 243Q. Constitution of Municipalities :

      1. There shall be constituted in every State :
        1. a Nagar Panchayat (by whatever name called) for a transitional area, that is to say, an area in transition from a rural area to an urban area;
        2. a Municipal Council for a smaller urban area; and
        3. a Municipal Corporation for a larger urban area, in accordance with the provisions of this Part. Provided that a Municipality under this clause may not be constituted in such urban area or part thereof as the Governor may, having regard to the size of the area and the municipal services being provided or proposed to be provided by an industrial establishment in that area and such other factors as he may deem fit, by public notification, specify to be an industrial township.
      2. In this article, “a transitional area”, “a smaller urban area” or “a larger urban area” means such area as the Governor may, having regard to the population of the area, the density of the population therein, the revenue
        generated for local administration, the percentage of employment in non- agricultural activities, the economic importance or such other factors as he may deem fit, specify by public notification for the purposes of this
        Part.

      Article 243-Y. Finance Commission :

      1. The Finance Commission constituted under article 243-I shall also review the financial position of the Municipalities and make recommendations to the Governor ……
      2. The Governor shall cause every recommendation made by the Commission under this article together with an explanatory memorandum as to the action taken thereon to be laid before the Legislature of the State.

      Article 243ZB. Application to Union Territories :

      The provisions of this Part shall apply to the Union territories and shall, in their application to a Union territory, have effect as if the references to the Governor of a State were references to the Administrator of the Union territory appointed under article 239 and references to the Legislature or the Legislative Assembly of a State were references in relation to a Union territory having a Legislative Assembly, to that Legislative Assembly:

      Article 243ZD. Committee for district planning :

      Every District Planning Committee shall, in preparing the draft development plan,—

      1. have regard to—
        1. matters of common interest between the Panchayats and the Municipalities including spatial planning, sharing of water and other physical and natural resources, the integrated development of infrastructure and environmental conservation;
        2. the extent and type of available resources whether financial or otherwise;
      2. consult such institutions and organisations as the Governor may, by order, specify.

      Article 255. Requirements as to recommendations and previous sanctions to be regarded as matters of procedure only :

      No Act of Parliament or of the Legislature of a State, and no provision in any such Act, shall be invalid by reason only that some recommendation or previous sanction required by this Constitution was not given, if assent to that Act was given—

      1. where the recommendation required was that of the Governor, either by the Governor or by the President;
      2. where the recommendation required was that of the Rajpramukh, either by the Rajpramukh or by the President;
      3. where the recommendation or previous sanction required was that of the President, by the President.

      Article 258A.Power of the States to entrust functions to the Union :

      Notwithstanding anything in this Constitution, the Governor of a State may, with the consent of the Government of India, entrust either conditionally or unconditionally to that Government or to its officers functions in relation to any matter to which the exclusive power of the State extends.

      Article 267. Contingency Fund :

      The Legislature of a State may by law establish a Contingency Fund in the nature of an impress to be entitled “the Contingency Fund of the State” into which shall be paid from time to time such sums as may be determined by such law, and the said Fund shall be placed at the disposal of the Governor of the State to enable advances to be made by him out of such Fund for the purposes of meeting unforeseen expenditure pending authorisation of such expenditure by the Legislature of the State by law under article 205 or article 206.

      Article 294. Succession to property, assets, rights, liabilities and obligations in certain cases :

      As from the commencement of this Constitution—

      1. all property and assets which immediately before such commencement were vested in His Majesty for the purposes of the Government of the Dominion of India and all property and assets which immediately before such commencement were vested in His Majesty for the purposes of the Government of each Governor’s Province shall vest respectively in the Union and the corresponding State, and
      2. all rights, liabilities and obligations of the Government of the Dominion of India and of the Government of each Governor’s Province, whether arising out of any contract or otherwise, shall be the rights, liabilities and obligations respectively of the Government of India and the Government of each corresponding State, subject to any adjustment made or to be made by reason of the creation before the commencement of this Constitution of the Dominion of Pakistan or of the Provinces of West Bengal, East Bengal, West Punjab and East Punjab.

      Article 299. Contracts :

      1. All contracts made in the exercise of the executive power of the Union or of a State shall be expressed to be made by the President, or by the Governor of the State, as the case may be, and all such contracts and all assurances of property made in the exercise of that power shall be executed on behalf of the President or the Governor by such persons and in such manner as he may direct or authorise.
      2. Neither the President nor the Governor shall be personally liable in respect of any contract or assurance made or executed for the purposes of this Constitution, or for the purposes of any enactment relating to the Government of India heretofore in force, nor shall any person making or executing any such contract or assurance on behalf of any of them be personally liable in respect thereof.

      Article 309. Recruitment and conditions of service of persons serving the Union or a State :

      Subject to the provisions of this Constitution, Acts of the appropriate Legislature may regulate the recruitment, and conditions of service of persons appointed, to public services and posts in connection
      with the affairs of the Union or of any State. Provided that it shall be competent for the President or such person as he may direct in the case of services and posts in connection with the affairs of the Union, and for the Governor of a State or such person as he may direct in the case of services and posts in connection with the affairs of the State, to make rules regulating the recruitment, and the conditions of service of persons appointed, to such services and posts until provision in that behalf is made by or under an Act of the appropriate Legislature under this article, and any rules so made shall have effect subject to the provisions of any such
      Act.

      Article 310. Tenure of office of persons serving the Union or a State :

      1. Except as expressly provided by this Constitution, every person who is a member of a defence service or of a civil service of the Union or of an all-India service or holds any post connected with defence or any civil post under the Union holds office during the pleasure of the President, and every person who is a member of a civil service of a State or holds any civil post under a State holds office during the pleasure of the Governor of the State.
      2. Notwithstanding that a person holding a civil post under the Union or a State holds office during the pleasure of the President or, as the case may be, of the Governor of the State, any contract under which a person, not being a member of a defence service or of an all-India service or of a civil service of the Union or a State, is appointed under this Constitution to hold such a post may, if the President or the Governor, as the case may be, deems it necessary in order to secure the services of a person having special qualifications, provide for the payment to him of compensation, if before the expiration of an agreed period that post is abolished or he is, for reasons not connected with any misconduct on his part, required to vacate that post.

      Article 311.Dismissal, removal or reduction in rank of persons employed in civil capacities under the Union or a State :

      No such person as aforesaid shall be dismissed or removed or reduced in rank except after an inquiry in which he has been informed of the charges against him and given a reasonable opportunity of being heard in respect of those charges. (a) (b)

      where the President or the Governor, as the case may be, is satisfied that in the interest of the security of the State it is not expedient to hold such inquiry.

      Article 315. Public Service Commissions for the Union and for the States :

      The Public Service Commission for the Union, if requested so to do by the Governor of a State, may, with the approval of the President, agree to serve all or any of the needs of the State.

      Article 316. Appointment and term of office of members :

      1. The Chairman and other members of a Public Service Commission shall be appointed, in the case of the Union Commission or a Joint Commission, by the President, and in the case of a State Commission, by the Governor of the State. Provided…
        1. If the office of the Chairman of the Commission becomes vacant or if any such Chairman is by reason of absence or for any other reason unable to perform the duties of his office, those duties shall, until some person appointed under clause (1) to the vacant office has entered on the duties thereof or, as the case may be, until the Chairman has resumed his duties, be performed by such one of the other members of the Commission as the President, in the case of the Union Commission or a Joint Commission, and the Governor of the State in the case of a State Commission, may appoint for the purpose.
      2. A member of a Public Service Commission shall hold office for a term of six years from the date on which he enters upon his office or until he attains, in the case of the Union Commission, the age of sixty-five years, and in the case of a State Commission or a Joint Commission, the age of sixty-two years, whichever is earlier. Provided that—
        1. a member of a Public Service Commission may, by writing under his hand addressed, in the case of the Union Commission or a Joint Commission, to the President, and in the case of a State Commission, to the Governor of the State, resign his office.

      Article 317. Removal and suspension of a member of a Public Service Commission :

      The President, in the case of the Union Commission or a Joint Commission, and the Governor in the case of a State Commission, may suspend from office the Chairman or any other member of the Commission in respect of whom a reference has been made to the Supreme Court under clause (1) until the President has passed orders on receipt of the report of the Supreme Court on such reference.

      Article 318. Power to make regulations as to conditions of service of members and staff of the Commission :

      In the case of the Union Commission or a Joint Commission, the President and, in the case of a State Commission, the Governor of the State may by regulations—

      1. determine the number of members of the Commission and their conditions of service; and
      2. make provision with respect to the number of members of the staff of the Commission and their conditions of service. Provided that the conditions of service of a member of a Public Service Commission shall not be varied to his disadvantage after his appointment.

      Article 320. Function of Public Service Commission :

      The Union Public Service Commission or the State Public Service Commission, as the case may be, shall be consulted—

      1. on all matters relating to methods of recruitment to civil services and for civil posts;
      2. on the principles to be followed in making appointments to civil services and posts and in making promotions and transfers from one service to another and on the suitability of candidates for such appointments, promotions or transfers;
      3. on all disciplinary matters affecting a person serving under the Government of India or the Government of a State in a civil capacity, including memorials or petitions relating to such matters;
      4. on any claim by or in respect of a person who is serving or has served under the Government of India or the Government of a State or under the Crown in India or under the Government of an Indian State, in a civil capacity, that any costs incurred by him in defending legal proceedings instituted against him in respect of acts done or purporting to be done in the execution of his duty should be paid out of the Consolidated Fund of India, or, as the case may be, out of the Consolidated Fund of the State;
      5. on any claim for the award of a pension in respect of injuries sustained by a person while serving under the Government of India or the Government of a State or under the Crown in India or under the Government of an Indian State, in a civil capacity, and any question as to the amount of any such award,
        and it shall be the duty of a Public Service Commission to advise on any matter so referred to them and on any other matter which the President, or, as the case may be, the Governor of the State, may refer to them.
        Provided that the President as respects the all India services and also as respects other services and posts in connection with the affairs of the Union, and the Governor, as respects other services and posts in connection with the affairs of a State, may make regulations specifying the matters in which either generally, or in any particular class of case or in any particular circumstances, it shall not be necessary for a Public Service Commission to be consulted.

      All regulations made under the proviso to clause (3) by the President or the Governor of a State shall be laid for not less than fourteen days before each House of Parliament or the House or each House of the Legislature of the State, as the case may be, as soon as possible after they are made, and shall be subject to such modifications, whether by way of repeal or amendment, as both Houses of Parliament or the House or both Houses of the Legislature of the State may make during the session in which they are so laid.

      Article 323. Reports of Public Service Commissions :

      It shall be the duty of a State Commission to present annually to the Governor of the State a report as to the work done by the Commission, and it shall be the duty of a Joint Commission to present annually to the Governor of each of the States the needs of which are served by the Joint Commission a report as to the work done by the Commission in relation to that State, and in either case the Governor, shall, on receipt of such report, cause a copy thereof together with a memorandum explaining, as respects the cases, if any, where the advice of the Commission was not accepted, the reasons for such non-acceptance to be laid before the Legislature of the State.

      Article 324. Superintendence, direction and control of elections to be vested in an Election Commission :

      The President, or the Governor of a State, shall, when so requested by the Election Commission, make available to the Election Commission or to a Regional Commissioner such staff as may be necessary for the discharge of the functions conferred on the Election Commission by clause (1).

      Article 333. Representation of the Anglo-Indian community in the Legislative Assemblies of the States :

      Notwithstanding anything in article 170, the Governor of a State may, if he is of opinion that the Anglo-Indian community needs representation in the Legislative Assembly of the State and is not adequately represented therein, nominate one member of that community to the Assembly

      Article 338. National Commission for Scheduled Castes :

      Where any such report, or any part thereof, relates to any matter with which any State Government is concerned, a copy of such reports shall be forwarded to the Governor of the State who shall cause it to be laid before the Legislature of the State along with a memorandum explaining the action taken or proposed to be taken on the recommendations relating to the State and the reasons for the non-acceptance, if any, of any of such recommendations.

      Article 338A. National Commission for Scheduled Tribes :

      Where any such report, or any part thereof, relates to any matter with which any State Government is concerned, a copy of such report shall be forwarded to the Governor of the State who shall cause it to be laid before the Legislature of the State along with a memorandum explaining the action taken or proposed to be taken on the recommendations relating to the State and the reasons for the non-acceptance, if any, of any of such recommendations.

      Article 341. Scheduled Castes :

      1. The President may with respect to any State or Union territory and where it is a State, after consultation with the Governor thereof, by public notification, specify the castes, races or tribes or parts of or groups within castes, races or tribes which shall for the purposes of this Constitution be deemed to be Scheduled Castes in relation to that State or Union territory, as the case may be.

      Article 342. Scheduled Tribes :

      1. The President may with respect to any State or Union territory, and where it is a State, after consultation with the Governor thereof, by public notification, specify the tribes or tribal communities or parts of or groups within tribes or tribal communities which shall for the purposes of this Constitution be deemed to be Scheduled Tribes in relation to that State or Union territory, as the case may be.

      Article 348. Language to be used in the Supreme Court and in the High Courts and for Acts, Bills, etc. :

      1. Notwithstanding anything in the foregoing provisions of this Part, until Parliament by law otherwise provides :

        the authoritative texts—

        1. of all Bills to be introduced or amendments thereto to be moved in either House of Parliament or in the House or either House of the Legislature of a State,
        2. of all Acts passed by Parliament or the Legislature of a State and of all Ordinances promulgated by the President or the Governor of a State, and
        3. of all orders, rules, regulations and bye-laws issued under this Constitution or under any law made by Parliament or the Legislature of a
          State, shall be in the English language
      2. Notwithstanding anything in sub-clause (a) of clause (1), the Governor of a State may, with the previous consent of the President, authorise the use of the Hindi language, or any other language used for any official purposes of the State, in proceedings in the High Court having its principal seat in that State. Provided that nothing in this clause shall apply to any judgment, decree or order passed or made by such High Court.
      3. Notwithstanding anything in sub-clause (b) of clause (1), where the Legislature of a State has prescribed any language other than the English language for use in Bills introduced in, or Acts passed by, the Legislature of the State or in Ordinances promulgated by the Governor of the State or in any order, rule, regulation or bye-law referred to in paragraph (iii) of that sub-clause, a translation of the same in the English language published under the authority of the Governor of the State in the Official Gazette of that State shall be deemed to be the authoritative text thereof in the English language under this article.

      Article 356. Provisions in case of failure of constitutional machinery in States :

      1. If the President, on receipt of a report from the Governor of a State or otherwise, is satisfied that a situation has arisen in which the Government of the State cannot be carried on in accordance with the provisions of this Constitution, the President may by Proclamation—
        1. assume to himself all or any of the functions of the Government of the State and all or any of the powers vested in or exercisable by the Governor or anybody or authority in the State other than the Legislature of the State;
        2. declare that the powers of the Legislature of the State shall be exercisable by or under the authority of Parliament;
        3. make such incidental and consequential provisions as appear to the President to be necessary or desirable for giving effect to the objects of the Proclamation, including provisions for suspending in whole or in part the operation of any provisions of this Constitution relating to anybody or authority in the State.
          Provided that nothing in this clause shall authorise the President to assume to himself any of the powers vested in or exercisable by a High Court, or to suspend in whole or in part the operation of any provision of this Constitution relating to High Courts. (2) to (5).

      Article 361. Protection of President and Governors and Rajpramukhs :

      1. The President, or the Governor or Rajpramukh of a State, shall not be answerable to any court for the exercise and performance of the powers and duties of his office or for any act done or purporting to be done by him in the exercise and performance of those powers and duties. Provided that the conduct of the President may be brought under review by any court, tribunal or body appointed or designated by either House of Parliament for the investigation of a charge under article 61. Provided further that nothing in this clause shall be construed as restricting the right of any person to bring appropriate proceedings against the Government of India or the Government of a State.
      2. No criminal proceedings whatsoever shall be instituted or continued against the President, or the Governor of a State, in any court during his term of office.
      3. No process for the arrest or imprisonment of the President, or the Governor of a State, shall issue from any court during his term of office.
      4. No civil proceedings in which relief is claimed against the President, or the Governor of a State, shall be instituted during his term of office in any court in respect of any act done or purporting to be done by him in his personal capacity, whether before or after he entered upon his office as President, or as Governor of such State, until the expiration of two months next after notice in writing has been delivered to the President or the Governor, as the case may be, or left at his office stating the nature of the proceedings, the cause of action therefor, the name, description and place of residence of the party by whom such proceedings are to be instituted and the relief which he claims.

      Article 367. Interpretation :

      Any reference in this Constitution to Acts or laws of, or made by, Parliament, or to Acts or laws of, or made by, the Legislature of a State, shall be construed as including a reference to an Ordinance made by the President or, to an Ordinance made by a Governor, as the case may be.

      Second Schedule and Other Schedules.

    Ex- officio Chancellor of Universities:

    The Governor of Haryana is the Chancellor of the following Universities in the State:-

    Powers of the Chancellor are prescribed in the relevant Acts/Statutes of the Universities.

    Besides, Hon’ble Governor is ex-officio visitor of the following private Universities in the State:

    Other Offices:

    The following organizations are also headed by the Governor:-

    • Mewat Development Board.
    • Haryana Amalgamated Fund for the Welfare of ESM-Cum-Rajya Sainik Board.
    • State Environment Protection Council, Haryana.
    • Special Board of Motilal Nehru Sports School, Rai.
    • Indian Red Cross Society, Haryana State Branch.
    • St. John Ambulance Association, Haryana State Branch.
    • Haryana State Council for Child Welfare.
    • Haryana Saket Council.
    • Welfare Society for Persons with Speech and Hearing Impairment.
    • Haryana State Bharat Scouts and Guides.
    • Bhartiya Grameen Mahila Sangh (Haryana State Branch).
    • Hind Kusht Nivaran Sangh, Haryana State Branch.
    • Battles of Panipat Memorial Society.

    The Governor is assisted by his Secretariat for the discharge of his functions. Secretary to Governor is Head of Department as well as Administrative Secretary of Haryana Raj Bhavan Affairs. He is also drawing and disbursing officer and controlling officer in respect of expenditure and establishment of the Raj Bhavan and the Governor’s Household. The powers of DDO have further been delegated to Joint Secretary, Raj Bhavan.

    Information for the Public under Right to Information Act, 2005

    In pursuance of State Government’s circular letter No.5/4/2002-1AR, dated 30.9.2005 issued by the Financial Commissioner & Secretary to Government, Haryana, Administrative Reforms Department, with a view to promote openness, transparency, and accountability in the working of public offices and as per the requirements of the provisions 4(b) (i) to (xvii) of the Right to Information Act, 2005 as notified and published in the Gazette of Government of India on 21st June 2005, the following information pertaining to the Haryana Raj Bhavan is made available for the information of the general public. In case any person wishes to obtain any further information relating to the functioning of this office, he/she may contact the Public Information Officer- Smt. Vinod Sabharwal, Accounts Officer, Haryana Raj Bhavan. The First Appellate Authority is Sh. Amarjit Singh, HCS, Joint Secretary Haryana Raj Bhavan.

    Information As Required Under Section 4 (1) (b)(i) OF RTI Act

    The Particulars Of Organization, Functions And Duties:

    Particulars:

    The Haryana Raj Bhavan is the first office of the State Government. It is the office-cum-official residence of Head of State i.e. Hon’ble Governor of Haryana.

    The functions and duties of the Governor are enumerated in the Constitution of India.

    Information As Required Under Section 4 (1) (b)(ii) OF RTI Act

    The Powers And Duties Of Its Officers And Employees:

    Governor:

    The Constitution of India provides as under:-

    Article 153

    Governors of States.-

    There shall be a Governor for each State.

    Article 154.

    Executive power of State. –

    1. The executive power of the State shall be vested in the Governor and shall be exercised by him either directly or through officers subordinate to him in accordance with this Constitution.
    2. Nothing in this article shall–
      1. be deemed to transfer to the Governor any functions conferred by any existing law or any other authority; or
      2. prevent Parliament or the Legislature of the State from conferring by law functions on any authority subordinate to the Governor

    Article 155.

    Appointment of Governor.
    The Governor of a State shall be appointed by the President by warrant under his hand and seal.

    Article 156.

    Term of office of Governor.-

    1. The Governor shall hold office during the pleasure of the President.
    2. The Governor may, by writing under his hand addressed to the President, resign his office.
    3. Subject to the foregoing provisions of this article, a Governor shall hold office for a term of five years from the date on which he enters upon his office.

    Article 157.

    Qualifications for appointment as Governor.-

    No person shall be eligible for appointment as Governor unless he is a citizen of India and has completed the age of thirty-five years.

    Article 158.

    Conditions of Governor’s office.-

    1. The Governor shall not be a member of either House of Parliament or of a House of the Legislature of any State specified in the First Schedule, and if a member of either House of Parliament or of a House of the Legislature of any such State be appointed Governor, he shall be deemed to have vacated his seat in that House on the date on which he enters upon his office as Governor.
    2. The Governor shall not hold any other office of profit.
    3. The Governor shall be entitled without payment of rent to the use of his official residences and shall be also entitled to such emoluments, allowances and privileges as may be determined by Parliament by law and, until provision in that behalf is so made, such emoluments, allowances and privileges as are specified in the Second Schedule.
      1. Where the same person is appointed as Governor of two or more States, the emoluments and allowances payable to the Governor shall be allocated among the States in such proportion as the President may by order determine.
    • The emoluments and allowances of the Governor shall not be diminished during his term of office.

    Article 159 of Constitution of India “Oath or affirmation by Governor”

    Every Governor and every person discharging the functions of the Governor shall, before entering upon his office, make and subscribe in the presence of the chief Justice of the High Court exercising jurisdiction in relation to the State, or, in his absence, the senior most Judge of that court available, an oath or affirmation in the following form, that is to say-swear in the name of God:-

    “I, ____Name, do _____________ that I solemnly affirm will faithfully execute the office of Governor (or discharge the functions of the Governor) of _____ (name of the State) and will to the best of my ability preserve, protect and defend the Constitution and the law and that I will devote myself to the service and well-being of the people of _______ (name of the State).”

    Article 160

    Article 160 of Constitution of India “Discharge of the functions of the Governor in certain contingencies”

    The President may make such provision as he thinks fit for the discharge of the functions of the Governor of a State in any contingency not provided for in this Chapter.

    Article 161.

    Power of Governor to grant pardons, etc., and to suspend, remit or commute sentences in certain cases.-

    The Governor of a State shall have the power to grant pardons, reprieves, respites, or remission of punishment or to suspend, remit or commute the sentence of any person convicted of any offence against any law relating to a matter to which the executive power of the State extends.

    Article 162.

    Article 162 of the Constitution lays down the extent of executive power of the State. Executive power is the authority to govern the State and to enforce orders.

    The 7th Schedule of the Constitution of India gives the allocation of powers and functions between the Union (Centre) and the States. It consists of three lists – Union List, State List, and the Concurrent List. The Union Government/Parliament has the exclusive power to legislate on matters relating to items in the Union List. Similarly, the respective State Governments have exclusive power to legislate on matters/subjects given in the State List. Under the IIIrd List, i.e. the Concurrent List, both the Union and the State authorities have jurisdiction to legislate.

    According to this Article, the State’s executive authority is exclusive for those matters that are mentioned in List II (State List) of the Seventh Schedule of the Constitution of India. This authority also extends to the IIIrd List i.e. the Concurrent List, except if the Constitution or any law that may have been passed by the Parliament say otherwise.

    This Article does not specify the definition of what executive power or function is, but is only concerned with the area of or distribution of the executive powers of the State. Article 162 states that the powers of the State executive extend to those matters upon which the State has the power or the authority to legislate/make laws, and are thereby not confined to those matters over which the States have already legislated upon. Similarly, Article 73 of the Constitution lays down the extent of executive power of the Union.

    If any law that has been enacted by the Parliament lays down that the Union authorities have the power or duty to execute a certain law on a subject in the Concurrent List, then, the State would not be left with the power to exercise executive functions in relation to that subject (up to the extent of powers exercisable by the Union authorities).

    Any decision in exercise of the executive power of the Government can be reviewed by the Court under Article 226 of the Constitution. The judiciary’s powers are limited to examining whether the Government acted in a bona fide manner and on relevant considerations only.

    According to the wordings of Article 162, the extent of executive power of a State is coextensive with its legislative power. In the Concurrent List i.e. the IIIrd List, the executive power of the State would be subject to any laws conferring power to execute on the Union. Where the powers of executing a law on a subject mentioned in the Concurrent List are conferred upon the Union Authorities/Government, by any law enacted by the Parliament or by the Constitution, the executive powers of the State to that extent would stand abrogated.

    Article 163.

    Council of Ministers to aid and advise Governor.-

    1. There shall be a Council of Ministers with the Chief Minister at the head to aid and advise the Governor in the exercise of his functions, except in so far as he is by or under this Constitution required to exercise his functions or any of them in his discretion.
    2. If any question arises whether any matter is or is not a matter as respects which the Governor is by or under this Constitution required to act in his discretion, the decision of the Governor in his discretion shall be final, and the validity of anything done by the Governor shall not be called in question on the ground that he ought or ought not to have acted in his discretion.
    3. The question whether any, and if so what, advice was tendered by Ministers to the Governor shall not be inquired into in any court.

    Article 164.

    Other provisions as to Ministers: –

    1. The Chief Minister shall be appointed by the Governor and the other Ministers shall be appointed by the Governor on the advice of the Chief Minster, and the Ministers shall hold office during the pleasure of the Governor.
    2. Before a Minister enters upon his office, the Governor shall administer to him the oaths of office and of secrecy according to the forms set out for the purpose in the Third Schedule.

    Article 166.

    Conduct of business of the Government of a State.-

    1. All executive action of the Government of a State shall be expressed to be taken in the name of the Governor.
    2. Orders and other instruments made and executed in the name of the Governor shall be authenticated in such manner as may be specified in rules to be made by the Governor, and the validity of an order or instrument which is so authenticated shall not be called in question on the ground that it is not an order or instrument made or executed by the Governor.
    3. The Governor shall make rules for the more convenient transaction of the business of the Government of the State, and for the allocation among Ministers of the said business in so far as it is not business with respect to which the Governor is by or under this Constitution required to act in his discretion.

    The Governor has delegated his powers to the State Government through “Rules of Business of the Government of Haryana, 1977”. The exercise of powers is regulated by law.

    Article 167.

    Duties of Chief Minister as respects the furnishing of information to Governor, etc It shall be the duty of the Chief Minister of each State

    1. to communicate to the Governor of the State all decisions of the council of Ministers relating to the administration of the affairs of the State and proposals for legislation;
    2. to furnish such information relating to the administration of the affairs of the State and proposals for legislation as the Governor may call for; and
    3. if the Governor so requires, to submit for the consideration of the Council of Ministers any matter on which a decision has been taken by a Minister but which has not been considered by the Council CHAPTER III THE STATE LEGISLATURE General

    Article 168 .

    Constitution of Legislatures in States

    1. For every State there shall be a Legislature which shall consist of the Governor, and
      1. in the States of Bihar, Madhya Pradesh, Maharashtra, Karnataka, and Uttar Pradesh, two houses:
      2. in other States, one House
    2. Where there are two Houses of the Legislature of a State, one shall be known as the Legislative Council and the other as the Legislative Assembly, and where there is only one House, it shall be known as the Legislative Assembly

    Article 169 :

    Abolition or creation of Legislative Councils in States

    1. Notwithstanding anything in Article 168, Parliament may by law provide for the abolition of the Legislative Council of a State having such a Council or for the creation of such a Council in a State having no such Council, if the Legislative Assembly of the State passes a resolution to that effect by a majority of the total membership of the Assembly and by a majority of not less than two thirds of the members of the Assembly present and voting
    2. Any law referred to in clause (1) shall contain such provisions for the amendment of this Constitution as may be necessary to give effect to the provisions of the law and may also contain such supplemental, incidental and consequential provisions as Parliament may deem necessary
    3. No such law as aforesaid shall be deemed to be an amendment of this Constitution for the purposes of Article 368

    Article 170.

    Composition of the Legislative Assemblies:

    1. Subject to the provisions of Article 333, the Legislative Assembly of each State shall consist of not more than five hundred, and not less than sixty, members chosen by direct election from territorial constituencies in the State
    2. For the purposes of clause ( 1 ), each State shall be divided into territorial constituencies in such manner that the ratio between the population of each constituency and the number of seats allotted to it shall, so far as practicable, be the same throughout the State Explanation In this clause, the expression population means the population as ascertained at the last preceding census of which the relevant figures have been published: Provided that the reference in this Explanation to the last preceding census of which the relevant figures have been published shall, until the relevant figures for the first census taken after the year 2000 have been published, be construed as a reference to the 1971 census
    3. Upon the completion of each census, the total number of seats in the Legislative Assembly of each State and the division of each State into territorial constituencies shall be readjusted by such authority and in such manner as Parliament may by law determine: Provided that such readjustment shall not affect representation in the Legislative Assembly until the dissolution of the then existing Assembly: Provided further that such readjustment shall take effect from such date as the President may, by order, specify and until such readjustment takes effect, any election to the Legislative Assembly may be held on the basis of the territorial constituencies existing before such readjustment: Provided also that until the relevant figures for the first census taken after the year 2000 have been published, it shall not be necessary to readjust the total number of seats in the Legislative Assembly of each State and the division of such State into territorial constituencies under this clause

    Article 171.

    Composition of the Legislative Councils:

    1. The total number of members in the Legislative Council of a State having such a Council shall not exceed one third of the total number of members in the Legislative Assembly of that State: Provided that the total number of members in the Legislative Council of a State shall in no case be less than forty
    2. Until Parliament by law otherwise provides, the composition of the Legislative Council of a State shall be as provided in clause ( 3 )
    3. Of the total number of members of the Legislative council of a State
      1. as nearly as may be, one third shall be elected by electorates consisting of members of municipalities, district boards and such other local authorities in the State as Parliament may by law specify;
      2. as nearly as may be, one twelfth shall be elected by electorates consisting of persons residing in the State who have been for at least three years graduates of any university in the territory of India or have been for at least three years in possession of qualifications prescribed by or under any law made by Parliament as equivalent to that of a graduate of any such university;
      3. as nearly as may be, one twelfth shall be elected by electorates consisting of persons who have been for at least three years engaged in teaching in such educational institutions within the State, not lower in standard than that of a secondary school, as may be prescribed by or under any law made by Parliament;
      4. as nearly as may be, one third shall be elected by the members of the Legislative Assembly of the State from amongst persons who are not members of the Assembly;
      5. the remainder shall be nominated by the Governor in accordance with the provisions of clause ( 5 )
    • The members to be elected under sub clauses (a), (b) and (c) of clause ( 3 ) shall be chosen in such territorial constituencies as may be prescribed by or under any law made by Parliament, and the election under the said sub clauses and under sub clause (d) of the said clause shall be held in accordance with the system of proportional representation by means of the single transferable vote
    • The members to be nominated by the Governor under sub clause (e) of clause ( 3 ) shall consist of persons having special knowledge or practical experience in respect of such matters as the following, namely: Literature, science, art, co operative movement and social service

    Article 172 .

    Duration of State Legislatures

    1. Every Legislative Assembly of every State, unless sooner dissolved, shall continue for five years from the date appointed for its first meeting and no longer and the expiration of the said period of five years shall operate as a dissolution of the Assembly: Provided that the said period may, while a Proclamation of Emergency is in operation, be extended by Parliament by law for a period not exceeding one year at a time and not extending in any case beyond a period of six months after the Proclamation has ceased to operate

    Article 173 .

    Qualification for membership of the State Legislature A person shall not be qualified to be chosen to fill a seat in the Legislature of a State unless he

    1. Is a citizen of India, and makes and subscribes before some person authorized in that behalf by the Election Commission an oath or affirmation according to the form set out for the purpose in the Third Schedule;
    2. Is, in the case of a seat in the Legislative Assembly, not less than twenty-five years of age and in the case of a seat in the Legislative Council, not less than thirty years of age; and
    3. Possesses such other qualifications as may be prescribed in that behalf by or under any law made by Parliament

    Article 174.

    Sessions of the State Legislature, prorogation and dissolution

    1. The Governor shall from time to time summon the House or each House of the Legislature of the State to meet at such time and place as he thinks fit, but six months shall not intervene between its last sitting in one session and the date appointed for its first sitting in the next session
    2. The Governor may from time to time
      1. Prorogue the House or either House;
      2. Dissolve the Legislative Assembly

    Article 175.

    Right of Governor to address and send messages to the House or Houses

    1. The Governor may address the Legislative Assembly or, in the case of a State having a Legislative Council, either House of the Legislature of the State, or both Houses assembled together, and may for that purpose require the attendance of members
    2. The Governor may sent messages to the House or Houses of the Legislature of the State, whether with respect to a Bill then pending in the Legislature or otherwise, and a House to which any message is so sent shall with all convenient dispatch consider any matter required by the message to be taken into consideration

    Article 176.

    Special address by the Governor

    1. At the commencement of the first session after each general election to the Legislative Assembly and at the commencement of the first session of each year, the Governor shall address the Legislative Assembly or, in the case of a State having a Legislative Council, both House assembled together and inform the Legislature of the causes of its summons
    2. Provision shall be made by the rules regulating the procedure of the House or either House for the allotment of time for discussion of the matters referred to in such address

    Article 187.

    Secretariat of State Legislature

    1. The House or each House of the Legislature of a State shall have a separate secretarial staff: Provided that nothing in this clause shall, in the case of the Legislature of a State having a Legislative Council, be construed as preventing the creation of posts common to both Houses of such Legislature
    2. The Legislature of a State may by law regulate the recruitment, and the conditions of service of persons appointed, to the secretarial staff of the House or Houses of the Legislature of the State
    3. Until provision is made by the Legislature of the State under clause ( 2 ), the Governor may, after consultation with the Speaker of the Legislative Assembly or the Chairman of the Legislative Council, as the case may be, make rules regulating the recruitment, and the conditions of service of persons appointed, to the secretarial staff of the Assembly or the Council, and any rules so made shall have effect subject to the provisions of any law made under the said clause

    Article 188.

    Oath or affirmation by members Every member of the Legislative Assembly or the Legislative Council of a State shall, before taking his seat, make and subscribe before the Governor, or some person appointed in that behalf by him, an oath or affirmation according to the form set out for the purpose in the Third Schedule

    Article 192.

    Decision on questions as to disqualifications of members

    1. If any question arises as to whether a member of a House of the Legislature of a State has become subject to any of the disqualifications mentioned in clause (1) of Article 191, the question shall be referred for the decision of the Governor and his decision shall be final
    2. Before giving any decision on any such question, the Governor shall obtain the opinion of the Election Commission and shall act according to such opinion

    Article 200.

    Assent to Bills When a Bill has been passed by the Legislative Assembly of a State or, in the case of a State having a Legislative Council, has been passed by both Houses of the Legislature of the State, it shall be presented to the Governor and the Governor shall declare either that he assents to the Bill or that he withholds assent therefrom or that he reserves the Bill for the consideration of the President: Provided that the Governor may, as soon as possible after the presentation to him of the Bill for assent, return the Bill if it is not a Money Bill together with a message requesting that the House or Houses will reconsider the Bill or any specified provisions thereof and, in particular, will consider the desirability of introducing any such amendments as he may recommend in his message and, when a Bill is so returned, the House or Houses shall reconsider the Bill accordingly, and if the Bill is passed again by the House or Houses with or without amendment and presented to the Governor for assent, the Governor shall not withhold assent therefrom: Provided further that the Governor shall not assent to, but shall reserve for the consideration of the President, any Bill which in the opinion of the Governor would, if it became law, so derogate from the powers of the High Court as to endanger the position which that Court is by this Constitution designed to fill

    Article 201.

    Bill reserved for consideration When a Bill is reserved by a Governor for the consideration of the President, the President shall declare either that he assents to the Bill or that he withholds assent therefrom: Provided that, where the Bill is not a Money Bill, the President may direct the Governor to return the Bill to the House or, as the case may be, the Houses of the Legislature of the State together with such a message as it mentioned in the first proviso to Article 200 and, when a Bill is so returned, the House or Houses shall reconsider it accordingly within a period of six months from the date of receipt of such message and, if it is again passed by the House or Houses with or without amendment, it shall be presented again to the President for his consideration Procedure in Financial Matters

    Article 205.

    Supplementary, additional or excess grants

    1. The Governor shall
      1. If the amount authorised by any law made in accordance with the provisions of article 204 to be expended for a particular service for the current financial year is found to be insufficient for the purposes of that year or when a need has arisen during the current financial year for supplementary or additional expenditure upon some new service not contemplated in the annual financial statement for that year, or
      2. If any money has been spent on any service during a financial year in excess of the amount granted for that service and for that year, cause to be laid before the House or the Houses of the Legislature of the State another statement showing the estimated amount of that expenditure or cause to be presented to the Legislative Assembly of the State a demand for such excess, as the case may be
    2. The provisions of articles 202, 203 and 204 shall have effect in relation to any such statement and expenditure or demand and also to any law to be made authorising the appropriation of moneys out of the Consolidated Fund of the State to meet such expenditure or the grant in respect of such demand as they have effect in relation to the annual financial statement and the expenditure mentioned therein or to a demand for a grant and the law to be made for the authorisation of appropriation of moneys out of the Consolidated Fund of the State to meet such expenditure or grant

    Article 213.

    Power of Governor to promulgate Ordinances during recess of Legislature

    1. If at any time, except when the Legislative Assembly of a State is in session, or where there is a Legislative Council in a State, except when both Houses of the Legislature are in session, the Governor is satisfied that circumstances exist which render it necessary for him to take immediate action, he may promulgate such Ordinance as the circumstances appear to him to require: Provided that the Governor shall not, without instructions from the President, promulgate any such Ordinance if
      1. A Bill containing the same provisions would under this Constitution have required the previous sanction of the President for the introduction thereof into the Legislature; or
      2. He would have deemed it necessary to reserve a Bill containing the same provisions for the consideration of the President; or
      3. An Act of the Legislature of the State containing the same provisions would under this Constitution have been invalid unless, having been reserved for the consideration of the President, it had received the assent of the President
    2. An Ordinance promulgated under this article shall have the same force and effect as an Act of Legislature of the State assented to by the Governor, but every such Ordinance
      1. Shall be laid before the Legislative Assembly of the State, or where there is a Legislative Council in the State, before both the House, and shall cease to operate at the expiration of six weeks from the reassembly of the Legislature, or if before the expiration of that period a resolution disapproving it is passed by the Legislative Assembly and agreed to by the Legislative Council, if any, upon the passing of the resolution or, as the case may be, on the resolution being agreed to by the Council; and
      2. May be withdrawn at any time by the Governor Explanation Where the Houses of the Legislature of a State having a Legislative Council are summoned to reassemble on different dates, the period of six weeks shall be reckoned from the later of those dates for the purposes of this clause
    3. If and so far as an Ordinance under this article makes any provision which would not be valid if enacted in an Act of the legislature of the State assented to by the Governor, it shall be void: Provided that, for the purposes of the provisions of this Constitution relating to the effect of an Act of the Legislature of a State which is repugnant to an Act of Parliament or an existing law with respect to a matter enumerated in the Concurrent List, an Ordinance promulgated under this article in the Concurrent List, an Ordinance promulgated under this article in pursuance of instructions from the President shall be deemed to be an Act of the Legislature of the State which has been reserved for the consideration of the president and assented to by him

    Ex- officio Chancellor of Universities

    The Hon’ble Governor of Haryana is the Chancellor of the following Universities in the State: –

    1. Maharshi Dayanand University, Rohtak.
    2. Kurukshetra University, Kurukshetra.
    3. Guru Jambheshwar University of Science & Technology, Hisar.
    4. Chaudhary Devi Lal University, Sirsa.
    5. Deenbandhu Chhotu Ram University of Science & Technology, Murthal, Sonepat.
    6. Bhagat Phool Singh Mahila Vishwavidyalaya, Khanpur Kalan, Sonepat.
    7. Pandit Bhagwat Dayal Sharma University of Health Sciences, Rohtak.
    8. J.C. Bose University of Science and Technology, YMCA, Faridabad.
    9. Indira Gandhi University Meerpur , Rewari.
    10. Chaudhary Ranbir Singh University, Jind.
    11. Chaudhary Bansi Lal University, Bhiwani.
    12. Pandit Lakhmi Chand State University of Performing and Visual Arts, Rohtak.
    13. Chaudhary Charan Singh Haryana Agricultural University, Hisar.
    14. Lala Lajpat Rai University of Veterinary and Animal Sciences, Hisar.
    15. Shri Vishwakarma Skill University, Dhudhola (Palwal).
    16. Maharana Pratap Horticultural University, Karnal.
    17. Gurugram University, Gurugram.
    18. Dr. B.R. Ambedkar National Law University, Rai, Sonepat.
    19. Maharishi Balmiki Sanskrit University, Kaithal.
    20. Shri Krishna AYUSH University, Kurukshetra.
    21. Pandit Deen Dayal Upadhayaya University of Health Sciences, Karnal.

    Powers of the Chancellor are prescribed in the relevant Acts/Statutes of the Universities. Besides, Hon’ble Governor is ex-officio Visitor of the following private Universities in the State:-

    1. O.P.Jindal Global University, Sonipat.
    2. The Northcap University (NCU), Gurgaon.
    3. Apeejay Satya University, Gurgaon.
    4. Amity University, Manesar (Gurgaon).
    5. Maharishi Markandeshwar University, Sadopur –Ambala.
    6. NIILM University, Kaithal.
    7. Baba Mast Nath University, Rohtak.
    8. M.V.N. University, Palwal.
    9. Ansal University, Gurgaon.
    10. Shri Guru Gobind Singh Tricentenary University, Gurgaon.
    11. Jagan Nath University, Bahadurgarh.
    12. G.D. Goenka University, Gurgaon.
    13. K.R. Mangalam University, Sohna Road, Gurgaon.
    14. S.R.M. University, Sonepat.
    15. Ashoka University,Sonepat.
    16. Al-Falah University, Faridabad.
    17. BML Munjal Universtiy, Gurgaon.
    18. Manav Rachna University, Faridabad.
    19. PDM University, Jhajjar
    20. Starex University, gurugram
    21. IILM University, Gurugram
    22. World University of Design, Sonipat
    23. Om Sterling Global University, Hisar
    24. Rishihood University, Sonepat.

    Other offices

    The following organizations are also headed by the Governor:

    1. Mewat Development Board
    2. Haryana Amalgamated Fund for the Welfare of ESM-Cum-Rajya Sainik Board.
    3. State Environment Protection Council, Haryana.
    4. Special Board of Motilal Nehru Sports School, Rai.
    5. Indian Red Cross Society, Haryana State Branch.
    6. St. John Ambulance Association, Haryana State Branch.
    7. Haryana State Council for Child Welfare.
    8. Haryana Saket Council.
    9. Welfare Society for persons with speech and Hearing Impairment.
    10. Haryana State Bharat Scouts and Guides.
    11. Bhartiya Grameen Mahila Sangh (Haryana State Branch).
    12. Hind Kusht Nivaran Sangh, Haryana State Branch.
    13. Battles of Panipat Memorial Society.

    The Governor is assisted by his Secretariat for the discharge of his functions.

    Secretary to Governor is Head of Department as well as Administrative Secretary of Haryana Raj Bhavan Affairs. He is Drawing and Disbursing Officer and Controlling Officer in respect of expenditure and establishment of the Raj Bhavan and the Governor’s Household.

    The powers of DDO have further been delegated to Accounts Officer, Raj Bhavan.

    Information As Required Under Section 4 (1) (b)(iii) OF RTI Act

    The Procedure Followed In The Decision Making Process, Including Channels Of Supervision and Accountability

    All matters/representations are processed by the secretariat staff and put up to Hon’ble Governor for his orders/approval through the Secretary to Governor.

    Information as Required Under Section 4 (1) (b)(iv) OF RTI Act the Norms Set By It For The Discharge Of It’s Functions

    The office attempts to discharge its function in an efficient, transparent, and time-bound manner under the table directions/guidance of the Hon’ble Governor.

    Information as Required Under Section 4 (1) (b)(v) OF RTI Act

    The Rules, Regulations, Instructions, Manuals, and Records, Held by IT or Under It’s Control or Used BY Its Employee For Discharging Its Functions

    Most of the secretarial staff posted in Raj Bhavan is on deputation from various departments. They belong to IAS, IPS, Army, Haryana Secretariat Service, and SAS Cadre. Therefore, they are governed by the procedure, rules, regulations, instructions, and manuals of their respective cadre/department. Others who are borne on Raj Bhavan cadre are governed by Raj Bhavan rules. All employees follow rules, regulations, instructions, and manuals of the Haryana Government in discharging their official functions.

    Statements Of The Categories Of Documents That Are Held By IT

    Information As Required Under Section 4 (1) (b)(vi) OF RTI Act

    OR Under Its Control

    The following important documents are, inter alia, maintained in the Raj Bhavan.

    1. Warrant of appointment of Governors.
    2. Files relating to appointment of Chief Minister, Ministers, and their oath of office.
    3. Appointment of high dignitaries such as Lokayukta, Advocate General and members of Haryana Public Service Commission, Chief Information Commissioner, Information Commissioners, Members of Right to Service Commission and Haryana Food Commission etc.
    4. Remission/Pardon cases of convicts under Article 161 of Constitution of India.
    5. Appointment of Vice Chancellors of different Universities, and also those relating to University matters requiring the Chancellor’s approval.
    6. Files relating to memorials received from Government employees.
    7. Reports received from Government on various references/petitions received at Raj Bhavan.
    8. Personal files of Raj Bhavan staff.
    9. Monthly Secret Reports sent to the President of India.

    INFORMATION AS REQUIRED UNDER SECTION 4 (1) (b)(vii) OF RTI ACT

    STATEMENT OF THE BOARD, COUNCILS, COMMITTEES, AND OTHER BODIES CONSISTING OF TWO OR MORE PERSONS CONSTITUTED AS ITS PART OR FOR THE PURPOSE OF ITS ADVICE, AND AS TO WHETHER MEETINGS OF THOSE BOARDS, COUNCILS, COMMITTEES, AND OTHER BODIES ARE OPEN TO THE PUBLIC, OR THE MINUTES OF SUCH MEETINGS ARE ACCESSIBLE FOR PUBLIC

    The Raj Bhavan has not constituted any Board, Council, Committee, and other Bodies on its own.

    Information As Required Under SECTION 4 (1) (b)(ix) OF RTI ACT

    Directory Of ITS Officers And Employees
    Sr. No. Name Designation Office No. Residence No.
    1. Bandaru Dattatraya Governor 2740654 2740643
    2. Atul Dwivedi, IAS Secretary to Governor 2740652
    3. Sumer Partap Singh, IPS ADC(P) 2742121
    4. Maj Jasdeep Singh, SM ADC(M) 2742121
    5. Amarjit Singh, HCS Joint Secretary 2742548
    6. Bakhvinder Singh OSD to Hon’ble Governor – cum- Deputy Secretary 2740654
    7. Anita Under Secretary
    8. Dr. Rakesh Talwar Senior Medical Officer 2928043 2790066
    9. B.A. Bhanusankar Advisor (IT) to Hon’ble Governor
    10. Satish Mehra DDIPR 2744607
    11. Vinod Sabharwal Accounts Officer (SAS Cadre)
    12. Kailash Nagesh PS to Hon’ble Governor
    13. Bijender Singh Kadian PS to Secretary Governor 2740652
    14. Mahesh Ramagundam PA to Hon’ble Governor

    Information As Required Under Section 4 (1) (b)(x) OF RTI Act

    The Monthly Remuneration Received By Each Of ITS Officers And Employees, Including The System Of Compensation As Provided In ITS Regulations

    (और ज्यादा…)

    OSD to HG
    Sl No. Name From To
    1 Shri S.M. Batra 02.04.1990 03.02.1993
    2 Dr. Avtar Singh, IAS 20.04.1994 14.06.1995
    3 Shri M.K. Jha 14.06.1995 18.06.2000
    4 Shri Inderjit Sukhija 06.03.2006 04.01.2008
    5 Shri Bakhvinder Singh 04.09.2017 17.05.2021
    6 Shri Amarjit Singh, HCS 27.05.2021 05.11.2021
    7 Shri Bakhvinder Singh 15.11.2021 Till Date
    AIDE DE-CAMP (MILITARY) TO GOVERNOR
    Sl No. Name From To
    1 Capt. S S Raheja 1968 1970
    2 Capt. Premvir Singh 1971 1974
    3 Capt Jaswant Singh Sirohi 1974 1977
    4 Capt. H S Chahal 01.03.1980 28.02.1982
    5 Capt. J S Yadav 01.03.1982 28.02.1983
    6 Capt. Ashwani Kumar 01.02.1983 25.07.1984
    7 Capt. V K Verma 01.08.1984 21.02.1986
    8 Capt. G M Vishwanathan 05.04.1986 31.05.1988
    9 Capt. R K Bhatia 14.07.1988 31.10.1990
    10 Capt. Ashokan K 05.10.1990 11.03.1993
    11 Capt. S Benjamin 11.03.1993 22.12.1995
    12 Capt. Nitin Y. Sawant 22.12.1995 12.10.1999
    13 Capt. C P Rajeev 13.01.1999 15.03.2001
    14 Capt. Sreejith K S M 15.03.2001 01.09.2003
    15 Capt. Shashank Kushwaha 01.09.2003 16.12.2004
    16 Maj Shashank Kushwaha 16.12.2004 08.09.2006
    17 Maj Abhiskek Sharma 08.09.2006 23.04.2010
    18 Maj Bhaskar Jha 20.11.2010 09.01.2013
    19 Maj Anand A shirali 09.01.2013 26.06.2015
    20 Maj Krishna Singh 26.06.2015 25.12.2017
    21 Sqn Ldr Saurabh Yadav 25.12.2017 09.08.2020
    22 Maj Jasdeep Singh, SM 09.08.2020 Till Date
    AIDE DE-CAMP (POLICE) TO GOVERNOR
    Sl No. Name From To
    1 Shri Vikas, IPS 07.08.1976 13.02.1978
    2 Shri V K Kapoor, IPS 14.02.1978 02.03.1980
    3 Shri P C Saberwal, IPS 28.03.1980 16.02.1981
    4 Shri Alok Joshi, IPS 14.03.1981 02.02.1982
    5 Shri Rakesh Malik, IPS 04.02.1982 23.09.1982
    6 Shri Resham Singh, IPS 24.09.1982 16.04.1985
    7 Shri P K Mehta, IPS 17.04.1985 11.03.1986
    8 Shri Shri Niwas, IPS 12.03.1986 13.02.1987
    9 Shri Harish Kumar, IPS 14.02.1987 28.02.1987
    10 Shri V N Rai, IPS 01.03.1987 15.04.1987
    11 Shri Laik Ram, IPS 16.04.1987 14.08.1987
    12 Shri K S Tomer, IPS 25.09.1987 08.02.1988
    13 Shri R K Vachher, IPS 19.02.1988 31.07.1990
    14 Shri K Selvaraj, IPS 05.11.1990 03.07.1991
    15 Shri P R Deo, IPS 05.07.1991 03.12.1991
    16 Shri R S Yadav, IPS 01.01.1992 30.04.1992
    17 Shri K Selvaraj, IPS 01.05.1992 12.05.1995
    18 Shri Sanjay Kundu, IPS 17.05.1995 07.06.1996
    19 Shri Sudhir Mohan, IPS 07.06.1996 10.12.1996
    20 Shri Shrikant Jadhav, IPS 08.01.1997 14.01.1999
    21 Dr. G S Rao, IPS 14.01.1999 03.11.2000
    22 Shri K Selvaraj, IPS 04.11.2000 15.06.2001
    23 Shri A S Dhillon, IPS 19.06.2001 10.02.2003
    24 Shri Sandeep Khirwar, IPS 10.02.2003 29.04.2003
    25 Shri Subhash Yadav, IPS 08.05.2003 18.03.2005
    26 Shri Y Puran Kumar, IPS 18.03.2005 30.09.2005
    27 Shri Attar Singh Ahlawat, IPS 30.09.2005 06.12.2006
    28 Shri Jagparvesh Dahiya, HPS 09.12.2006 29.02.2016
    29 Shri B. Satheesh Balan, IPS 21.03.2016 02.01.2017
    30 Shri Waseem Akram, IPS 02.01.2017 20.11.2017
    31 Shri Ganga Ram Punia, IPS 20.11.2017 25.04.2018
    32 Shri Mohit Handa, IPS 26.04.2018 20.02.2019
    33 Shri Sumer Pratap Singh, IPS 20.02.2019 24.09.2020
    34 Shri Rajendar Kumar Meena, IPS 24.09.2020 21.06.2021
    35 Shri Sumer Partap Singh, IPS 21.06.2021 Till Date

    माननीय राज्यपाल लाउंज हॉल में विभिन्न प्रतिनिधिमंडलों से मिलते हैं।.

    Profile Picture Name Duration Designation
    Sh. Atul Dwivedi श्री अतुल द्विवेदी2021भा.प्र.से.
    Dr. G. Anupama डॉ. जी अनुपमा01/01/2020 to 08/02/2021
    भा.प्र.से.
    Shri Vijay Singh Dahiya श्री विजय सिंह दहिया29/10/2018 to 31/12/2019
    भा.प्र.से.
    Dr. Amit Kumar Agrawal डॉ. अमित कुमार अग्रवाल01/03/2016 to 29/10/2018
    भा.प्र.से.
    Smt. Neelam P. Kasni श्रीमती नीलम पी. कासनी05/09/2013 to 29/02/2016
    भा.प्र.से.
    Shri Mohinder Kumar श्री मोहिंदर कुमार21/04/2010 to 31/08/2013
    भा.प्र.से.
    Shri A K Singh श्री ए. के. सिंह28/07/2009 to 21/04/2010
    भा.प्र.से.
    Shri Alok Nigam श्री आलोक निगम23/08/2005 to 27/07/2009
    भा.प्र.से.
    Shri Vijai Vardhan श्री विजयवर्धन16/08/2001 to 22/08/2005
    भा.प्र.से.
    No Image श्री एस.पी. शर्मा03/01/2001 to 16/08/2001
    भा.प्र.से.
    No Image श्री माणिक सोनवणे14/07/1997 to 02/01/2001
    भा.प्र.से.
    No Image श्रीमती केशनी आनंद अरोड़ा14/01/1993 to 21/04/1993
    भा.प्र.से.
    Smt. Urvashi Gulati श्रीमती उर्वशी गुलाटी14/01/1990 to 21/04/1993
    23/04/1993 to 13/07/1997
    भा.प्र.से.
    No Image श्रीमती कोमल आनंद07/01/1986 to 09/03/1990
    भा.प्र.से.
    No Image डॉ. तरसेम लाल03/09/1984 to 06/01/1986
    भा.प्र.से.
    No Image श्री एच.सी. डिसोदिया05/03/1984 to 02/09/1984
    भा.प्र.से.
    No Image श्रीमती प्रोमिला इस्सर07/01/1981 to 04/03/1984
    भा.प्र.से.
    No Image त्रिलोचन सिंह29/06/1978 to 06/01/1981
    भा.प्र.से.
    No Image जी माधवन09/10/1975 to 28/06/1978
    भा.प्र.से.
    No Image एल एम गोयल07/02/1972 to 08/10/1975
    भा.प्र.से.

    माननीय राज्यपाल की अध्यक्षता में संगठनों की विभिन्न बैठकें सम्मेलन हॉल में पेशेवर सार्वजनिक संबोधन प्रणाली के साथ आयोजित की जाती हैं। इसमें करीब 80 लोगों के बैठने की क्षमता है।

    इस हॉल का उपयोग छोटे समारोहों, औपचारिक भोज के लिए किया जाता है। इसका निर्माण वर्ष 1980 में किया गया था।

    वर्ष 2011 में पूरा हुआ, द प्रेसिडेंट सुइट राज्यों के प्रमुख के लिए आरक्षित है। उत्तम फर्नीचर से सुसज्जित, सुइट में श्रीमती सहित कई गणमान्य व्यक्ति शामिल हैं। प्रतिभा पाटिल, भारत की पूर्व राष्ट्रपति।

    president suit Layer
    president suit
    president suit
    luxury president suit
    AIDE DE-CAMP (POLICE) TO GOVERNOR
    Sl No. Name From: To:
    1 Shri Sumer Partap Singh, IPS 21.06.2021 Till Date
    2 Shri Rajendar Kumar Meena, IPS 24.09.2020 21.06.2021
    3 Shri Sumer Pratap Singh, IPS 20.02.2019 24.09.2020
    4 Shri Mohit Handa, IPS 26.04.2018 20.02.2019
    5 Shri Ganga Ram Punia, IPS 20.11.2017 25.04.2018
    6 Shri Waseem Akram, IPS 02.01.2017 20.11.2017
    7 Shri B. Satheesh Balan, IPS 21.03.2016 02.01.2017
    8 Shri Jagparvesh Dahiya, HPS 09.12.2006 29.02.2016
    9 Shri Attar Singh Ahlawat, IPS 30.09.2005 06.12.2006
    10 Shri Y Puran Kumar, IPS 18.03.2005 30.09.2005
    11 Shri Subhash Yadav, IPS 08.05.2003 18.03.2005
    12 Shri Sandeep Khirwar, IPS 10.02.2003 29.04.2003
    13 Shri A S Dhillon, IPS 19.06.2001 10.02.2003
    14 Shri K Selvaraj, IPS 04.11.2000 15.06.2001
    15 Dr. G S Rao, IPS 14.01.1999 03.11.2000
    16 Shri Sanjay Kundu, IPS 17.05.1995 07.06.1996
    17 Shri Sudhir Mohan, IPS 07.06.1996 10.12.1996
    18 Shri Shrikant Jadhav, IPS 08.01.1997 14.01.1999
    19 Shri K Selvaraj, IPS 01.05.1992 12.05.1995
    20 Shri R S Yadav, IPS 01.01.1992 30.04.1992
    21 Shri P R Deo, IPS 05.07.1991 03.12.1991
    22 Shri K Selvaraj, IPS 05.11.1990 03.07.1991
    23 Shri R K Vachher, IPS 19.02.1988 31.07.1990
    24 Shri K S Tomer, IPS 25.09.1987 08.02.1988
    25 Shri Laik Ram, IPS 16.04.1987 14.08.1987
    26 Shri V N Rai, IPS 01.03.1987 15.04.1987
    27 Shri Harish Kumar, IPS 14.02.1987 28.02.1987
    28 Shri Shri Niwas, IPS 12.03.1986 13.02.1987
    29 Shri P K Mehta, IPS 17.04.1985 11.03.1986
    30 Shri Resham Singh, IPS 24.09.1982 16.04.1985
    31 Shri Rakesh Malik, IPS 04.02.1982 23.09.1982
    32 Shri Alok Joshi, IPS 14.03.1981 02.02.1982
    33 Shri P C Saberwal, IPS 28.03.1980 16.02.1981
    34 Shri V K Kapoor, IPS 14.02.1978 02.03.1980
    35 Shri Vikas, IPS 07.08.1976 13.02.1978

    The Constitution of India provides as under:-

    Article 153. Governors of States

    There shall be a Governor for each State.

    Article 154. Executive power of State.

    1. The executive power of the State shall be vested in the Governor and shall be exercised by him either directly or through officers subordinate to him in accordance with this Constitution.
    2. Nothing in this article shall–
    • be deemed to transfer to the Governor any functions conferred by any existing law or any other authority; or
    • prevent Parliament or the Legislature of the State from conferring by law functions on any authority subordinate to the Governor

    Article 155. Appointment of Governor.-

    The Governor of a State shall be appointed by the President by warrant under his hand and seal.

    Article 156. Term of office of Governor.

    1. The Governor shall hold office during the pleasure of the President.
    2. The Governor may, by writing under his hand addressed to the President, resign his office.
    3. Subject to the foregoing provisions of this article, a Governor shall hold office for a term of five years from the date on which he enters upon his office.

    Article 157. Qualifications for appointment as Governor.

    No person shall be eligible for appointment as Governor unless he is a citizen of India and has completed the age of thirty-five years.

    Article 158. Conditions of Governor’s office.

    1. The Governor shall not be a member of either House of Parliament or of a House of the Legislature of any State specified in the First Schedule, and if a member of either House of Parliament or of a House of the Legislature of any such State be appointed Governor, he shall be deemed to have vacated his seat in that House on the date on which he enters upon his office as Governor.
    2. The Governor shall not hold any other office of profit.
    3. The Governor shall be entitled without payment of rent to the use of his official residences and shall be also entitled to such emoluments, allowances and privileges as may be determined by Parliament by law and, until provision in that behalf is so made, such emoluments, allowances and privileges as are specified in the Second Schedule.
    4. The emoluments and allowances of the Governor shall not be diminished during his term of office.

    Article 161. Power of Governor to grant pardons, etc., and to suspend, remit or commute sentences in certain cases.-

    The Governor of a State shall have the power to grant pardons, reprieves, respites or remission of punishment or to suspend, remit or commute the sentence of any person convicted of any offence against any law relating to a matter to which the executive power of the State extends.

    Article 163. Council of Ministers to aid and advise Governor.-

    1. There shall be a Council of Ministers with the Chief Minister at the head to aid and advise the Governor in the exercise of his functions, except in so far as he is by or under this Constitution required to exercise his functions or any of them in his discretion.
    2. If any question arises whether any matter is or is not a matter as respects which the Governor is by or under this Constitution required to act in his discretion, the decision of the Governor in his discretion shall be final, and the validity of anything done by the Governor shall not be called in question on the ground that he ought or ought not to have acted in his discretion.
    3. The question whether any, and if so what, advice was tendered by Ministers to the Governor shall not be inquired into in any court.

    Article 164. Other provisions as to Ministers.-

    1. The Chief Minister shall be appointed by the Governor and the other Ministers shall be appointed by the Governor on the advice of the Chief Minster, and the Ministers shall hold office during the pleasure of the Governor.
    2. Before a Minister enters upon his office, the Governor shall administer to him the oaths of office and of secrecy according to the forms set out for the purpose in the Third Schedule.

    Article 166. Conduct of business of the Government of a State.

    1. All executive action of the Government of a State shall be expressed to be taken in the name of the Governor.
    2. Orders and other instruments made and executed in the name of the Governor shall be authenticated in such manner as may be specified in rules to be made by the Governor, and the validity of an order or instrument which is so authenticated shall not be called in question on the ground that it is not an order or instrument made or executed by the Governor.
    3. The Governor shall make rules for the more convenient transaction of the business of the Government of the State, and for the allocation among Ministers of the said business in so far as it is not business with respect to which the Governor is by or under this Constitution required to act in his discretion. The Governor has delegated his powers to the State Government through “Rules of Business of the Government of Haryana, 1977”. The exercise of powers is regulated by law.
    1. J&K seminarKUK 02.03.17
    2. KUK Exhibition on History of Haryana 08-02-2017
    3. Brahm Rishi,_Pinjore_20-01-2017
    4. Kargil Vijay Divas DAV College, Chd. 27-07-2017
    1. Kurukshetra Convocation 22.01.2020
    2. 26 January for Durdarshan final
    3. National session & executive meeting of Mahapeeth 16.02.2020 (New Delhi)
    4. Sanskaram International School 31.01.2020 (Jhajjar)
    5. Suraj Kund Craft Mela Closing Ceremony 16.02.2020
    6. Suraj Kund Craft Mela Inauguration 16.02.2020
    7. Voter’s Day 25.01.2020
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    conference roomVarious meetings of organisations Chaired by Hon’ble Governor are held at Conference Hall with professional public address system. It has a seating capacity of approx 80 persons.

    This Hall is used for smaller Ceremonies, Ceremonial Banquets. It was constructed in the year 1980.

    multi purpose hallConstructed in the year 2011, This hall is the pride of Raj Bhavan. With a seating capacity of approx 500 persons, The Hall is used for various Ceremonial Occasions including Swearing In, Award functions, etc.

    Governor Hry lounge hallThe Hon’ble Governor meets various delegations at the Lounge Hall. The lounge hall aptly lighted, furnished, and has a seating capacity of 50-60 persons.

    Completed in the year 2011, The President Suite is reserved for Head of States. Adorned with exquisite furniture, the Suite has accommodated many dignitaries including Smt. Pratibha Patil, Former President of India.

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    Hon'ble Chief Minister Minister Name
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    About the Department

    about-departmentThis is an informative text section that outlines the department major activities, benefits and setup details.

    Department X covers the functioning of sector 1, sector 2, sector 3 and the y System of State N. The Department is headed by the Secretary, who is assisted by four Additional Secretary (AS), three Joint Secretaries (JS), two Advisers and a Deputy Director General (DDG).

    Department X was set up by the state government dated 20th March 1989 with administrative and financial powers…

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    This is an informative text section that outlines the department major activities, benefits and setup details.Department X covers the functioning of sector 1, sector 2, sector 3 and the y System of State N. The Department is headed by the Secretary, who is assisted by four Additional Secretary (AS), three Joint Secretaries (JS), two Advisers and a Deputy Director General (DDG).

    Department X was set up by the state government dated 20th March 1989 with administrative and financial powers of the state government to handle [xxxxx].Several key programs/initiatives and reforms of the Government concerning the System 1, System 2 and System 3 in India are operated by The Department X.

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    THOUGHT OF THE DAY

    Character is like a tree and reputation like its shadow. The shadow is what we think of it; the tree is the real thing.
    Abraham Lincoln

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    • The Prime Minister of India
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    Hon'ble Governor Haryana

    Governor of Haryana 2021
    Shri Bandaru Dattatraya

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    Raj Bhavan HaryRaj Bhavan Haryana is situated on a sprawling estate facing the pictures que Sukhna lake in Chandigarh.The estate is flanked by UT guest house, the Chandigarh Golf course and Sukhna lake.After the division of the erstwhile unified state of Punjab into Haryana, Himachal Pradesh and Punjab in the year 1966-67, the office of Governor Haryana shifted to the present location.

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    Haryana Corona Relief Fund

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